वरिष्ठ पत्रकार बिशन कपूर की पुण्यतिथि पर काफी से लेकर इमरजेंसी की चर्चा

लखनऊ। वरिष्ठ पत्रकार व ब्लिट्ज के ब्यूरो प्रमुख बिशन कपूर की 34वीं पुण्यतिथि 7 सितम्बर को उनकी स्मृति में हजरतगंज काफी हाउस साठ के दशकों की यादों में डूब गया। चर्चा काफी हाउस में बिशन कपूर की मेज से लेकर इमरजेंसी में उनकी निर्भीक पत्रकारिता पर हुई। बिशन कपूर के  बहुआयामी व्यक्तित्व व कृतित्व पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी तथा काफी की चुस्कियों का आनन्द लिया। एक दौर था जब पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर, विश्वनाथ प्रताप सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी, वीरबहादुर सिंह, साहित्यकार अमृतलाल नागर, यशपाल और भगवती चरण वर्मा के साथ बिशनकपूर काफी हाउस में देश दुनिया से जुडे मसलों पर चर्चा करते थे।

हिन्दुस्तान टाइम्स की स्थानीय संपादक सुनीता ऐरन ने बिशन कपूर को याद करते हुए कहा कि बिशन कपूर निर्भीक व साहसी थे  उनके सम्बन्ध सभी राजनीतिक दलों के नेताओं से अत्यन्त करीबी थे किन्तु जहां खबरों का मामला हो वह किसी को नही छोडते थे। उनसे समझने वाली बात यह है कि करीबी का मतलब यह नही कि सच्चाई छोड दी जाय। यह वह दौर था जब पत्रकारिता में महिलाएं नही थी, उस समय हमारा संर्घष का दौर था, किन्तु उन्होने हमें आगे बढने का हौसला दिया।

भाजपा नेता व पूर्व सांसद लालजी टण्डन, प्रदेश सरकार के राजनीतिक पेंशन मंत्री राजेन्द्र चौधरी, जस्टिस हैदर अब्बास, उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अनुशासन कमेटी के चेयरमैन रामकृष्ण द्विवेदी, क्रांति कुमार, वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह, पत्रकार अजय कुमार, जेपी शुक्ल ने  साठ के उस दौर को अपने अपने तर्कों से जीवन्त किया। बात इमरजेंसी में पत्रकारिता से बिशन कपूर के निर्भीक व्यक्तित्व तक गई। चर्चा में शकील सिद्धिकी, रमेश दीक्षित, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता क्रांति कुमार व सत्यदेव त्रिपाठी ने भी अपने विचार रखे।

वामपंथी होते हुए भी बिशन कपूर खुले विचारों के थे। बिशन कपूर का निधन 56 वर्ष की आयु में 7 सितम्बर 1981 को हो गया था वे ब्लड कैंसर जैसे असाध्य रोग से पीड़ित थे। बिशन कपूर के बेटे प्रदीप कपूर ने कहा कि बिशन कपूर फोटोग्राफर भी थे उनकी ताजमहल के पास आदमी की खोपडी खाते कुत्ते की तस्बीर ने देश में खलबली मचा दी थी,यह तस्बीर 1962 में प्रकाशित की गई थी। बिशन कपूर ने किसानों के हित में 1948 में आन्दोलन ही नही किया किन्तु वे फतेहपुर जेल भी गए। इप्टा के राजेन्द्र रघुवंशी के निर्देशन में आगरा में मंचित नाटक बंगाल का अकाल में बिशन ने अभिनय किया था।  बिशन कपूर के प्रयासों से आगरा के नजीर अकबराबादी की मजार पर बसंत मेला भी शुरू हुआ। कैफी आजमी के सहयोग से उन्होने लखनऊ में विश्व उर्दू सम्मेलन भी आयोजित किया। बैड मैन आफ बैड लैण्ड, आगरा दर्शन, ग्लिमसिस आफ आगरा, ताज की नगरी आगरा उनकी प्रकाशित पुस्तके हैं। वे इप्ता के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे।

मुख्यवक्ता लालजी टण्डन ने बिशन कपूर की निर्भीकता की चर्चा की। तो राजेन्द्र चौधरी ने काफी हाउस व पत्रकारिता का बीते दौर को याद किया। वरिष्ठ पत्रकार राजनाथ सिंह ने बिशन के घनिष्ट संम्बन्धों पर रोशनी डाली,गवहीं अजय कुमार ने बताया कि उन्होने युवाओं को सदैव प्रोत्साहित किया। सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ के अनुसार बिशन विचारपरख नाटक के मंचन के पक्षधर थे। इप्टा के राकेश ने कहा कि बिशन कपूर कहा करते थे कि कोई निष्पक्ष नही होता, तटस्थता नाम की कोई चीज नही है। वह जनपक्षधर के हामी थे।

शुरू होगी व्याख्यानमाला व स्मृति पुरस्कार
परिचर्चा में तय हुआ कि उनकी याद में संस्कृतिकर्मियों की मदद से व्याख्यानमाला भी शुरू की जाएगी। इस बात पर भी सहमति बनी कि उनकी स्मृति में पुरस्कार भी शुरू किए जाए। परिचर्चा की अध्यक्षता रामकृष्ण द्विवेदी ने की। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अमीर हैदर ने आगन्तुको के प्रति आभार व्यक्त कियां।

लखनऊ से अरविन्द शुक्ला की रिपोर्ट.

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