स्त्री विमर्श के बहाने….वाह रे मीडिया, तो तू इसलिए भांड कहलाता है !

कुछ दिनों पहले अमरीकी मीडिया सहित गॉसिप पिपासु अंतरराष्ट्रीय मीडिया को एक खास खबर हाथ लग गई। ऑलंपियन ब्रूस जेनर ने अपना लिंग परिवर्तन करा महिला होकर विश्व को दिखा दिया। ब्रूस जेनर कीपींग अप विद कर्देशियन रियलिटी धारावाहिक की सोशलाइट किम कर्देशियन के स्टेप पिता हैं। उनकी पत्नी क्रिस जेनर को तीन सितारा पुत्रियां – कर्टनी, किम और क्लोय हैं, जबकि उनके साथ उनकी दो पुत्रियां कायली, केंडल हैं। खास बात यह है कि बकौल ब्रूस यह निर्णय काफी कठिन था और वे बचपन से ही महिला बनना चाहते थे।विदेशी मीडिया उनके रोते – भावुक होकर कहानी कहने के इंटरव्यू लेने में जुट गया… मेरे मन में आया कि अगर ये बूढ़ऊ मेरे सामने पड़ जाए तो दो चप्पल की मारूं….. बूढ़ऊ, जिंदगी भर पूरे मजे लूट लेने के बाद तुझे सठिया उमर में यह करामात सूझी है। और कुछ नहीं बचा था?? करावाना था तो बाली उमर में ही क्यों न कराया, कईंयों का भला होता वहां,… पांच युवा पुत्रियों और एक पुत्र का पिता होकर अब नाना बनने के बाद तेरे ये खयालात उड़ने लगे…(मुझे शांत होना चाहिए क्योंकि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं। आप के अलग हो सकते हैं)

पहले चित्र में ब्रूस जेनर लिंग परिवर्तन के बाद, दूसरे चित्र में अपनी बॉलोजिकल पुत्रियों के साथ 

भारत में विशेष बात यह हुई कि जैसे ही यह खबर वहां चली, भारत में तथाकथित प्रगतिशील पेपरों के संपादकीय स्त्री विमर्श को इससे जोड़कर खबरों की होड़ में लग गए। (मेरे पास टेलीजन नहीं, हो सकता है, वहां भी चली हो)- नारी होने की स्वतंत्रता… नारी होने के निर्णय … पुरुष प्रधान समाज में … ब्लां ब्लां ब्लां……

मैंने अपना माथा पकड़ा, वाह रे मीडिया, तो तू इसलिए भांड मीडिया कहलाता है। अरे, तुझे दिखाई नहीं देता कि सवा अरब की अपनी, हां भई, इस भारतीय आबादी में कितनी महिलाएं हैं, उनकी स्थिति क्या है, वे किन हालातों में जी रही हैं, वे क्या करती हैं, सुरक्षित हैं, पढ़ रही हैं, स्वस्थ हैं , बच्चे या भावी संतति स्वस्थ पैदा हो रही है, कार्यस्थल पर सुरक्षित महसूस करती हैं, आते-जाते सड़कों से लेकर गलियों तक और कारों लेकर मेट्रो तक आरामदायक सफर करती हैं, उनके घरों में शौचालय है, उनकी सरकारी स्कूलों में शौचालय है, पीने का पानी लेने कहीं किलोमीटरों तो नहीं जाना पड़ता न, महिला मजदूरों के बच्चों के लिए क्या योजनाएं हैं, ….(लिखती रही तो कई पन्नें भर जाएंगे)

क्या जिम्मेदारी किसी सूदूर संस्कृति के मुख्य चलन के बरक्स ही बहस जिंदा रखना है जबकि तुम अच्छे से जानते हो कि उनकी परिस्थितियां, आर्थिक हालात औऱ संस्कृति हमसे बिल्कुल भिन्न है….

या स्त्री विमर्श तुम्हारे लिए सिर्फ यही है????

अर्पिता शर्मा के एफबी वाल से



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