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जीडीपी 5 फीसदी से भी कम है, तभी मचा है आर्थिक हाहाकार!

जेपी सिंह

अर्थशास्त्री कहते हैं कि मंदी तब आती है जब देश की जीडीपी दो तिमाही तक लगातार निगेटिव रहे. लेकिन फिलवक्त विकास दर पांच फीसद है। तकनीकी रूप से देखा जाए तो यह मंदी नहीं है लेकिन फिर भी पूरे देश में चतुर्दिक हाहाकार मचा हुआ है। इसका अर्थ यह है की वास्तविक जीडीपी विकास दर 5 फीसद के बजाय मात्र 2 से 2.5 फीसद पर आ गयी है। वास्तविकता तो यह है कि 2014 में मनमोहन नीत यूपीए सरकार के जाने के बाद जब अर्थव्यवस्था में मोदी सरकार अपेक्षित लक्ष्य नहीं हासिल कर पायी तो वर्ष 2018 में मोदी सरकार ने जीडीपी गणना के तरीके को ही बदल दिया ताकि यह गाल बजाया जा सके कि 2014 से 2018 के बीच एनडीए के पहले चार साल में विकास की रफ़्तार यूपीए के दौर से ज़्यादा रही है। अगर एनडीए के पहले चार साल में विकास की रफ़्तार यूपीए के दौर से ज़्यादा रही थी तो फिर एक सवा साल में ऐसा क्या हो गया कि देश की अर्थव्यवस्ता इतनी बुरी हालत में पहुंच गयी?

दरअसल अर्थयवस्था की बदहाली को लगातार जीडीपी के फ़र्ज़ी आंकड़ों से ढंका गया जो देश की आर्थिक बदहाली से सतह पर आ गया है। इसका एक ही अर्थ है की आर्थिक बदहाली एक दिन या एक साल में नहीं हुई बल्कि मोदी सरकार के पांच वर्षों की गलत आर्थिक नीतियों के कारण आयी है।

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने जून 2019में कहा था कि कि आर्थिक वृद्धि (जीडीपी) की गणना के लिए अपनाए गए नए पैमानों के चलते 2011-12 और 2016-17 के बीच आर्थिक वृद्धि दर औसतन 2.5% ऊंची होदिखायी गयी। उन्होंने हार्वर्ड विश्विद्यालय द्वारा प्रकाशित अपने शोध पत्र में कहा था कि भारत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर उपरोक्त अवधि में 4.5 प्रतिशत रहनी चाहिए जबकि आधिकारिक अनुमान में इसे करीब 7 प्रतिशत बताया गया है। सुब्रमण्यम ने कहा था कि भारत ने 2011-12 से आगे की अवधि के जीडीपी के अनुमान के लिए आंकड़ों के स्रोतों और जीडीपी अनुमान की पद्धति बदल दी है,इससे आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान अच्छा-खासा ऊंचा हो गया। सुब्रमण्यम ने आगाह किया था कि आने वाले समय में आर्थिक वृद्धि को पटरी पर लाना प्राथमिकता में सबसे ऊपर होनी चाहिए और जीडीपी अनुमान पर फिर से गौर किया जाना चाहिए।

देश में आर्थिक मंदी की अंदरूनी वजहे हैं। अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण औद्योगिक क्षेत्रों में गिरावट, डिमांड और सप्लाई के बीच लगातार कम होता अंतर और निवेश में मामूली कमी जैसी चीजें मंदी के लिए जिम्मेदार हैं।

देश का ऑटो सेक्टर रिवर्स गियर में चला गया है। ऑटो इंडस्ट्री में लगातार नौ महीने से बिक्री में गिरावट दर्ज हो रही है. जुलाई में कार और मोटरसाइकिलों की बिक्री में 31 फीसदी की गिरावट आई है। जिसकी वजह से ऑटो सेक्टर से जुड़े साढ़े तीन लाख से ज्यादा कर्मचारियों की नौकरी चली गई और करीब 10 लाख नौकरियां खतरे में हैं।

कृषि क्षेत्र के बाद सबसे ज्यादा 10 करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले टेक्सटाइल सेक्टर की भी हालत खराब है। नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन ने तो बाकायदा अखबारों में विज्ञापन देकर खुलासा किया है कि देश के कपड़ा उद्योग में 34.6 फीसदी की गिरावट आई है। इसकी वजह से 25 से 30 लाख नौकरियां जाने की आशंका है। इसी तरह के हालात रियल एस्टेट सेक्टर में हैं, जहां मार्च 2019 तक भारत के 30 बड़े शहरों में 12 लाख 80 हज़ार मकान बनकर तैयार हैं लेकिन उनके खरीदार नहीं मिल रहे। यानी बिल्डर जिस गति से मकान बना रहे हैं लोग उस गति से खरीद नहीं रहे।

रिजर्व बैंक द्वारा हाल में ही जारी आंकड़ों के मुताबिक बैंकों द्वारा उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज में गिरावट आई है। पेट्रोलियम, खनन, टेक्सटाइल, फर्टीलाइजर और टेलिकॉम जैसे सेक्टर्स ने कर्ज लेना कम कर दिया है। यह मंदी का ही असर है कि अप्रैल से जून 2019 की तिमाही में सोना-चांदी के आयात में 5.3 फीसदी की कमी आई है। जबकि इसी दौरान पिछले साल इसमें 6.3 फीसदी की बढ़त देखी गई थी। निवेश और औद्योगिक उत्पादन के घटने से भारतीय शेयर बाजार में भी मंदी का असर दिख रहा है। निवेशकों के अबतक अरबों रूपये डूब चुके हैं।

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट.

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