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मोहब्बत के बदनसीबों में शुमार संजीव कुमार को ड्रीम गर्ल घास नहीं डालती थीं!

वीर विनोद छाबड़ा-

दिल की बात दिल वाले जानें… मोहब्बत को अंजाम तक पहुंचाना हरेक के नसीब में नहीं होता. अपने हरी भाई उर्फ़ संजीव कुमार ऐसे ही बदनसीबों में शुमार थे. वो बेसाख़्ता मोहब्बत करते थे, ‘ड्रीम गर्ल’ से. मगर वो उन्हें घास नहीं डालती थी.

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सुना था, उन्होंने ‘सीता और गीता’ की शूटिंग के दौरान प्रोपोज़ भी किया. मगर ड्रीम गर्ल की तरफ से पॉइंट ब्लैंक ‘ना’ हो गयी. शायद ड्रीम गर्ल का दिल किसी और के पास था. मगर हरी भाई ने हिम्मत न हारी. बताते हैं इस मैदान के वो पुराने खिलाड़ी थे. ‘देवी’ (1970) की शूटिंग के दौरान वो नूतन के क़रीब आ गए. मगर बदले में थप्पड़ खा गए.

सुना गया कि ये थप्पड़ इसलिए रसीद किया गया ताकि नूतन के पति रजनीश बहल को यक़ीन हो जाए कि संजीव-नूतन के बीच ‘कुछ’ भी नहीं चल रहा है. इसकी चर्चा काफी दिनों तक सुखियों में रही.

‘शोले’ (1975) में हरी भाई को फिर से ड्रीम गर्ल के क़रीब आने का मौका मिलते मिलते रह गया. उनके लिए जेलर ठाकुर बलदेव सिंह का किरदार लिखा गया. हरी भाई ने सुना तो फ़ौरन हां कर. इस किरदार को करने के लिए पहले से शादी-शुदा ‘गरम धरम’ धर्मेंद्र भी लपक लिए. मगर उन्हें बताया गया कि ऐसी सूरत में उनके लिए लिखा गया वीरू का किरदार हरी भाई को मिल जाएगा.

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इसका मतलब ये होगा कि हरी भाई और ड्रीम गर्ल बसंती की जोड़ी बनेगी. गरम धरम गहरी सोच में पड़ गए, ड्रीम गर्ल भले ही हरी भाई से खुन्नस खाती है, मगर है तो नर्म दिल औरत ही न. पिघल भी सकती है. आख़िर हरी भाई हैं तो बेहतरीन अदाकार. जाने क्या इमोशनल तक़रीर झाड़ दें और ड्रीम गर्म नरम पड़ जाए.

उन्होंने ठाकुर बलदेव सिंह को ज़हन से निकाल दिया. और रिफ़ेक्टलर मैन को ‘एक्स्ट्रा’ पैसा इस शर्त पर रोज़ाना दिया कि वो ड्रीम गर्ल के साथ शॉट्स के दौरान रिफ्लेक्टर्स सेटिंग में कुछ न कुछ गड़बड़ करता रहे ताकि दोबारा शॉट लेना पड़े. इसी बहाने उन दोनों को करीब रहने का ज़्यादा मौका मिलेगा. ऐसी ट्रिक्स के मामले में हरी भाई बहुत कमज़ोर थे.

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इधर टूटे दिल वाले हरी भाई पर गायिका से नायिका बनीं सुलक्षणा पंडित पर फ़िदा हो गयी. उन दिनों वो उनके साथ ‘उलझन’ (1975) की हीरोइन थीं. सुलक्षणा ने बहुतेरी कोशिश की कि वो परदे के साथ-साथ रीयल लाईफ़ में भी हरी भाई की हीरोइन बन जाए. मगर ऐसा हो न सका.

हरी भाई के ज़हन से ड्रीम गर्ल न निकल सकी. शराब और सिगरेट उनका सहारा बन गयीं. और आख़िर 06 नवंबर 1985 को हरी भाई उसी में हमेशा के लिए डूब गए. महज़ सैंतालीस साल की उम्र थी उनकी. हरिभाई की बेवक़्त मौत से स्तब्ध सुलक्षणा भी गहरे अवसाद में डूब गयीं.

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इन दिनों बहन विजेता के साथ रह रहीं सुलक्षणा सड़सठ साल की हो चुकी हैं, मगर हरी भाई को भुला नहीं पाई हैं. जिन्होंने उन्हें देखा है वो बताते हैं उनकी आंखें जैसे हरी भाई का इंतज़ार कर रही हों.

मोहब्बत होती ही ऐसी है, उम्र भर दिल से कभी नहीं जाती है. अंदर की ख़बर रखने वाले ये भी बताते हैं, दरअसल हरी भाई दिल के हाथों मजबूर थे. उन्हें दिल की कोई ख़तरनाक बीमारी थी. इसका ऑपरेशन कराने वो विदेश भी गए थे. मगर वो ठीक नहीं हो पाए. और इसीलिए उन्होंने सुलक्षणा को न कर दी. वैसे सच ही कहा गया है, दिल की बातें दिल वाले ही जानें.

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