आदर्श संपादक!

दिनेश श्रीनेत-

आदर्श संपादक बनने की पहली शर्त यह है कि आपका सामान्य ज्ञान और सहज बुद्धि औसत से कम हो। इसका लाभ यह होगा कि आप सभी समकक्ष और अपने से जूनियर से हमेशा खुद को असुरक्षित महसूस करेंगे। इस असुरक्षा के चलते आप हर वक्त उनके साथ बदतमीजी से पेश आएँगे और यह जताने की कोशिश करेंगे कि उन्हें कुछ नहीं आता। संपादक बनने की दिशा में यह आपका सबसे पहला और मजबूत कदम होगा।

आदर्श संपादक को नई जगह ज्वाइन करते ही यह देखना होगा कि कौन ईमानदारी से अपने काम से काम रखता है और कौन रात-दिन उनकी चाटुकारिता में लगा है। उसे बहुत सावधानी से उन लोगों को टार्गेट करना है जो अपना काम ईमानदारी से करने में लगे हैं। उनके काम में कमियाँ निकालनी होंगी, उनके प्रमोशन और इनक्रीमेंट रोकने होंगे, उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का प्रयास करना होगा। वहीं चाटुकरिता करने वालों को ज्यादातर समय अपने केबिन में बैठाना ठीक रहेगा। काम करवाने की बजाय उनसे दूसरों की शिकायतें सुनने और उसके अनुसार आगे की रणनीति बनाने में अपना वक्त देना होगा।

जब आदर्श संपादक की प्रताड़ना से काम करने वाले लोग भाग खड़ें हों तो उनकी जगह कई और अयोग्य और चाटुकारों की भर्ती करनी होगी। बस उन्हें ‘काम’ करना आता हो। काम से आशय यहां खबरें लिखने से नहीं बल्कि उसे आपका बिजली का बिल जमा करना, घर की सब्जी लाना, सुबह घर पर आ जाना, शाम को घर पर आना, सोने से पहले तक फोन करते रहना, पत्नी और बच्चों को गाड़ी से घुमाना, हर पांच मिनट पर दांत निपोरना आदि आता हो। आदर्श स्थिति यह होगी कि जब वह फोन करके बताए कि सर मैं पांच किलो आलू लेकर आ रहा हूँ तो बोलें कि दो किलो प्याज भी लेते आना। बदले में मीटिंग में यदि ये कोई घटिया सा आइडिया भी बताएँ तो वाह-वाह करें।

ध्यान रखें ये चाटुकार ही संपादक की असली ताकत हैं। चाटुकार ही आपको महान बनाएंगे। जगह-जगह आपकी मार्केटिंग करेंगे। इससे आपके और चाटुकार फॉलोअर्स पैदा होंगे।

आदर्श संपादक को महिला सहकर्मियों के सामने आते ही अपनी आंखों को एक्स-रे मशीन जैसा बना लेना चाहिए। उन्हें उसी दृष्टि से देखना चाहिए जैसे कई दिनों से भूखा कुत्ता रोटी को देखता है। उसे मेहनती लड़कियों को डांट-फटकार के या उनके काम में कमियां निकालकर भगा देना चाहिए। जो लड़कियां किसी काम को करने के लिए कहने पर नाक और मुंह सिकोड़कर अजीब-अजीब आवाजें निकालें उन्हें अच्छा इन्क्रीमेंट दें।

यदि आप दिल्ली-एनसीआर के आदर्श संपादक बनना चाहते हैं तो आपको दो-चार अफसरों और नेताओं के साथ चाय पीते वक्त किए गए गॉसिप के आधार पर ‘सत्ता के गलियारों से’ टाइप घटिया कॉलम जरूर लिखना चाहिए और गाहे-बगाहे इसका जिक्र करके अपनी राजनीतिक समझ की धौंस अवश्य दिखानी चाहिए। दिल्ली एऩसीआर में संपादक बनने के इच्छुक लोगों को कोशिश करके एकाध बार विदेश जाना चाहिए और वहां का जिक्र ऐसे करना चाहिए जैसे कि आप हर शनिवार इतवार वहां जाते हों। उदाहरण के लिए- स्विटजरलैंड में टमाटर बहुत महंगे मिलते हैं- टाइप के जुमले बोलते रहें।

अंगरेजी की किताबें खरीद लें, चाहें तो रद्दी वाले के यहां से भी ले सकते हैं। उन्हें अपनी टेबल पर सजा लें। इन किताबों को पढ़ने की जरूरत नहीं। उनके बारे में विकीपीडिया से दो-चार लाइनें रट लें और जरूरत पड़ने पर वही बोल दें।

होनोलुलु में पत्रकार कैसे काम करते हैं, दिन में एक बार अवश्य बताएं।

यदि कोई आपको नमस्ते करना भूल गया है तो उसे दिन में किसी वक्त रोककर बताएँ कि आजकल तुम्हारी खबरों में मजा नहीं आ रहा है।

हर सुबह ऐसी जगह जाएँ जहां कोई मुर्गा हो। मुर्गे के साथ गरदन अकड़ाने की नियमित प्रैक्टिस करें।

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Comments on “आदर्श संपादक!

  • Prakash Hindustani says:

    ऐसे आदर्श सम्पादक सिर्फ नोएडा में ही नहीं, देश भर में मिलेंगे। इंदौर में भी हुए हैं और हैं ऐसे सम्पादक। जो भी लिखा खूब लिखा। सही लिखा। यथार्थ !

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  • Dinesh ji you wrote actual face and fact of journalism. I appreciate. Mr Bhupendra Singh (amar ujala delhi ncr) is a big example of this article. His gang is active, but company owner does not know any thing about the same. Singh does not know good Hindi, always speaks English language but publishing Hindi Newspaper. He doesnt have right hindi words but pretends like he knows very well. He maintains 3 and 4 Chatukars in office to manage himself and for hide his weakness. This is big and learning chapter of Hindi media, unfortunatly.

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  • shyam lal sharma says:

    दिनेश जी ! आज के दौर के एक आदर्श संपादक की परिभाषा तो आपने बखूबी बता दी, जो भी लिखा खूब लिखा, सही लिखा, यथार्थ लिखा ! अब लगे हाथ ऐसे सम्पादकों से बचने का भी उपाय बता दीजिये तो बहुत बेहतर होगा।

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