ऐसा वर चाहिए जो न खुद पीता हो और न उसके परिजन!

अशोक बंसल-

मदिरा के उपासक तुम्हारी क्षय हो या जय हो ? देश-विदेश की आबोहवा में रचा-बसा व्यक्ति कभी भी मदिरा पर चर्चा कर समय की बर्वादी नहीं करता लेकिन कल अपनी कन्या के लिए वर की तलाश करते एक अभागे व्यापारी मित्र की वेदना सुन मैं दुविधा में पड़ गया कि इस समाज में मदिरा के उपासकों की जय बोली जाए या उनका उपेक्षा कि जाए ?

मित्र ने किस्सा सुनाया कि वे अपनी पुत्री के लिए वर की तलाश में आठ साल से दर दर भटक रहे हैं , बात ही नहीं बनती। विहारी जी की अनुकम्पा से उनके पास सब कुछ है ,बस एक दिली इच्छा है कि बिटिया जिस घर में जाए वहाँ मदिरा का वास न हो , घर का कोई सदस्य न पीता हो और न लड़का। मेरी इस शर्त पर सभी परिवार चुप्पी साध लेते हैं। कुछ परिवार ऐसे मिलते हैं जो अपने न पीने की गारंटी तो देते हैं लेकिन अपने पुत्र की नहीं। बिटिया ३० की उम्र पार कर गई है , ऐसे में वर चयन के अवसर भी कम होते जा रहे हैं।

अपनों की तलाश में भटकती आत्मा को अपना जैसा कैसे मिले ?

हिन्दू पौराणिक ग्रंथों में अनेक देवी देवताओं की चर्चा है पर शराब के देवता का कहीं भी जिक्र नहीं मिलता है लेकिन ग्रीक पुराणों में शराब के देवता की उपस्थिति है । इस देवता की सवारी चीता है । नाम है बेकस (Bacchus) । बेकस अपनी सवारी पर सम्पूर्ण पृथ्वी का चक्कर द्रुत गति से लगाता है और घूम घूम कर देखता है कि खेतों में अंगूर की लताएँ फल फूल रही हैं या नहीं और अंगूर से दिव्य पेय का उत्पादन हो रहा है कि नहीँ।

सैकड़ों सालों से पृथ्वी पर मौजूद कवियों ने शराब के देवता की स्तुति की है । मसलन , अंग्रेजी कवि कीटस की एक प्रसिध्द कविता है —ODE TO A NIGHTINGALE । कवि इस कविता में अपने आसपास के दुखों के भूलने के लिए शराब के देवता बेकस (Bacchus) का स्मरण करता है । हमारे प्रिय कवि हरिवंश रॉय बच्चन ने इस देवता स्मरण ‘ मधुशाला ‘में किया है । हमें यह बात मालूम है कि दुनिया भर के नामी गिरामी अनेक विद्वानों ने अपनी कालजयी रचनाओं को जन्म अपने घरों में शराब के देवता के मंदिर बनवाकर ही दिया है । ९९ साल में स्वर्ग जाने वाले बेकस के उपासक खुशवंत सिंह को कौन नहीं जानता ।
एक बार मथुरा म्यूजियम के प्रांगण में एक कवि सम्मेलन में वीर रस के कवि देवराज ‘दिनेश ‘ ने ‘जीवन क्या है ?’ कविता का पाठ अपनी ओजस्वी वाणी में किया तो तालियों की गड़गड़ाहट से सभा स्थल गुंजायमान हो गया। मेरे जैसे कई श्रोताओं को मालूम था कि भारी भरकम कद काठी के देवराज ने माइक तक पहुँचने से पूर्व एक पाउआ और वह भी देशी ठेके का , मंच के पीछे अँधेरे में गटका था तभी उनके कंठ से –” बनती-मिटती लहरों से पूछा जीवन क्या है ?” जैसी कविता फूटी थी।

शराब की दुकानों पर ‘आदमी के ऊपर लदा आदमी’ वाली भीड़ देखकर सरकार ने इस देवता की ताकत का समझ लिया है लेकिन मेरे मित्र ने क्यों नहीं ?

शराब के देवता की गांधीजी ने कोई सुध नहीं ली, वे उसकी उपेक्षा करते रहे । गाँधी आश्रमों के बने उत्पादों की दुकानों के बाहर बोर्ड पर लिखवा दिया गया ,शराब पीना बुरा है। लेकिन उस दुकान के सामने शराब की दुकान के बाहर बोर्ड पर लिखा मिला —‘भयंकर ठंडी बीयर ‘ या ” शराब के दामों में भारी कमी ‘। इस दुकान के बगल में एक झोला छाप डाक्टर ने बोर्ड लगा रखा था —-‘यहाँ शराब पीना छुड़ाया जाता है ।’ भ्रम पैदा करने वाला दृश्य मैंने मथुरा में देखा है। हमारी सरकार भी ‘कन्फ्यूज्ड’ है। कई राज्यों में शराब के देवता के प्रवेश पर निषेध है , बाकी राज्यों में सरकारें शराब के ठेकों की बोली अपने कलेक्टरों से करा कर भारी राजस्व बटोर रही हैं।

मथुरा जैसे धर्मिक शहर में स्कूटी से उतर कर शराब की दुकान पर खरीददारी करती कन्याएं दिखाई दे जायेंगीं , अभिजात्य वर्ग की पार्टियों में महिलाओं को इस दिव्य पेय का स्वाद लेते देखा जा सकता है , महानगर के लोग इस देवता के स्वागत में गान गाते ही हैं। मैं परदेश के लिए जब-जब उड़ान भरता हूँ तो मेरे कुछ मित्र अपने विनम्र स्वर में कहते हैं –” गुरू, हवाई अड्डे के अंदर ड्यूटी फ्री दुकान से ‘कुछ’ ले आना। हवाई जहाज के अंदर तो मदिरा परोसती सुंदरियाँ – सर , आप क्या लेंगे —‘रम, व्हिस्की या वाइन ?’ की स्वर लहरी बिखेरती हैं तो यात्रियों का रोम-रोम पुलकित हो जाता है। एक बार राज्य सभा में सांसद नरेश अग्रवाल ने न जाने किस संदर्भ में –‘ व्हिस्की में —–बसें , रम में बसते —‘ जैसी तुकबंदी कर सांसदों का मनोरंजन किया था।

मैंने इन सभी रोचक बातों को अपने दुखी मित्र को सुनाते हुए सलाह दी है — ‘ आप दवाई से भी ज्यादा कड़बे पेय को भले ही न पियें पर इस ‘दिव्य पदार्थ ‘ का सेवन करने वालों पर अपनी भाव-भंगिमा टेडी कर अपने चेहरे की खूबसूरती को न बिगाड़ें , अपनी कन्या को सलाह दें कि अपनी भावी ससुराल जाकर अपने सास-ससुर या पति में जो भी यदि पीता हो उसे न पीने को मजबूर कर दे। आखिर , नए घर में कन्या को किसी न किसी मोर्चे पर लड़ाई तो लड़नी ही पड़ती है। ”

मेरे व्यापरी मित्र मेरी सलाह पर प्रसन्न हैं , मेरी कामना है उनकी बिटिया के हाथ अब जल्द पीले हो जायेंगे।

इस पृथ्वी पर किसी एक देवता को कैसे भगाया जा सकता है , जब इन्द्र रहेंगे तो बेकच क्यों नहीं ?



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Comments on “ऐसा वर चाहिए जो न खुद पीता हो और न उसके परिजन!

  • अब यह सिर्फ बहाना है। शादी के वक्त केवल लड़के की आर्थिक स्थिति ही पूछी जाती है। केवल 1 प्रतिशत लोग ही संस्कार को वेल्यू दे रहे हैं। मैंने आज तक शराब पीनी तो दूर शराब के नाम तक नहीं जानता, न ही परिवार में कोई भी शराब पीता है। लेकिन जब रिश्ता देखे तो किसी के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। एक और बात आपने ठीक लिखा की 90 प्रतिशत लोग शराबी हो गए हैं लेकिन 10 प्रतिशत आज भी शराब को पसंद नहीं करते। लेकिन माफ कीजिए इसमें गलती लड़की वालो की है। लालच में ऑकेशनली के नाम पर इस बात को दरकिनार कर देते हैं जबकि कोई हार्डकोर ड्रिंकर भी ये नहीं कहता वो शराबी है वो भी कहता है ऑकेशनली पिता है और इस तरह वो लड़कीवालों को बेवकूफ बनाता है और लड़की वाले आर्थिक स्थिति, सरकारी नौकरी आदि के लालच में बेवकूफ बनते हैं। अगर लड़कीवाले सीधा बोले शराबी नहीं चाहिए तो लड़के शराब छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं। मेरी राय में या तो शराब पीनेवाला होता है या ना पीनेवाले ऑकेशनली कुछ नहीं होता। आज भी ऐसे लोग हैं बस लालच का चश्मा हटाना होगा। जब मैं ऐसा हूं तो मुझे लगता कई और भी परिवार होंगे जो शराब पीना छोड़े शराब देखना भी पसंद नहीं करते लेकिन पहल तो करें।

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  • अब यह सिर्फ बहाना है। शादी के वक्त केवल लड़के की आर्थिक स्थिति ही पूछी जाती है। केवल 1 प्रतिशत लोग ही संस्कार को वेल्यू दे रहे हैं। मैंने आज तक शराब पीनी तो दूर शराब के नाम तक नहीं जानता, न ही परिवार में कोई भी शराब पीता है। लेकिन जब रिश्ता देखे तो किसी के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। एक और बात आपने ठीक लिखा की 90 प्रतिशत लोग शराबी हो गए हैं लेकिन 10 प्रतिशत आज भी शराब को पसंद नहीं करते। लेकिन माफ कीजिए इसमें गलती लड़की वालो की है। लालच में ऑकेशनली के नाम पर इस बात को दरकिनार कर देते हैं जबकि कोई हार्डकोर ड्रिंकर भी ये नहीं कहता वो शराबी है वो भी कहता है ऑकेशनली पिता है और इस तरह वो लड़कीवालों को बेवकूफ बनाता है और लड़की वाले आर्थिक स्थिति, सरकारी नौकरी आदि के लालच में बेवकूफ बनते हैं। अगर लड़कीवाले सीधा बोले शराबी नहीं चाहिए तो लड़के शराब छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं। मेरी राय में या तो शराब पीनेवाला होता है या ना पीनेवाले ऑकेशनली कुछ नहीं होता। आज भी ऐसे लोग हैं बस लालच का चश्मा हटाना होगा। जब मैं ऐसा हूं तो मुझे लगता कई और भी परिवार होंगे जो शराब पीना छोड़े शराब देखना भी पसंद नहीं करते लेकिन पहल तो करें।

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  • अब यह सिर्फ बहाना है। शादी के वक्त केवल लड़के की आर्थिक स्थिति ही पूछी जाती है। केवल 1 प्रतिशत लोग ही संस्कार को वेल्यू दे रहे हैं। मैंने आज तक शराब पीनी तो दूर शराब के नाम तक नहीं जानता, न ही परिवार में कोई भी शराब पीता है। लेकिन जब रिश्ता देखे तो किसी के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं। एक और बात आपने ठीक लिखा की 90 प्रतिशत लोग शराबी हो गए हैं लेकिन 10 प्रतिशत आज भी शराब को पसंद नहीं करते। लेकिन माफ कीजिए इसमें गलती लड़की वालो की है। लालच में ऑकेशनली के नाम पर इस बात को दरकिनार कर देते हैं जबकि कोई हार्डकोर ड्रिंकर भी ये नहीं कहता वो शराबी है वो भी कहता है ऑकेशनली पिता है और इस तरह वो लड़कीवालों को बेवकूफ बनाता है और लड़की वाले आर्थिक स्थिति, सरकारी नौकरी आदि के लालच में बेवकूफ बनते हैं। अगर लड़कीवाले सीधा बोले शराबी नहीं चाहिए तो लड़के शराब छोड़ने को मजबूर हो सकते हैं। मेरी राय में या तो शराब पीनेवाला होता है या ना पीनेवाले ऑकेशनली कुछ नहीं होता। आज भी ऐसे लोग हैं बस लालच का चश्मा हटाना होगा। जब मैं ऐसा हूं तो मुझे लगता कई और भी परिवार होंगे जो शराब पीना छोड़े शराब देखना भी पसंद नहीं करते लेकिन पहल तो करें।

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