रवीश कुमार ने पूछा- ‘अंबानी अपने परिवार के साथ अपना टीवी चैनल देख पाते होंगे?’

रवीश कुमार-

गोदी मीडिया सरकार की जूती चाट ले लेकिन जब सरकार को मीडिया पर बोलना होता है तब वह भी वही बात कहती है जो हम लोग कहते आए हैं। सरकार के पास गोदी मीडिया के समर्थन में कहने के लिए कुछ नहीं होता है। वह जानती है कि यह मीडिया नहीं है। उसका ग़ुलाम है। सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने गोदी मीडिया के डिबेट को लेकर जो कहा है, उससे साफ़ है कि वे भले गोदी मीडिया देखते होंगे, मगर बात करते हैं वही जो प्राइम टाइम में कही जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को जो कहा, पहले भी कहा है। हाई कोर्ट ने कहा है। हज़ारों करोड़ों के विज्ञापन से लैस गोदी मीडिया बदल ही नहीं सकता है। उससे पत्रकारिता नहीं हो सकती है।

हालाँकि अनुराग ठाकुर की आलोचना बहुत सीमित संदर्भ में है। ऐसा लगता है उन्हें केवल चीखने-चिल्लाने से ही दिक़्क़त है, वे उस बहस के लिए क़ायदा चाहते हैं जो आज ज़मीनी और खोजी पत्रकारिता का विकल्प बन गया है। डिबेट में पार्टी से ही कौन जाता है, क्या सरकार से कोई जाता है? तब जवाबदेही कैसे आएगी? एक बदतमीज़ और नफरती प्रवक्ता होता है, जो कुतर्कों का बंडल लेकर बैठा रहता है।

डिबेट हमेशा सत्ता के काम आती है। उसके विषयों और बहस के तरीक़ों को मैनेजर करना आसान होता है। आठ साल से इस देश की पत्रकारिता हर तरह से कुचली गई है। पत्रकारों को जेल भेजा गया। आई टी सेल लगाकर भद्दे तरीक़े से गालियाँ दिलवाई गईं। अब केवल डिबेट में चिल्लाने से दिक़्क़त है? पूरा इकोसिस्टम तबाह है और एक खिड़की का पल्ला हिल रहा है, उस पर अनुराग ठाकुर बोल रहे हैं।

अंबानी हों या अदाणी जितना मीडिया ख़रीद लें लेकिन इतना पैसा किस चीज़ में निवेश कर रहे हैं? निश्चित रुप से पत्रकारिता में नहीं। अंबानी के ही चैनलों को देख लीजिए। क्या उनके बाक़ी प्रोडक्ट भी इतने ही रद्दी हैं, जितने टीवी चैनल?

मुझे तो शक है कि अंबानी अपने परिवार के साथ अपना टीवी चैनल देख पाते होंगे। अपने मेहमानों के बीच अपने टीवी चैनलों को ऑन कर उन्हें देखने के लिए कहते होंगे कि ये मेरे दर्जनों चैनल हैं। मेहमान स्क्रीन देखकर ही समझ जाएंगे कि दुनिया के ये बड़े बिज़नेसमैन प्लास्टिक की साबुनदानी बनाने लगे हैं।

कोई भी बिज़नेसमैन शानदार प्रोडक्ट बनाना चाहता है, कार बना रहा है तो कार की दुनिया में श्रेष्ठ बनाना चाहता है, केवल न्यूज़ चैनल ही है, जिसमें करोड़ों रुपये टीवी में डाल कर प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति की ग़ुलामी में घटिया चैनल बना रहे हैं। बेहतर है, इस बात को समझ लें, न समझ आए तो कोई बात नहीं लेकिन मंत्री को जब भाषण देना होगा तब वे वही कहेंगे जो हम कहते आए हैं। वे अपनी महफ़िलों में उन ग़ुलाम ऐंकरों को पत्रकारिता की मिसाल नहीं दे सकते। उन्हें पता है कि घटिया चीज़ों की मिसाल नहीं दी जाती है।



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