बिड़ला पुरस्कार का ग़ुरूर/कुलीनता तोड़ने के लिए कुछ किया जाना चाहिए!

कृष्ण कल्पित-

जिस तरह जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल (JLF) का साहबी गुरूर तोड़ने के लिए प्रगतिशील लेखक संघ के लेखक साथियों ने समानांतर साहित्य उत्सव (PLF) का आविष्कार किया था (जो अब जन साहित्य उत्सव के नाम से जारी है), उसी तरह बिड़ला पुरस्कार का गुरूर/कुलीनता तोड़ने के लिए भी कुछ किया जाना चाहिए । राजस्थान के सभी लेखक कवियों के सामने मैं यह प्रस्ताव रख रहा हूँ ।

महाकवि बिहारी सम्मान के नाम से एक पुरस्कार शुरू किया जाए । महाकवि बिहारी पुरस्कार की जयपुर में शुरुआत राजस्थानी के कवि-गीतकार कल्याणसिंह राजावत ने की थी । कई कवियों को यह पुरस्कार 1980 के आसपास दिए गए । 1982 में के के बिरला फॉउंडेशन ने राजस्थान के लेखकों को दिए गए पुरस्कार का नाम जाने अनजाने बिहारी पुरस्कार रखा । जो भी था यह अनैतिक था । उसके बाद राजावत जी अस्वस्थ हो गये और महाकवि बिहारी सम्मान बन्द हो गया ।

प्रस्ताव यह है कि कल्याणसिंह राजावत की मित्र परिषद के महाकवि बिहारी सम्मान को पुनर्जीवित किया जाए । इसकी राशि एक लाख रुपये प्रस्तावित है जो सब लेखक मिलकर सहयोग से इकठ्ठा करेंगे ।

इस पुरस्कार की ज्यूरी में राजस्थान के हिन्दी राजस्थानी उर्दू के श्रेष्ठ लेखक कवि होंगे जो हर वर्ष के श्रेष्ठ रचनाकार का चयन करेंगे । बैठक की कार्यवाही का जीवंत प्रसारण किया जाएगा।

यह लेखकों द्वारा लेखकों को दिया जाने वाला विश्व का अनूठा पुरस्कार होगा। यह महाकवि बिहारी सम्मान उसी के समानांतर जयपुर में दिया जाएगा जब केके बिड़ला बिहारी पुरस्कार दिया जाएगा।

यह एक प्रारम्भिक प्रस्ताव है। इस पर और सोचा जा रहा है। आप भी राजस्थान की मनीषा-रक्षण के इस यज्ञ में समिधा दे सकते हैं। अपने सुझाव दीजिये सहयोग दीजिये। यह मेरा प्रस्ताव है इस लिए मैं आजीवन यह सम्मान/पुरस्कार नहीं लूँगा।


के के बिरला बिहारी पुरस्कार की ज्यूरी का अध्यक्ष ओम थानवी को किसने बनाया जबकि थानवी का साहित्यिक योगदान लगभग शून्य है । ले दे कर थानवी ने एक पतली-सी यात्रा-वृतान्तनुमा रिपोर्ताज़ की किताब लिखी है जो शुद्ध पत्रकारिक लेखन है । इसे ही ‘वॉर एंड पीस’ समझकर नन्दकिशोर आचार्य ने थानवी को बिहारी पुरस्कार दे दिया । आचार्य थानवी के रिश्तेदार भी हैं – इस तरह भी यह पुरस्कार अनैतिक ढंग से दिया गया ।

मुझे नहीं पता कि बिहारी पुरस्कार की ज्यूरी में कौन लोग हैं । एक कोई जोधपुर का वैष्णव है जो कुछ दिन पहले ग़लती से मुझसे टकरा गया था । ज्यूरी के एक सदस्य समकालीन हिन्दी कविता के प्रमुख कवि हेमंत शेष हैं । शेष को मैं कलावादी कवियों में नन्दकिशोर आचार्य से बड़ा कवि मानता हूँ । एक सदस्य प्रसिद्ध लेखक और आदिवासी-विमर्शकार हरिराम मीणा हैं । इन दोनों लेखकों ने ओम थानवी की अध्यक्षता में काम करना क्यों स्वीकार किया, ये वे ही जान सकते हैं ।

अभी भी मैं हेमंत शेष और हरिराम मीणा से आग्रह करता हूँ कि उन्हें बिहारी पुरस्कार की ज्यूरी से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए । किसी भी लेखक को उस ज्यूरी में नहीं रहना चाहिए जिसका अध्यक्ष एक ग़ैरसाहित्यिकार हो !

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