जी हां, मुझे मलाल है कि उस सत्यार्थी को नोबल मिला जिसने हज़ारों हाथों को तराशने के बजाय भिखमंगा बना दिया

मुझसे कई मित्रों ने पूछा कि क्या आपको मलाल है कि सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिला? फिर मेरे देश प्रेम पर सवाल उठाया कि आप कैसे भारतीय हैं? तो मैं कहना चाहूंगा कि जी हां, मुझे मलाल है। क्योंकि मैं हर बजते ढोल की ताल पर नाचने में यकीन नहीं रखता। मुझे मलाल है क्योंकि शांति और अहिंसा के विश्वदूत “गांधी” अभी तक खारिज हैं, और मेरा भारत खामोश है।

मुझे मलाल इस बात का भी है क्योंकि सत्यार्थी जैसे लोगों की वजह से हमारे परंपरागत “तकनीकी कौशल” के विश्वविद्यालयों पर ताला लगा दिया गया। जैसे हम शहरी बच्चों को प्रैप स्कूल में भेज कर एबीसीडी सिखवाते हैं, ठीक उसी तरह से हमारे देश की बहुतेरी आबादी के बच्चे बचपन से परंपरागत तकनीकी कौशल सीखते हैं। मिर्जापुर और भदोही को कालीन उद्योग इसकी मिसालें थीं। सत्यार्थी जैसे लोगों के अभियान की वजह से इन उद्योगों से हुनर सीखने का मौका ना जाने कितने बच्चो सें छिन गया। स्वालंबी हाथों को तराशने की बजाय भिखमंगा बना दिया गया।

इतना ही नहीं “रग मार्क” की अनिवार्यता ने हमारे कालीन-गलीचा उद्योग को दुनिया में बहुत पीछे कर दिया है। क्या आप जानते हैं कि “रग मार्क” क्या होता है? आज यह बच्चे ना स्कूल के रहे ना घर के। इनके हाथ बेकार हो चुके हैं। हजारों पाठशालाओं पर ताला लगवा दिया। और कहते हैं कि मुझे मलाल ना हो। लाखों परिवारों की जीविका छिन चुकी है। वैकल्पिक स्रोत नहीं है इनके पास जीने के लिए। और यह सब उस अभियान के जरिए हुआ, जिसको प्रायोजित भी यूरोपीय धन से किया गया।

हम बाजार के खिलाड़ियों के हाथों खेले गए, खेले जा रहे हैं और आप कह रहे हैं कि मुझे मलाल ना हो। कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन ज्यादा कहूंगा तो आपका भ्रष्ट देशप्रेम और आहत हो उठेगा और हिंसक भी। पर क्या करूं, मेरा देशप्रेम तो वहां बसता है, जहां राशन का गल्ला और बिजली की रोशनी नहीं पहुंचती।

 

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्य के पेसबुक वॉल से।

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