अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा, जल्द घऱ लौट आओ नीलाभ, सब ठीक हो जाएगा : भूमिका द्विवेदी

हिंदी के विख्यात साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र एवं जानेमाने रंगकर्मी, लेखक नीलाभ अश्क की पत्नी भूमिका द्विवेदी का इन दिनो रो-रोकर बुरा हाल है। नीलाभ उन्हें एक सप्ताह पूर्व बिना कुछ बताए छोड़कर चले गए हैं। उनका कहीं कुछ अता-पता नहीं है। वह इस समय काफी डरी-सहमी हुई हैं। पिछले दो दिन अस्पताल में रही हैं। कई दिनों से खाना नहीं खाया है। किसी तरह भड़ास4मीडिया से बात करने पर सहमत होने के बाद वह पूरी वार्ता के दौरान एक ही बात की रट लगाती रहीं कि प्लीज, चाहे जैसे भी, नीलाभ से मुलाकात करा दीजिए। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। वह लौट आएं। सब ठीक हो जाएगा।

गौरतलब है कि नीलाभ अश्क लगभग एक सप्ताह पूर्व घर से जाते समय ढेर सारे महंगे सामान लैपटॉप, कंप्यूटर, चेकबुक, एटीएम कार्ड, डेस्कटॉप, सभी फोन सेट, किताबें, आभूषण, कपड़े-लत्ते, चाँदी के सारे सिक्के, एड्रेस-फोन के सारे रजिस्टर, कुछ बर्तन, भूमिका द्विवेदी की माँ के कंगन, डिज़िटल कैमरा आदि उठा ले गए हैं। उनकी अप्रत्याशित फरारी पर साहित्यकारों, रंगकर्मियों और मीडिया जगत में तरह तरह की बातें पिछले कई दिनों से गूंज रही हैं। 

भूमिका द्विवेदी कहती हैं- नीलाभ घर छोड़ गए हैं। मुझे खुद समझ नहीं आ रहा है कि उन्होंने मुझे विश्वास में लिए बगैर इतना बड़ा कदम आखिर किस उद्देश्य से उठा लिया। मेरे पास उनके अलावा और है कौन। मैंने तो उनसे जुड़ते समय ही अपने सारे रास्ते जानते-बूझते हुए ये मानकर बंद कर लिए थे कि अब पूरा भविष्य उनके साथ गुजारना है। जब तक है, साथ रहेंगे। सिर्फ मैं हूं। मेरे पास फूटी कौड़ी नहीं है। 

उन्होंने कड़ा प्रतिवाद जताते हुए कहा कि मिथ्या आरोप सामने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि मेरी निगाह उनकी धन-संपदा पर रही है। उनके पास कौन सी धन-संपदा है। मेरे लिए वही सबसे बड़ी संपत्ति हैं। मेरे श्वसुर उपेंद्र अश्क की संपत्ति का बड़ा हिस्सा तो नीलाभ के भाई ले चुके हैं। नीलाभ के पास उनकी वसीयत का बचा क्या है। एक छोटा सा मकान हिस्से में मिला था, उसे भी बेंचकर हम दोनो दिल्ली आकर रहने लगे। शादी के समय ही अपना मकान भी उन्होंने मेरे नाम कर दिया था। आज घर खाली पड़ा है। उनके जाने के बाद से मेरा घर खर्च मां के भरोसे चल रहा है। मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन ऐसा भी वह दे जाएंगे, जब मुझे मायके के भरोसे, मां के अकाउंट से पैसे निकाल कर दिन गुजारने होंगे। 

उन्होंने कहा कि वह तो चले गए। तीन माह से घर में काम करने वालों को पैसा नहीं दिया गया है। बिजली का बिल नहीं भरा गया है। वह फोन, नेट रिचार्ज करने वालों तक को मना कर गए हैं। मैंने पिछले दो दिन से इसी चिंता में खाना नहीं खाया है। इसी चिंता में स्वास्थ्य बिगड़ गया है। दो दिन अस्पताल में रह कर लौटी हूं। मैंने पुलिस वालों के सामने थाने में रोया-गिड़गिड़ाया। पुलिस वालों की नीलाभ से फोन पर बात भी हुई है। पुलिस वालों ने भी उन्हें समझाया है कि लौट आएं।  

भूमिका द्विवेदी ने बताया कि वह हमारे साझा अकाउंट के सारे कागजातों के साथ ही सारे ढाई लाख रुपए भी निकाल ले गए। दूसरे खाते में लगभग अस्सी हजार रुपए थे। वे सारे रुपए भी वह निकाल ले गए। अब मेरी बड़ी चिंता घर खर्च की सामने है। मैं क्या करूं। वही घर-गृहस्थी के लिए एक मात्र मेरे आर्थिक संरक्षक थे। यही सब सोच-सोचकर मैं पिछले एक सप्ताह से जैसे बेमौत मरी जा रही हूं। 

उन्होंने बताया कि मैंने अपने हालात से विभूतिनारायण राय, दूधनाथ सिंह, ममता कालिया, जाने उनके-अपने किस किस परिचित-सुपरिचितों से हाथ जोड़ा है। उन सबके सामने रो-गिड़गिड़ा रही कि किसी तरह नीलाभ को वह मुझसे मिला दें। उन्हें घर लौटा ले आएं। सब ठीक हो जाएगा। अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। सामने बैठ कर बात कर लेंगे। सब ठीक कर लेंगे। लेकिन अभी तक मुझे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। नीलाभ को अपनी जिम्मेदारियों से इस तरह भागना नहीं चाहिए। 

उन्होंने ये भी जानकारी दी कि मेरा भाई खो चुका है। उसके गायब होने की वर्षों से सीबीआई जांच चल रही है। पिछले दिनो सीबीआई वाले मेरी मां से कुछ पूछताछ करने के लिए घर आना चाहते थे। उस समय नीलाभ साथ थे। उन्हें सीबीआई वालो के घर आने को लेकर मैंने कुछ विचलित सा होते देखा था। शायद उन्हें लगा हो कि कहीं उनकी भी किसी गतिविधि पर सीबीआई की नजर न पड़ जाए। ऐसा मेरा अंदेशा है। कहीं वैसी किसी बात पर तो वह बच निकलने के गरज से ऐसा कदम भय वश उठा लिए हैं! 

वह कहती हैं कि मैं तो उनकी हर तरह से सेवा कर रही थी। उम्र का इतना बड़ा फासला होते हुए मैंने एक साथ रहने के कठिन भविष्य का दृढ़ता से संकल्प लिया था। उस समय मुझे अपनो के ही उपहास का पात्र बनना पड़ा था। मैंने ऐसी किसी बात की चिंता न करते हुए उन्हें अंगीकार किया था। एक स्त्री का सबसे बड़ा सपना संतानवती होना रहता है। उनके साथ जुड़ने के साथ ही मेरी आत्मा ने पहले से ही वह सपना भी मरा हुआ मान लिया था। मेरी उन सारी कुर्बानियों का आज मुझे ये सिला दिया जा रहा है। 

उनका कहना है कि मैं आज भी खुले मन से बस इतना चाहती हूं कि वह साथ हो जाएं। लौट आएं। उन्होंने कोई चोरी-डाका नहीं डाला है। ऐसा कोई अपराध नहीं किया है। सबके घर परिवार में ऐसा होता है। घर टूटा नहीं है, लेकिन इस समय की मामूली नादानियां भी हम दोनों के भविष्य के लिए बहुत भारी पड़ सकती हैं। बेहतर होगा कि जो हुआ, सो हुआ, घर फिर से सलामत हो जाए। वह साथ आ जाएं। चाहे जहां भी हों, वह चाहे जिनके बीच बैठाकर मुझसे चाहे जो भी बात करना चाहें, मैं उसके लिए तैयार हूं। 

उन्होंने कहा कि जब हम दोनो अलग अलग होंगे तो उसमें ढेर सारे गलत लोगों को अवसर साधने का मौका मिल जाएगा। कई ऐसे लोग हैं, जिनमें से किसी की उनसे और किसी की मुझसे खुशी-नाखुशी रही है। खराब समय में ऐसे लोग अनावश्यक रूप से सक्रिय हो जाते हैं। मैं नहीं चाहती कि हमारे दांपत्य जीवन में कोई तीसरा सरपंच बने। हम अपने विवेक से आपस में सब ठीक कर लें। यही मेरी, और उनकी भी समझदारी होगी।  

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Comments on “अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा, जल्द घऱ लौट आओ नीलाभ, सब ठीक हो जाएगा : भूमिका द्विवेदी

  • karara jawab says:

    भाई बहुतई बड़ी नौटंकी की तो अभी बस भूमि‍का ही शुरू हुई है। नौटंकी का पर्दा तो उसी दि‍न उठ गया था जब मोहतरमा ने अश्‍कों की परवाह न करते हुए उठा लोटा मार सोंटा करके बुजुर्ग को घायल करके बाबा रामदेव बन छुपकर नि‍कलने पर मजबूर कर दि‍या था। सीबीआई से अगर कोई डरे तो वो डरे जि‍सके घर खानदान में गुंडे बदमाश हों, जि‍सके दस तरह के नेताओं से संबंध हों…वो क्‍यों डरे जो जीवन भर अपनी कलम से रोटी बनाकर खाता और दूसरों को भी खि‍लाता रहा हो। रही बात संतानवती होने के सपने के बारे में तो कपोल कल्‍पि‍त कुरबानी के चलते ही अश्‍क जी की बलि चढ़ाने की सोची थी इन मैडम ने। नीलाभ जी, आप बि‍लकुल न डरि‍ए।

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  • bhumika dwivedi ashk says:

    करारा जवाब जी सामने तो आएं…. बाबा रामदेव को अपने निगाहबानी में याथ साएं..
    जो अपना नाम तक ना प्रकट कर सके, उसकी बातों को मैं क्या कहूँ…

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