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सुख-दुख

जीवन के 49 बरस पूरे होने पर हरिद्वार पहुँचे यशवंत की डायरी : हे ईश्वर इन्हें माफ़ न करना!

यशवंत सिंह-

26 august 22

इस देह, इस दिमाग़ और इस आत्मा ने जो समझा अब तक वो यही है कि कहीं कुछ नहीं है! सब माया है। सब वासना है। सब दुहराव है। सब ऑटोमेशन है। हे प्रकृति, मुझे इस शोर से विरत रहने का साहस दें!

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दोपहर में नहाने के पहले, नहाते वक्त और नहाने के बाद की तस्वीरें! इस पूरे दो घंटे के दौरान एक साधु पानी में खड़ा खड़ा पूजा करता रहा!


27 august 22

आश्रम में रात का भोजन कर अभी टहलने घाट की तरफ़ निकला तो मनुष्य के बजाय ये तीन नन्हे जीव दिखे।

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दिन में भी इन्हें देखा था। लोग खूब दुलारते और खिलाते। सैलानियों-तीर्थयात्रियों के बच्चे इनके साथ खेलते। इनकी माँ खाना ले-लेकर बग़ल की झाड़ी में जाकर रख देतीं।

हरिद्वार से पहले एक बार ग़ाज़ीपुर में देखा था कि एक ऐसी ही मदर एक्स्ट्रा रोटियाँ बालू के ढेर में चुरा देती है और सुबह खोद कर उसे निकाल लाती है।

हरिद्वार में गंगा किनारे के इन जीवों को हम भाग्यशाली कह सकते हैं न, जिन्हें भरपूर खाना मिल जाता है, पीने-नहाने को गंगा का पानी और जीने की पूरी आज़ादी। कोई मालिक नहीं इनका।

आज़ाद होना और हरिद्वार जैसी जगह में गंगा किनारे जीना बहुत बड़ी लग्ज़री है, मेरी नज़र में! हमहूँ ऐसे ही जीना चाहते हैं!


28 august 22

मुद्दे आते जाते रहते हैं। कभी ये तो कभी वो। जिनकी उम्र क्षण भर है उन पर क्या बात करना। फ़िज़ूल खर्च हो रहे क्षण क्षण का संग्रह करें। उसे अपने भीतर उतारें। समय का एक समंदर इकट्ठा हो जाएगा एक दिन जो सारा आपका होगा। विराट में एकाकार होकर गोते लगाइए।

दुर्भाग्य है कि सब बाहर ही तलाश रहे हैं।

मनुष्यों के खेल निराले हैं। बनाते हैं। उजाड़ते हैं। उड़ाते हैं। ग़रीबों को मुफ़्त का घर दे सकते थे प्रधानमंत्री योजना के नाम से। मरीज़ों के परिजनों के लिए मुफ़्त का आवास बना सकते थे। अनाथालय घोषित कर सकते थे। कुछ भी सकारात्मक कर सकते थे। पर इन्हें इवेंट बनाना है। बुद्धिहीन जनता को मनोरंजन कराना है। कैमरों मीडिया के ज़रिए सर्कस पूरे देश को दिखाना है। पर्यावरण का कितना नुक़सान होगा, सोचिए जरा। हवा वैसे ही ज़हरीली हुई जा रही ncr की। इस विस्फोट ज़मींदोज़ से कितना धूल बारूद आसमान में फैलेगा।

ये उस दौर की तरह ही है जब स्टेडियम में राज्य प्रायोजित खेल के रूप में ग़ुलाम मनुष्य आपस में लड़ कर मरते मारते थे और बुद्धिहीन जनता तालियाँ पीट कर वाह वाह करती थी। वैसा ही कुछ आज भी है। बस फ़ॉरमेट बदल गया है। तरीक़ा बदल गया है।

बेवजह धरती को हर्ट करने से बाज आना चाहिए।

हे ईश्वर इन्हें माफ़ न करना… ये शासक खूब जानते हैं कि ये क्या कर रहे हैं!

वैसे तो इस वक्त हम भी माया में फँसे हैं। भंडारे में आज का ये मुफ़्त का भोजन कितना आकर्षक और स्वादिष्ट है।

देख रहे हो न विनोद, तुम्हें तो ट्विन टॉवर और बारूद के काकटेल से उपजने वाले ग़ुबार का उत्तेजित अचंभित दर्शक बना दिया गया है। ऐसे में भला तुम क्या बूझ पाओगे मानसिक रूप से आज़ाद होकर हरिद्वार में जीने का सुख! 🙂

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