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अनित्य नारायण मिश्र उर्फ बेबाक जौनपुरी ने 2008 छंदों में पूरी राम कथा कह डाली!

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विकास मिश्रा-

अनित्य नारायण मिश्र उर्फ बेबाक जौनपुरी देश के जाने माने कवि हैं। कोरोना काल में उन्होंने एक विलक्षण काम किया। पूरी रामायण और राम चरित मानस का सार उन्होंने दोहों में रच दिया। बाल कांड से लंका कांड तक। 2008 छंदों में पूरी राम कथा उन्होंने कह डाली है, जिसमें 1938 दोहे हैं और 70 मत्त सवैया छंद हैं। दोहों में कही गई रामकथा अब पुस्तक के रूप में सामने आई है। नाम है- ‘अथ श्री महा आनंद रामायण दोहावली’।

बिना राम कृपा के राम का आख्यान पूरा हो नहीं सकता था और मैं मानता हूं कि अनित्य नारायण जी पर राम की पूरी कृपा है। दोहावली की प्रस्तावना की शुरुआत में ही उन्होंने लिखा है-
राम कथा लिखना कहूं, काज नहीं आसान।
राम कृपा ही जानिए, लिखा राम गुणगान।

राम कथा अनंत है। सबने अपने अपने हिसाब से इसे देखा है। बचपन में कार्तिक महीने में मैं अपनी दिद्दा यानी ताई के साथ महीने भर अयोध्या रहता था। हम लोग वहां महंत छबीले बाबा के यहां रहते थे। छबीले बाबा राम कथा पर कहते थे-
राम रवन्ना दुइ जन्ना
एक छत्री एक बाभन्ना
बा ने वा की नार चुराई
तब दोनों में हुई लड़ाई
बस एतना ही कथन्ना
इस पर रचे तुलसिया पोथन्ना।

(राम और रावण दो लोग थे, एक क्षत्रिय थे दूसरा ब्राह्मण। ब्राह्मण ने उनकी पत्नी को चुरा लिया, उस पर दोनों में लड़ाई हुई, बस इतनी सी कथा है, जिस पर तुलसीदास ने पोथी रच दी)

सही बात है। कथा तो करीब-करीब इतनी ही है, लेकिन जब महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की तो उस काल परिस्थिति को सामने रख दिया। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस की रचना की तो राम के बहाने उन्होंने जीवन पद्धति रख दी। जो पूर्ववर्ती महर्षियों ने लिखा था, उसे सरल शब्दों में रख दिया। उदाहरण आप खुद देख लीजिए। संस्कृत में सूक्ति है-

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्।
अब गोस्वामी तुलसीदास इस पर लिखते हैं-
परहित सरिस धरम नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।

अब अनित्य नारायण मिश्र ने भगवान राम पर ये दोहावली 21वीं सदी में लिखी है। देश काल परिस्थिति का इन्होंने ख्याल रखा है। रामकथा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं है। ये पुस्तक विवादों के लिए नहीं, बल्कि जिनके हृदय में प्रभु श्रीराम बसते हैं, उनके हृदय में अपना स्थान बनाने के लिए रची गई है।

बेबाक जी ने बहुत ही सरल शब्दों में दोहावली रची है, इसका मतलब ये है कि इसका शब्दार्थ करने या पढ़ने की जरूरत नहीं है। सब आसानी से समझ में आता है। पूरे ग्रंथ में गेयता है। इसमें दोहे हैं तो सवैया छंद भी है।

इसे यूं ही पढ़ सकते हैं, गाते हुए पढ़ सकते हैं। इस पुस्तक को आप खुद पढ़ सकते हैं, अपने बच्चों को पढ़ने के लिए दे सकते हैं। मित्रों को, रिश्तेदारों को उनके जन्मदिन, शादी की सालगिरह या फिर ऐसे ही किसी और अवसर पर उपहार में भी दे सकते हैं। 290 रुपये में अद्भुत उपहार।

बेबाक जी मेरे मित्र हैं, सुहृद हैं। मैं इनकी कविताओं, गीतों का प्रशंसक हूं। गजब की तान लेकर ये कविताएं पढ़ते हैं।

मैंने महा आनंद रामायण दोहावली भी उनके मुख से सुनी है। फोन पर सुनी है। सम्मुख भी सुनी है। अगर आप भी सुनेंगे तो उनके प्रशंसक बन जाएंगे। ये पोस्ट जो मैं लिख रहा हूं ये एक मित्र की पुस्तक पर एक मित्र की आनंदोक्ति है, समीक्षा नहीं। एक तो पुस्तक दोहों-छंदों में है और मैं कोई कवि नहीं, जो इनका आकलन करूं। दूसरी बात ये कि इस ग्रंथ की रचना भगवान श्रीराम के जीवन पर हुई है, इसकी समीक्षा करने की मेरी हैसियत नहीं है।

अनित्य जी की इस पुस्तक को हिंदी श्री पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है। अमेजन और तमाम दूसरी वेबसाइट पर ये उपलब्ध है।

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