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बोधगया यात्रा : दो दिन सुकून से रहने लायक़ जगह

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सत्येंद्र पीएस-

बिहार में बोधगया विकसित इलाका है। इसकी तुलना बनारस के सारनाथ से की जा सकती है, कुशीनगर से नहीं।
हालांकि अगर स्थापत्य व प्राचीन धरोहर के हिसाब से देखें तो सारनाथ या कुशीनगर की तुलना में बोधगया में कुछ भी नहीं है।

कमल का बुके। यही महाबोधि मंदिर में बुद्ध को दिया जाता है।

बोधगया में एक बोधि मंदिर बना है, जिसे किसी देश की रानी ने बनवाया था, ऐसा बताया गया। हालांकि यह मंदिर भी ठीकठाक प्राचीन होगा, लेकिन उतना प्राचीन नहीं, जितना कुशीनगर में खुदाई के बाद तमाम दीवारें, स्तूप, कुएं आदि मिले हैं। स्पेस के मुताबिक भी देखें तो यह छोटा ही है। अगर बोधिवृक्ष के नीचे ध्यान लगाने न बैठ जाएं तो यहां घूमने के लिए एक घंटे बहुत है।

बोधगया एक बड़े कस्बे के रूप में विकसित है। यहां पर सौ के करीब होटल और लॉज होंगे, घूमकर देखने से ऐसा लगा। कुशीनगर या सारनाथ की तरह विभिन्न देशों ने यहां अपने अपने बौद्ध स्थल बनवाए हैं। यहां तक कि बांग्लादेश ने भी एक बौद्ध स्थल बनवाया हुआ है। देखने पर लगता है कि यह कोई धार्मिक या सांस्कृतिक या बौद्धिक स्थल न होकर एशिया का दूतावास है।

सडक के दोनों किनारे ढेरों छोटी छोटी दुकानें हैं, जहां बुद्ध से जुड़ी चीजों से लेकर खानपान की चीजें आदि मिलती हैं। सबसे मजेदार यहां के लोग लगे। दुकानदार से लेकर नागरिकों तक में जबरदस्त विनम्रता है। एक दुकानदार के पास हम लोग पहुंचे। हमारे साथ के सज्जन ने बताया कि यह बाउल नेपाल में 300 रुपये में मिल जाता है। दुकानदार ने कहा, जीजी… नेपाल में इतने में ही मिलता है।

दरअसल यह नेपाल से ही यहां आता है, इसलिए यहां थोड़ा महंगा पड़ताहै। तब तक एक संख देखते हुए एक सज्जन ने कहा कि ओडिशा में यह संख 600 में मिल जाती है। दुकानदार ने कहा, जीजी इतने में ही मिलती है। वहां से बोधगया तक आने में लागत ज्यादा पड़ जाती है, इसलिए यहां थोड़ा महंगा पड़ता है।

वह एरोगेंस बिहारियों में कहीं नहीं दिखा, जो हिमाचल प्रदेश के मनाली के दुकानदारों से लेकर होटल वालों व अन्य लोगों में दिखा था और मुझे उस जगह जाने से ही घृणा टाइप हो गई।

हम लोग बोधगया के एक लॉज में रुके। सस्ते के चक्कर में उसमें चले गए। थकान भयानक थी। यही सोचा कि रात भर रुकना ही तो है। लेकिन बाद में ऐसा लगा कि मेरा स्तर उस होटल में ठहरने की तुलना में थोडा सा ज्यादा है।

एक दिलचस्प वाकया भी हो गया। टॉयलेट की सीट गंदी दिख रही थी, इससे तो कोई प्रॉब्लम नहीं थी। उसका शॉवर भी खराब था। पाश्चात्य शैली के कमोड में अगर शावर या पीछे से छर्रा पानी मारकर धोने की सुविधा न हो तो मग्गे से धोने में बड़ी आफत होती है। फिलहाल यह समस्या भी बर्दाश्त के काबिल थी।

असल समस्या यह आई कि जब पाश्चात्य शैली के शौचालय पर मैं निपटने के लिए विराजमान हुआ तो उसमें एक बड़ा सा कनखजूरा रेंगता हुआ नजर आया। वह ऊपर चढ़कर बाहर भी नहीं आ रहा था और भीतर ही भीतर टॉयलेट पॉट में चारों तरफ रेंग रहा था। उसे मैंने भगाने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली तो वैसे ही निपटने के लिए बैठ गया। लेकिन उस कनखजूरे ने इतना डराया कि जोर की लगी होने के बाद भी निपटान नहीं हो सका और उसके चलते रात की नींद बर्बाद गई।

बोधगया जाएं तो आपके ठहरने के सौ विकल्प हैं। घूम-घामकर देख लें और 200 रुपये से लेकर कई हजार रुपये प्रति रात तक के कमरे मिल जाते हैं। खानपान का भी बेहतर प्रबंध है। जहां पुलिस वाले वाहन रोकते हैं, उसके अंदर बोधि मंदिर की ओर बढ़ने पर सड़क पर ही दर्जनों होटल हैं।
यह पहाड़ी पर बसा खूबसूरत क्षेत्र है।

दो दिन सुकून से यहां रहा जा सकता है और पहाड़ पर, बोधिवृक्ष के नीचे मौज लिया जा सकता है। कुछ किलोमीटर दूर वह जगह है, जहां सुजाता ने बुद्ध को खीर खिलाई थी और जर्जर हो चुके बुद्ध को दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ था कि भोजन ही असली ईश्वर है। जो है, यहीं धरती पर है। शांति से रहने के तरीके निकालने होते हैं। अपनी अशांति की वजहें ढूंढनी पड़ती हैं। आदि आदि…

बोधगया, बिहार। एक ही फ्रेम में बुद्ध भी हैं, मोहम्मद साहब भी हैं, हिन्दू भी हैं, और अदृश्य रूप से अम्बेडकर भी खड़े हैं। यही सह अस्तित्व है।

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