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सियासत

आर्थिक मोर्चे पर यह सरकार डिजास्टर है!

अभिरंजन कुमार-

दोस्तो, चूंकि किसी ग्रंथ में ऐसा लिखा नहीं है कि सारे अपच सच कांग्रेस के बारे में ही बोले जाएं, इसलिए आज एक अपच सच बीजेपी के बारे में भी बोल ही देता हूं। आखिर बीजेपी विरोधी भाइयों-बहनों की आत्मा को भी तो किसी दिन शांति मिले!

तो सुनिए। हिंदुत्व और राष्ट्रवाद या यूं कहें कि “हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद” बीजेपी की अपनी विचारधारा है, इसलिए उस ग्राउंड पर उसे कोई नहीं हरा सकता। और इसलिए बीजेपी अभी अगले 9 साल यानी कम से कम 2029 तक तो राज करेगी ही करेगी। यह ब्रह्म सत्य की तरह अटल सत्य है। चाहें तो इसे नोट करके भी रख सकते हैं।

लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि देश केवल “हिंदुत्ववादी राष्ट्रवाद” से नहीं चलेगा। उसे मज़बूत आर्थिक नीतियों का सम्बल भी चाहिए। पर दुर्भाग्य से बीजेपी के पास अपनी कोई आर्थिक नीति है ही नहीं। जो भी है, वह कांग्रेस से उधार ली हुई है। यह अलग बात है कि वह कांग्रेस की नीतियों को ही अपने मुलम्मे में लपेटकर सौ फीसदी शुद्ध, मौलिक और खरा बताना चाहती है। लेकिन यह भला संभव है क्या?

इसीलिए आप देखेंगे कि आर्थिक मोर्चे पर यह सरकार डिजास्टर है। इस हद तक कि पिछले 7 साल में वह ढंग का एक वित्त मंत्री तक नहीं ढूंढ पाई। पूर्व वित्त मंत्री दिवंगत अरुण जेटली जी और वर्तमान मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी का इसमें कोई दोष नहीं, क्योंकि वे तो अपने हिसाब से ही काम करेंगे न!

लेकिन विडंबना यह है कि बीजेपी चाहती यह है कि लोग हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के नाम पर उसकी कांग्रेस-छाप आर्थिक नीतियों का भी गुणगान करें। अनेक लोग तो करेंगे भी, लेकिन सभी लोग क्या ऐसा कर सकते हैं? मुझे तो लगता है कि स्वयं आरएसएस के सभी लोग भी ऐसा नहीं कर पाएंगे।


असल में निम्न वर्ग को शारीरिक और मध्य वर्ग को अपना मानसिक गुलाम बनाने और ज़्यादातर सरकारी बैंकों को लूट खाने के बाद अब पूंजीपतियों की गिद्धदृष्टि किसानों की ज़मीन और उनके उत्पाद से अधिक से अधिक मुनाफा कमाने पर लगी है। किसानों की भलाई के नाम पर किसानों से बड़े छल की तैयारी शुरू हो चुकी है।

इसलिए किसानों से जुड़े सरकार के हालिया कानूनों से मेरी आंशिक सहमति और शेष असहमति है। इधर मैं तात्कालिक घटनाओं पर लिखने से परहेज करना चाहता था, क्योंकि मैं कुछ अन्य गंभीर और बड़े कामों में लगा हूं। लेकिन सवाल हमारे अन्नदाताओं के हितों और उनकी ज़मीन की सुरक्षा का है, इसलिए लिखना ही पड़ेगा।

याद रखिए, मेरी प्रतिबद्धता किसी राजनीतिक दल या सरकार के लिए नहीं, इस देश की आम जनता के हितों के लिए है। सरकार का समर्थन मैंने केवल उन्हीं मुद्दों पर किया है, जो देश और जनता के हित में थे।

धारा 370, सीएए, राम मंदिर, तीन तलाक पर हमने खुलकर सरकार का समर्थन किया, लेकिन अभी किसानों के साथ खड़ा होना होगा।


किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की गारंटी देनी चाहिए – सरकारी खरीद में भी और प्राइवेट खरीद में भी। किसानों को यह गारंटी नहीं देकर हम उन्हें धीरे धीरे बर्बादी की ओर ही ले जाएंगे।

मैं किसानों के साथ खड़ा हूं। यह बात बेमानी है कि उनके आंदोलन को कौन शह दे रहा है या वे किसके इशारे पर आंदोलन कर रहे हैं। लोकतंत्र में विपक्षी दलों को हक़ है कि वह जनता के मुद्दों पर आंदोलन खड़े करे। इसलिए अगर किसानों के आंदोलन के पीछे कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी हों तो केवल इतने से यह आंदोलन गलत नहीं हो जाता।

मान लिया कि सरकारी खरीद में न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा, लेकिन सवाल है कि सरकार प्राइवेट खरीद में भी किसानों के उत्पाद का न्यूनतम समर्थन मूल्य अनिवार्य करना चाहती है या नहीं? आखिर अधिकतम मुनाफे के साथ काम कर रहे प्राइवेट सेक्टर को किसानों को न्यूनतम मुनाफा देने के लिए बाध्य क्यों नहीं किया जा सकता?

एक बात और बता दूं कि अगर आप हर आंदोलन या जमावड़े की तुलना शाहीन बाग के जमावड़े से करेंगे, तो यह गलत होगा। यह स्वस्थ सोच नहीं है कि सरकार या उसकी किसी नीति के विरोध में खड़े हुए हर आंदोलन को शाहीन बाग के समतुल्य बताकर उसे खारिज कर दिया जाए। ऐसा करना अलग-अलग पार्टियों के आईटी सेल को शोभा दे सकता है, लेकिन समाज के सोचने-समझने वाले बुद्धिजीवियों को नहीं।


देश की आर्थिक नीति कैसी होनी चाहिए, यह एक ऐसा सवाल है, जिसके जवाब में पूरा ग्रंथ लिखना पड़ेगा। लेकिन सूत्र रूप में इतना समझ लीजिए कि जो आर्थिक नीति

  1. पर्याप्त संख्या में रोज़गार का सृजन नहीं कर सके
  2. कृषि और किसानों के हितों का संवर्धन न कर सके एवं अपनी ही ज़मीन पर उन्हें मालिक से मज़दूर बना दे
  3. पर्यावरण अर्थात जल, जंगल, मिट्टी, हवा की रक्षा न कर सके
  4. गरीबों और अमीरों के बीच की खाई न भर सके
  5. एक समान शिक्षा व्यवस्था लागू न कर सके
  6. समुचित स्वास्थ्य व्यवस्था को घर घर न पहुंचा सके
  7. माफिया राज और भ्रष्टाचार से मुक्ति न दिला सके
    और
  8. जिसमें आम जन नहीं, पूंजीपतियों का प्रभुत्व हो;

वह कूड़ेदान में फेंकने लायक होती है। धन्यवाद।


मेरी नज़र में–

देश सबसे बड़ा है।

देश के अंदर न सरकार, न दल, न नेता, न पत्रकार; किसान सबसे बड़ा है।

न हिन्दू, न मुसलमान, न ईसाई; मानवता सबसे बड़ी है।

न उद्योग, न निर्माण, पर्यावरण सबसे बड़ा है।

न पिता, न भाई, न बेटे; मांएं, बहनें और बेटियां सबसे बड़ी हैं।

न मंत्री, न सांसद-विधायक; कानून सबसे बड़ा है।

न मैं, न आप; हमारा भविष्य यानी हमारे बच्चे सबसे बड़े हैं।

इन सबसे समझौता कर लूं, यह संभव नहीं है।

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