सरकार के भोंपू मीडिया के लिए किसान आंदोलन एक सबक

शिरीष खरे-

किसान आंदोलन से अब तक हासिल क्या?

  1. इस आंदोलन ने मोदी सरकार के अंतर्विरोधों को सतह पर ला दिया है. उदाहरण के लिए, किसानों के प्रति अपनाई जाने वाली मानसिकता की बात करें तो प्रधानमंत्री की अगुवाई में एक ओर केंद्रीय मंत्री कह रहे हैं कि किसानों को फसल बेचने पर रियायत मिलेगी. लेकिन, दूसरी तरफ ठीक इसी समय एमपी में शिवराज और हरियाणा में खट्टर कह रहे हैं कि दूसरे राज्यों से फसल बेचने वाले किसानों को जेल भेजा जाएगा और उनके ट्रैक्टर वगैरह भी जब्त होंगे.
  2. इस आंदोलन ने मोदी सरकार की पिछली तमाम तानाशाही कार्यवाहियों के विरुद्ध भी मूल्यांकन का पर्याप्त अवसर दे दिया है. वहीं, यह भी स्पष्ट हुआ है कि संकट के समय मजबूत कही जाने वाली मोदी सरकार असल में इस हद तक कमजोर है कि छटवीं बार वार्ता की नौबत आ गई. प्रश्न है कि जब सरकार की तरफ से बातचीत करने वाले मंत्रियों के पास कोई अधिकार ही नही हैं तो ऐसी पांचों वार्ताओं का क्या औचित्य? क्योंकि, ये मंत्री किसानों को लिखित में अपना प्रस्ताव देने तक की स्थिति में नहीं थे. दरअसल, किसानों से संवाद के नाम पर मंत्रियों के पास ‘भ्रम निवारण’ के अलावा कोई एजेंडा नहीं था. इस स्थिति में दुनिया ने देखा कि कोरोना लॉकडाउन का लाभ उठाकर किस तरह भारत में मोदी सरकार ने अपना काम कर दिखाया और अब पीछे हटने को भी तैयार नहीं है.
  3. किसानों के इस संघर्ष और उन्हें मिल रहे जबर्दस्त समर्थन को विभाजन के नजर से देखने तथा उसे बदनाम करने वाले सरकार के ‘भोंपू मीडिया’ के लिए भी यह आंदोलन एक सबक हो सकता है. सबक यह कि वे भी सरकार की तरफ से मुहैया भोजन (दलाली) की तीक्ष्ण गंध को पहचाने और सरकारी आमंत्रण पर प्रायोजित होने वाले हर प्रकार के ‘जलपान’ का परित्याग करना सीखें.

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