राजुल जी का ये अपनत्व देख मेरा सारा डर निकल गया!

हरेंद्र मोरल-

लगभग चार साल पुरानी बात है लगभग इन्हीं दिनों की। अमर उजाला नोएडा में काम करता था। दाल रोटी ठीक ठाक चल रही थी। काम ठीक कर लेते थे तो अखबार में थोड़ी बहुत पूछ भी थी। इसी बीच एक संपादक जी से किसी बात को लेकर तनातनी हो गई। बड़े संपादक थे तो बात दिल पर ले गए।

संपादक जी रोज हममें कमी निकालने क़ा मौका ढूंढते, उनका एक चेला भी इसी काम पर लगा रहता। हम भी काफी दिनों तक उन्हे गच्चा देते रहे, उन्हे कमी निकालने क़ा मौका नहीं दिया। लेकिन पुरानी छुट्टी को लेकर एक दिन मामला फंस गया और संपादक जी को हमारा टेंटुआ दबाने क़ा मौका मिल गया। संपादक जी ने पूरा जोर लगाकर हमारा तबादला करवा दिया शिमला। जहां मैं हमेशा से नौकरी करने क़ा ख्वाब देखता था।

कोई दूसरा समय होता तो मैं संपादक जी को धन्यवाद देते हुए दौड़ा चला जाता लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उस समय वहां जाना संभव नहीं था। कई दिन बड़ी उलझन में बीते और अंततः हमने नौकरी छोड़ने क़ा फैसला कर लिया। इसी बीच कुछ शुभचिंतकों ने सलाह दी की एक बार भाईसाब से (अखबार के मालिक राजुल माहेश्वरी जी) बात कर लो।

मैंने उनके बारे में काफी सुन रखा था कि भले आदमी हैं कर्मचारियों की पूरी मदद करते हैं। वैसे भी ये अमर उजाला की परंपरा है कि कर्मचारियों क़ा हरसंभव ख्याल रखा जाता है। मैं समय लेकर सीधा उनसे मिलने पहुंचा। उनके केबिन में पहुंचा और अपना परिचय दिया। देखते ही मुस्कुराए बोले- काफी सुन रखा है तुम्हारे बारे में। संपादक से क्यों झगड़ते हो भाई। उनका ये अपनत्व देख मेरा सारा डर निकल गया और मैंने शुरू से लेकर आखिर तक सारा किस्सा सुना दिया।

इत्मीनान से मेरी बात सुनी और बोले- बताओ क्या चाहते हो, नोएडा तो फिलहाल संभव नहीं बाकी जहां कहोगे भेज दूंगा। मैंने तपाक से कहा- सर मेरठ भेज दीजिये वहां मेरा घर भी है पिछले चार पांच साल से घर से बाहर ही हूँ। बोले- जाओ HR से अपना ट्रांसफर लेटर लेते जाओ। राजुल जी से मिलकर समझ आ गया क्यों लोग इस अखबार के पारिवारिक माहौल और परंपराओं की तारीफ करते हैं।

राजुल जी के प्रति दिल एक अलग ही श्रद्धा से भर उठा। खैर हमने अपना सामान बांधा और अगले दिन आ धमके अमर उजाला मेरठ ऑफीस। यहां आते ही कुछ परिस्थितियां ऐसी हुईं की अखबार की दुनिया को अलविदा ही कह दिया। इसकी कहानी फिर कभी।

आज जब अमर उजाला क़ा 75वां स्थापना दिवस है तो हमें भी अपने अमर उजाला के पुराने दिन याद आ गए। मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ की अमर उजाला में बिताए गए 5-6 साल मेरे पत्रकारिता जीवन के सबसे बेहतरीन साल रहे।

इस दौरान वहां जो कुछ भी सीखा समझा जाना उसने जीवन में पत्रकारिता के सिद्धांतों की मजबूत नींव तैयार की और उसी नींव ने हमें एक योग्य पत्रकार और बेहतर इंसान बनने के लिये प्रेरित किया। मेरी शुभकामनाएं हमेशा अमर उजाला अखबार के साथ हैं। अब जब तमाम अखबार सत्ता की गुलामी में झुके पड़े हैं और कर्मचारियों के प्रति निर्मोही हो चुके हैं तब यह उजाला हमेशा अमर रहना चाहिए। तस्वीर अमर उजाला में काम करने के ही दिनों की है। जब सुबह सुबह वोट डालकर छुट्टी वाले दिन भी ड्यूटी बजाने पहुंच गए थे।



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