अभिषेक की यूक्रेन डायरी : “क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?”

Abhishek Upadhyay-

यूक्रेन डायरी (16 मार्च)… ये दुनिया बहुत शानदार लोगों से भरी पड़ी है। यूक्रेन के युद्ध ने मेरी इस सोच को और भी मज़बूत किया है। मैं ऐसे ही नही लिखता हूँ कि इस युद्ध के अनुभवों ने मुझे पहले से कहीं अधिक समृद्ध किया है। मैने इस त्रासदी के बीच मददगारों के इतने हाथ देखे हैं कि ज़ेहन की आखें इंसानियत के उजाले से रौशन हो चली हैं। इन्हें अब घोर अंधेरे में भी सूरज के चलते पांव नज़र आते हैं। यूक्रेन के पोलतावा रेलवे स्टेशन पर तैनात आर्मी का वो जवान मेरी आँखों से उतरता ही नही जो माइनस 10 टेंप्रेचर की उस कांपती रात, ट्रेन के बंद डिब्बे पर अपनी राइफ़ल के बट से लगातार चोट किए जा रहा था। उसके पीछे करीब दो दर्जन महिलाएँ खड़ी थीं। उनके हाथ में बच्चे और आंख में आंसू थे। वे इस ट्रेन के जरिए पोलतावा से पश्चिमी यूक्रेन के लवीव और फिर वहां से बार्डर पारकर सुरक्षित पोलैंड पहुंचने के लिए निकलीं थीं। उनके बच्चे इस भीषण ठंड में ऊनी जैकेटों के भीतर दुबके हुए थे। बीच बीच में कुछ बच्चे अपनी छोटी गोल आँखों से बाहर की दुनिया देखने की कोशिश करते मगर खुले प्लेटफॉर्म पर जारी भीषण ठंड और बर्फ़बारी की मार उन्हें वापस माँ के आंचल में समेट देती। ट्रेन खारकीव से आई थी सो पहले से भरी हुई थी। यूक्रेन के इस शहर पर सबसे भीषण हमला हुआ है। सो यहां से चलने वाली ट्रेनें पहले से ही खचाखच भरी होती हैं।

आखिर कुछ देर बाद ट्रेन का डिब्बा खुल गया। अंदर से गार्ड बाहर निकला। आर्मी के इस जवान ने उसकी कॉलर पकड़ ली और महिलाओं को दिखाते हुए ज़ोर ज़ोर से चिल्लाने लगा। गार्ड अपने तर्क दे रहा था। दोनो यूक्रेनियन में बात कर रहे थे। मगर मुझे इतना ज़रूर समझ आ रहा था कि आर्मी का जवान इन महिलाओं को डिब्बे में बिठाने की लड़ाई लड़ रहा था। आखिर गार्ड उसे लेकर ट्रेन के भीतर गया। उसने जगह देखी, फिर लौटा और एक एक कर सभी महिलाओं व बच्चों को भीतर ले गया। उन्हें गलियारे में बची जगह में एडजस्ट किया। वो फिर नीचे उतरा। ट्रेन चलने को आ गई थी। कुछ महिलाएँ फिर से ट्रेन के दरवाज़े तक आईं। वे उसकी ओर देखकर आभार स्वरूप हाथ हिला रहीं थीं मगर आर्मी का वो जवान महिलाओं की अगली खेप को लाइन में व्यवस्थित कर रहा था कि आने वाली ट्रेन में उन्हें जगह दिलवा सके। उसे पीछे देखने की फुर्सत ही नही थी। वक्त के किसी मोड़ पर स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरू स्वामी रामकृष्ण परमहंस से पूछा था, “क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?” रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया, “हाँ मैने ईश्वर को देखा है और बिल्कुल ऐसे ही देखा है जैसे मैं तुम्हे देख रहा हू्ं।” मैंने भी उस सर्द रात पोलतावा के इस प्लेटफॉर्म पर भगवान को देखा था।

खारकीव की वो रात तो और भी भयावह थी। मैं दिन भर ट्रेन में सफ़र कर रात यहां पहुंचा। स्टेशन पर महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भीड़ थी। अंडरग्राउंड मेट्रो के भीतर तक वे भरे हुए थे। कीव से खारकीव की ओर आती हुई ट्रेन में, मैं और चेतन शायद अकेले ही यात्री थे। मगर खारकीव छोड़ने के लिए तो पूरा शहर उमड़ा हुआ था। रास्ते भर ट्रेन के स्टॉफ से लेकर खारकीव उतरने तक हर टकराती हुई आंख मुझसे एक ही सवाल कर रही थी, कि यहां क्यों आए हो? यहां अब कोई नही आता। यहां सिर्फ़ जाती हुई ट्रेनों के मौसम हैं। उसी रात मेरी आंख के सामने खारकीव स्टेशन के ठीक बग़ल में मिसाइल अटैक हुआ। भीषण सर्दी, उस पर मिसाइल अटैक, खचाखच भरा स्टेशन, एक दूसरे पर गिरते-पड़ते-भागते लोग और उस बीच में वो महिला जो मुझे और चेतन को कपड़ों का एक गठ्ठर दे गई ताकि हम उस पर बैठ सकें…! ये वाकई हैरान करने वाला वाकया था। हम प्लेटफ़ॉर्म के एक किनारे थोड़ी जगह बनाकर बैठ गए थे। ज़मीन इतनी ठंडी थी कि हम बुरी तरह काँप रहे थे। वो अजनबी महिला जिसे हमने इससे पहले अपनी जीवन में कभी नही देखा था, और जिससे शायद आगे कभी नही मिलना होगा, हमारे लिए कपड़ों का एक गठ्ठर लेकर आई। हमें बिठाया। कंधे पर हाथ रखा, मुस्कुराई और फिर चली गई। उसकी ममता में डूबी नज़र मेरे पास रह गई। न उसने लौटाने को कहा और न ही मैने वापिस किया। वो नज़र आज भी मेरी पलकों पर रखी हुई है।

कीव से खारकीव और पोलतावा से लवीव तक मैने स्टेशन के बाहर मददगार हाथों की भीड़ देखी। इन भागते हुए लोगों की मदद की खातिर अपनी जान की बाज़ी लगाकर कुछ लोग काम कर रहे थे। वे इन्हें खाना पहुंचा रहे थे। इनके वास्ते कॉफी का इंतज़ाम कर रहे थे। वे बच्चों के लिए चॉकलेट व खिलौने लेकर आए थे। उनमें से कुछ जोकर के कपड़े पहनकर मासूम बच्चों के आगे नाच नाचकर उन्हें हंसा रहे थे, बहला रहे थे। फिर लिख रहा हूँ कि ये किसी एक स्टेशन, शहर या फिर एक देश की कहानी नही थी। मैं लगातार इसे देख रहा हूँ। महसूस कर रहा हू्ं। यही मैने कोरोना काल में लॉक डाउन के दौरान अपने हिंदुस्तान में देखा जब ग़रीबों और परेशान हालों की मदद की खातिर लोग उमड़े थे। उनके लिए खाना पहुंचा रहे थे। कामवालियों को घर बैठे तनख्वाह दे रहे थे। रोज़ कमाने रोज़ खाने वाले मज़दूरों के घरों में राशन पहुंचा रहे थे। मैं ऐसा बिल्कुल नही कह रहा हूँ कि देश और दुनिया में ऐसे लोगों का सैलाब है मगर वे जहां भी हैं, जितने भी हैं, वे अपनी सच्ची भावनाओं से इंसानियत का ऐसा सैलाब पैदा करते हैं जिसमें मौके की तमाम निराशाएँ और समय के तमाम दुःस्वप्न सदैव के लिए डूब जाते हैं।

मैं इस सफ़र में जिन लोगों से मिला, वे एक से बढ़कर एक शानदार इंसान थे। कीव का हमारा ड्राइवर मैक, खारकीव का ऐंतोन या फिर लवीव का रोमन, सब अद्भुत हीरे थे। मैक जिस वक्त हमें रूसी अटैक से ध्वस्त हुए बूचा के खंडहरों में ले जा रहा था, वो रह रहकर हमारी ओर देखता। उसकी आँखों में हमारी सुरक्षा की फ़िक्र के सवाल थे। हालाँकि इन जगहों पर हम जितना असुरक्षित थे, उतना ही असुरक्षित वो भी था। सामने से आने वाली कोई भी गोली उसकी या फिर मेरी पहचान पूछकर वार नही करती। ये वही जगहें थीं जहां हाल ही में पत्रकारों की जान गई है। इरपिन में न्यूयार्क टाइम्स में काम कर चुके एक अमेरिकी पत्रकार को गोली मार दी गई। एक फ़ॉक्स न्यूज का कैमरामैन और उसके साथ काम कर रही यूक्रेन की एक पत्रकार को भी जान से मार दिया गया। फ़ॉक्स न्यूज का रिपोर्टर बुरी तरह घायल है। अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहा है। मैक इन हालातों में भी कदम से कदम मिलाकर हमारे साथ था। वो भी तब जब हमने न किसी एजेंसी से कोई कार हायर की थी और न ही किसी परिचित के जरिए उसे हायर किया था। जैसे हिंदुस्तान में ओला और उबेर से टैक्सी हायर करते हैं वैसे ही एक रोज़ Uklon टैक्सी एप के जरिए टैक्सी बुलाई। ड्राइवर यही मैक था। उस सुबह वो अजनबी था मगर शाम होते होते अपना हो चला था। फिर हमने कीव में कभी कोई टैक्सी नही हायर की। जब जरूरत पड़ी, मैक आया। तमाम खतरे उठाकर वो हमें उन तमाम खतरे वाली जगहों तक ले गया। उसे अंग्रेज़ी नही आती थी। हमें यूक्रेनियन। हम या तो संकेतों में या फिर ट्रांसलेटर के जरिए जरूरी बातें करते थे। मगर न जाने वो कौन सा धागा था जो हमें बांधकर रखता था।

मेरी उँगलियाँ आज भी एक दूसरे से कसी हुई हैं। शायद वो इंसानियत का धागा आज भी इन्हीं उँगलियों में बंधा हुआ है। तमाम युद्ध, बर्बादी, साज़िश और षड्यंत्रों के बीच भी ये दुनिया शानदार लोगों से भरी पड़ी है। मैं देखता हूँ कि यूक्रेन के शरणार्थियों के लिए यूरोप में लोगों ने घरों के दरवाजे तक खोल दिए हैं। कहीं लंगर चल रहे हैं, कहीं टेंट खड़े किए जा रहे हैं। इन लोगों ने ही इस दुनिया को ज़िंदा रखा हुआ है। मैं अब इस दुनिया को लेकर पहले से अधिक आश्वस्त हूँ। इस युद्ध ने मेरे अनुभवों की झोली को उम्मीदों से लबालब कर दिया है!!

अभिषेक उपाध्याय टीवी9 चैनल के तेजतर्रार रिपोर्टर हैं जो आजकल यूक्रेन में युद्ध कवर कर रहे हैं.



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One comment on “अभिषेक की यूक्रेन डायरी : “क्या आपने कभी ईश्वर को देखा है?””

  • विनय तिवारी says:

    अभिषेक की भगवान रक्षा करें और उनके उद्देश्य को सफल करते हुए उनके मानवीय दृष्टिकोण को हमेशा ऐसे ही बनाए रखें।

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