आकस्मिक घटना नहीं थी चौरी चौरा विद्रोह का विद्रोह; इसी से जन्मा भगत सिंह, चन्द्रेशेखर आज़ाद का क्रांतिकारी आन्दोलन

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इस साल फरवरी के विश्व पुस्तक मेले में इस किताब को खरीदने के बाद, मैं जल्द पढ़ने को उत्सुक था, हालांकि मैं इसे जुलाई माह में पढ़ने का संयोग प्राप्त कर सका। इस से पहले मैंने शाहिद अमीन की पुस्तक- इवेन्ट, मेटाफर एण्ड मेमोरी, चौरी चौरा 1922-1992 को पढ़ा था जो पहले ही पर्याप्त चर्चा में रही है और इतिहास की ‘सबाल्टर्न स्टडीज’ के रूप में लिखी गई है। जब मैं जून 2010 में गोरखपुर- चौरी-चौरा-देवरिया-मगहर-लुम्बिनी की यात्रा पर था, कुछ अन्य पुस्तकें भी पढ़ना चाहता था लेकिन तब उन्हें हासिल नहीं कर पाया। उन पुस्तकों के संदर्भ इस किताब में दिए गए हैं। चौरी चौरा मुझे बहुत ज्यादा आकर्षित करता रहा है। यही कारण है कि शाहिद अमीन की किताब पढ़ने के बाद मैंने इस जगह का दौरा किया। मेरी रुचि स्वतंत्रता संग्राम के दो समानांतर धाराओं, भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद के बारे में जानना था। इन दोनों का, चौरी चौरा थाने की हिंसक घटना के बाद सत्याग्रहियों द्वारा 23 पुलिसकर्मियों को जिंदा जला देने और उस हिंसा के बहाने महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस ले लेने से मोहभंग हो गया था। यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसने एक वैकल्पिक क्रांतिकारी आंदोलन को जन्म दिया। इसलिए इतिहास के एक छात्र होने के नाते, इस क्रांतिकारी आंदोलन को और अधिक गौर से जानना आवश्यक हो गया था। वर्ष 2009 में शाहिद अमीन की किताब ने भी मुझे प्रभावित किया था लेकिन सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने शायद उनसे भी ज्यादा परिश्रम किया है और यहां तक की आंदोलन के बाद, चौरी चौरा के लोगों के संघर्ष को और अधिक सजगता से प्रकाश में लाया है। इस किताब में इस क्षेत्र और आंदोलन का व्यापक अध्ययन शामिल किया गया है। दोनों लेखकों ने इस विद्रोह पर लेखन करने की प्रेरणा, उस क्षेत्र विशेष का हिस्सा होने के नाते पायी है। शाहिद देवरिया जनपद के रहने वाले हैं तो कुशवाहा करीबी जनपद कुशीनगर के। अध्येता के रूप में शाहिद इतिहासकार हैं जबकि कुशवाहा एक हिन्दी लेखक हैं। इसलिए दोनों लेखकों के संदर्भ, इस पुस्तक को पढ़ने के लिए जरूरी बना देते हैं।

कुशवाहा ने इस किताब को 3 भागों, 23 अध्यायों, 12 परिशिष्टों, संदर्भों और प्रस्तावना में विभाजित किया है। लेखक ने मैंनेजर पाण्डेय की प्रेरणा से इस किसान आंदोलन और उस पर आधारित इस पुस्तक को लिखने की बात बताई है। इस पुस्तक के लिए सामग्री-संग्रह में लेखक को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ा है। यहां तक कि सूचना के अधिकार का सहारा लिया गया है और ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन से कई दस्तावेज हासिल किए गए हैं।

पुस्तक के पहले भाग में, लेखक ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम पर, विशेष रूप से गोरखपुर क्षेत्र में उसके प्रभाव का वर्णन करके संघर्ष की पृष्ठभूमि पर ध्यान केंद्रित किया है। चौरी चौरा आंदोलन, क्षेत्र के किसानों द्वारा लड़ा गया था। इसलिए लेखक ने चौरी चौरा घटना के पूर्व, इस क्षेत्र की राजनीतिक गतिविधियों और किसानों की स्थिति का वर्णन किया है। लेखक ने लगभग एक साल पूर्व, उस क्षेत्र में महात्मा गांधी के दौरे के प्रभाव का वर्णन किया है। इस पृष्ठभूमि को देने के बाद लेखक ने पुस्तक के दूसरे और मुख्य भाग में चौरी चौरा के महासंघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया है। अपने प्रस्तावना में लेखक ने प्रशासन द्वारा चौरी चौरा स्मारक पर लगाये गए काले ग्रेनाइट पत्थर पर लिखे चौरी चौरा विद्रोह के विवरण को चुनौती दी है। इस शिलालेख में रहस्यमय तरीके से आंदोलन के केन्द्र बिन्दु डुमरी खुर्द गांव का नाम गायब कर दिया गया है, जहां से संघर्ष की सभी गतिविधियां संचालित हुईं। जहां के दलितों, मुसलमानों और अन्य पिछड़े वर्गों के लोगों ने एक बड़े पैमाने पर विद्रोह को संचालित किया। 1857 के विद्रोह में, गोरखपुर क्षेत्र के डुमरी कला या डुमरी खास गांव के जमींदार बंधु सिंह ने सक्रिय हिस्सा लिया था। अंग्रेजों ने उन्हें गोरखपुर शहर में एक पेड़ पर फांसी पर लटका दिया था। उस क्षेत्र के कई अन्य लोग भी 1857 के विद्रोह में हिस्सा लेने के कारण दंडित किए गए। दूसरे अध्याय में, लेखक ने 1918-1922 के मध्यसंयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) के किसान विद्रोह और दंगों का उल्लेख किया है। लेखक ने भगत सिंह के शिक्षक जयचंद विद्यालंकार की एक अनजान किताब को उद्धृत करते हुए, स्पष्ट किया है कि नेहरू ने भी अवध किसान संघर्ष का समर्थन नहीं किया था। उन्होंने कहा था कि वे देश में वर्ग संघर्ष नहीं चाहते। पुस्तक में 1917 की रूसी बोल्शेविक क्रांति को भी किसान विद्रोहियों के बीच रेखांकित किया गया है जिसका प्रभाव प्रेमचंद के उपन्यास प्रेमाश्रम पर भी पड़ा था। तीसरे अध्याय में लेखक ने गांधी के अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत की चर्चा की है। लेखक ने गांधी पर जनता के चुंबकीय प्रभाव को रेखांकित किया है। यहां तक कि एक 104 वर्षीय महिला का जिक्र किया है जो कई धार्मिक स्थानों का दौरा करने के बाद, गांधी को भगवान के अवतार के रूप में देखने आयी थी। 1920 में लोकमान्य तिलक के निधन के बाद महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी के निर्विवाद नेता बन गये थे और उसके बाद कुछ विशेष प्रकार के सत्याग्रह कांग्रेस द्वारा प्रारम्भ किए गए। पहला सत्याग्रह खिलाफत मुद्दे पर प्रारम्भ किया गया। उसके बाद किसान मुद्दों पर। लेकिन जब भी हिंसा की छोटी-सी घटना प्रकाश में आई, गांधी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। जब 17 नवंबर 1921 को प्रिंस ऑफ वेल्स ने मुंबई का दौरा किया तब 20 हजार की भीड़ अनियंत्रित हो गयी और हिंसा के परिणामस्वरूप 45 सत्याग्रहियों सहित 53 लोग पुलिस फायरिंग में मारे गए। महात्मा गांधी ने घटना की निंदा की पर पुलिस दमन पर खामोश रहे और तेजी से उभर रहे आंदोलन को वापस ले लिया।

जनवरी 1922 से, सम्पूर्ण देश और संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) में भी अशान्ति की तमाम घटनाएं हुईं। लेखक ने इस तर्क को खारिज किया है कि चौरी चौरा विद्रोह की घटना अकस्मात घटित हुई। यह पृष्ठभूमि थी और उस प्रक्रिया की परिणति भी। उन्होंने 1921-22 में किसान विद्रोह में गिरफ्तारी के आंकड़े दिए हैं कहा है कि कुल 18,120 गिरफ्तार किए गए लोगों में से 16,719 को विभिन्न अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया। लेखक ने बताया है कि दूसरी ओर सोवियत संघ में एमएन रॉय, कांग्रेस अधिवेशन के लिए पर्चे भेजकर ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ कांग्रेसियों को क्रांतिकारी बनने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहे थे।

1921 में महात्मा गांधी ने अली बंधुओं, मौलाना मोहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली जौहर के साथ संयुक्त प्रांत का दौरा किया। 8 फरवरी 1921 को वह चौरी चौरा पहुंचे। ट्रेन में यात्रा के दौरान, सभी रेलवे स्टेशनों पर गांधी को देखने के लिए भारी भीड़ इकट्ठा नजर आई। 30 हजार लोग देवरिया स्टेशन पर इकट्ठा हुए। चौरी चौरा स्टेशन पर एक मारवाड़ी से इन्होंने उपहार प्राप्त किए। गांधी गोरखपुर में 6-7 घंटे के लिए रुके थे और लगभग दो लाख लोगों की एक बैठक को संबोधित किया था। असहयोग आंदोलन के लिए कार्यकर्ताओं के नामांकन पत्र में पुलिस के क्रूर हमलों का सामना करने के लिए अहिंसक बने रहने के प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर कराये गए। गोरखपुर क्षेत्र राजनैतिक रूप से काफी सक्रिय था। जलियांवाला बाग नरसंहार के खिलाफ यहां 15,000 लोगों ने विरोध किया था। अवध किसान आंदोलन के नेता बाबा राघव दास को दोषी करार दिए जाने पर 50 हजार लोगों ने अदालत में एकत्र होकर विरोध किया था।

किताब के दूसरे हिस्से में लेखक ने 4 फरवरी, 1922 की वास्तविक घटनाओं पर ध्यान केंद्रित किया है जहां उस दिन पुलिस स्टेशन को जलाने के कारण 23 पुलिसकर्मियों की मौत हो गयी। चौरी चौरा के पास दो गांव, डुमरी खुर्द या छोटकी डुमरी आौर डुमरी या डुमरी खास या डुमरी कला या बड़की डुमरी एक दूसरे से पाँच मील की दूरी पर हैं। डुमरी की एक मात्र सिक्ख जमींदारी, सरदार सूरत सिंह को 1857 के दौरान अंग्रेजों के प्रति की गई वफादारी के एवज में उन्हें सम्मानित करने के लिए, बंधू सिंह की जमींदारी छीन कर प्रदान की गई थी। उनके दो लड़के, उमराव सिंह (अमृता शेरगिल के पिता) और सुंदर सिंह मजीठिया ने उनके बाद उस जमींदारी को अधिग्रहित किया। उनकी ओर से उनके रिश्तेदार सरदार हरचरन सिंह दो दशकों तक जमींदारी की देखभाल करते रहे। सरैंया में उन्होंने 1900 में गन्ना मिल की स्थापना की। सरदार जागीरदार बड़की डुमरी या डुमरी कला में रहते थे जबकि गरीब लोग जिनमें मुख्यतः चमार जाति के थे, छोटकी डुमरी में रहते थे, जो आंदोलन का केंद्र बिन्दु रहा और जिसके कारण बाद में 4 फरवरी को चौरी चौरा विद्रोह की घटना घटित हुई। वहां मुसलिम आबादी भी ज्यादा थी और दलित तथा मुसलमानों के बीच छोटी-मोटी घटनाओं को छोड़कर, अपेक्षाकृत सौहार्द्रपूर्ण संबंध थे। चौरी और चौरा दो आस-पास के गांव थे लेकिन रेलवे स्टेशन चौरी चौरा नाम से जाना गया और थाना, दोनों में बड़ा चौरा गांव के पास बना तो उसका नाम भी चौरी चौरा ही पड़ा। डुमरी खुर्द एक बड़ा गांव था जिसकी जनसंख्या 2500 से अधिक थी। 4 फरवरी को स्वयंसेवकों की एक सभा डुमरी खुर्द गांव में हुई। इसमें दूसरे गांवों के स्वयंसेवकों को भी शामिल किया गया। वहीं से स्वयंसेवकों ने चैरी चैरा थाने की ओर मार्च किया। नजर अली और लाल मोहम्मद इस क्षेत्र में आंदोलन के प्रमुख नेता थे। अन्य प्रमुख व्यक्तियों में भगवान अहीर, अब्दुल्ला, इंद्रजीत कोइरी, श्याम सुंदर और एक अज्ञात सन्यासी भी थे। शिकारी ने भी शुरुआत में अग्रणी भूमिका निभाई थी लेकिन बाद में सुनवाई के दौरान वह सरकारी गवाह बन गया। चौरा के लाल मोहम्मद की उम्र 40 वर्ष, डुमरी खुर्द के नजर अली की 30 वर्ष और चौरा के भगवान अहीर की 24 वर्ष थी। राजधानी के अब्दुल्ला की उम्र भी 40 वर्ष की थी। वे सभी जाने पहचाने कार्यकर्ता थे और स्थानीय कांग्रेस समिति के पदाधिकारी भी। चैरा थाने का पुलिस इंस्पेक्टर और पुलिस स्टेशन प्रभारी ने बिना किसी उकसावे के शान्तिपूर्ण सत्याग्रह पर भगवान अहीर को पीटा जिससे क्षेत्र में तनाव पैदा हो गया। स्थानीय जमींदार या उनके एजेंटों का पुलिस के साथ गठजोड़ था, जिनमें से एक सरदार हरचरन सिंह और सन्त बख्श सिंह भी थे। उनका उस क्षेत्र में व्यापारिक हित था। दोपहर 3 बजे तक पांच हजार लोग चौरी चौरा में एकत्र  हो गये थे। पुलिस थाना प्रभारी को पहले से ही जिला मुख्यालय से सशस्त्र पुलिस बल मिला हुआ था जो पुलिस स्टेशन में था। उस दिन क्षेत्र के कई चैकीदार भी वेतन लेने के लिए थाने पर आये हुए थे। थानेदार गुप्तेश्वर सिंह और सत्याग्रहियों में हुई बहस के बाद माहौल गर्म हुआ और पुलिस ने हमला कर दिया। जिससे कम से कम दो सत्याग्रहियों की मौत हो गई। कुछ का मानना था कि 26 सत्याग्रहियों की मौत हुई। इस प्रकार उकसाने के कारण सत्याग्रहियों ने थाने पर हमला बोल दिया। पुलिस स्टेशन को जला दिया गया जिससे 23 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई लेकिन सत्याग्रहियों ने पुलिस वालों की पत्नियों और बच्चों को छोड़ दिया था।

लेखक ने 4 फरवरी की घटना का विस्तार से वर्णन किया है। जब सीधे सत्याग्रहियों पर की गई फायरिंग से बुद्ध अली और खेली भर की मौत हो गई तब सत्याग्रहियों का धैर्य टूट गया। उनके गुस्से को नियंत्रित करना असंभव हो गया और उन्होंने स्थानीय बाजार से मिट्टी का तेल और दूसरी ज्वलनशील चीजें जुटाईं और थाने को फूंक दिया। उनका प्रमुख लक्ष्य क्रूर उपनिरीक्षक गुप्तेश्वर सिंह था जिसे उन्होंने सशस्त्र बल के उपनिरीक्षक पृथ्वीपाल सिंह के साथ जला दिया। अन्य 21 पुलिसकर्मियों में 15 कांस्टेबल, हेड कांस्टेबल और 6 चैकीदार थे जिनका उपयोग गुप्तेश्वर सिंह ने स्वयंसेवकों पर आक्रमण के लिए किया था। एक अन्य चैकीदार सूरजबली की मृत्यु को भी शामिल कर लें, जो पुलिस गोली से मारा गया था, तो मारे गये सिपाहियों की संख्या 24 हो जाती है। दूसरी ओर, मारे गये सत्याग्रहियों की संख्या दो दर्ज की गई है जबकि कम से कम 26 अन्य या उससे ज्यादा के मारे जाने का संदर्भ दिया गया है। उन दिनों के संचार साधनों के अभाव में मारे गये स्वयंसेवकों की लाशों को स्वयंसेवक लेकर गांवों में भाग गये थे। सभी सामंती प्रभुओं या उनके एजेंटों ने संघर्ष के समय और बाद में स्वयंसेवकों को ब्रिटिश अदालतों से फांसी की सजा दिलाने में ब्रिटिश पुलिस का साथ दिया था। कुल 225 व्यक्तियों पर हत्या, आपराधिक षड़यंत्र और अनेक दूसरे आरोप लगाये गये। दिलचस्प बात यह थी कि इस सूची में उच्च जाति के बहुत कम लोग शामिल थे। इतना ही नहीं, न केवल ब्रिटिश सरकार ने इसे गंभीर अपराध माना, अपितु महात्मा गांधी ने, जिनके नाम और नारों के सहारे स्वयंसेवकों ने बलिदान के लिए खुद को प्रस्तुत किया था, इस घटना को ‘गोरखपुर का अपराध’और ‘चौरी चौरा का अपराध’ कह कर तुरंत असहयोग आन्दोलन को ‘अहिंसा की प्रतिज्ञा’ का उल्लंघन मान कर स्थगित कर दिया।

पुलिस ने शुरुआत में 273 लोगों का चालान किया और 25 मार्च 1922 को निचली अदालत को सूची सौंपी दी। इनके अलावा 54 लोगों का फरारी में चालान हुआ था। 273 व्यक्तियों में से एक की मृत्यु हो गई और शेष 272 व्यक्तियों मे से 228 पर मुकदमा प्रारम्भ हुआ। मुकदमे के दौरान तीन की मृत्यु हो जाने के कारण 225 व्यक्तियों के विरुद्धही अंतिम फैसला आया। ये व्यक्ति क्षेत्र के 30 से अधिक गांवों के थे। परीक्षण के बाद, 47को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया और 172 व्यक्तियों को मौत की सजा दी गई। इस फैसले ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया। विद्रोह की खबर दुनिया की मीडिया में अच्छी तरह फैली हुई थी। ऑस्ट्रेलियाई अखबारों ने समाचार छापे। दुनिया भर के कम्युनिस्ट, दोषी करार दिये गये गरीब किसानों और अन्य ग्रामीण मजदूरों के समर्थन में खड़े हुए। एमएन रॉय ने ज्यूरिख से ब्रिटिश लेबर पार्टी को भारतीय कम्युनिस्टों की ओर से 2 फरवरी, 1923 को पत्र लिखा और भारतीय भूखे किसानों की दशा पर ध्यान आकृष्ट करते हुए फांसी की सजा समाप्त करने की मांग की। 14 मार्च 1923 को, कम्युनिस्ट इंटरनेशनल की कार्यकारिणी और रेड इन्टरनेशनल ऑफ लेबर यूनियन्सने फांसी की सजा की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए दुनिया भर के श्रमिक वर्ग से विरोध करने की अपील की। भारत में कलकत्ता में विरोध हुआ। किसान नेता बाबा राघव दास ने भी विरोध सभा की और कुछ महीनों के लिए जेल गये। लेकिन दोषी पाये गये अनपढ़ किसान, सजा से परेशान नहीं थे। वे कह रहे थे कि मृत्यु के दस महीने बाद, पुनर्जन्म लेकर संघर्ष जारी रखने के लिए वे पृथ्वी पर वापस आयेंगे। जनवरी 1923 में निचली अदालत की सजा आदेश के बाद, हाईकोर्ट में एक अपील जनवरी के तीसरे सप्ताह में पंडित मदन मोहन मालवीय की ओर से दायर की गई जिसकी सुनवाई 6 मार्च 1923 से शुरू हुई। ब्रिटिश लेबर पार्टी के कुछ सदस्यों ने संसद में इस मुद्दे को उठाया और मौत की सजा को समाप्त करने की मांग की। कम्युनिस्ट सक्लटवाला ने संसद में इस मुद्दे को उठाया। 30 अप्रैल 1923 को उच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया और मौत की सजा को 19 व्यक्तियों तक सीमित कर दिया। 38 को बरी कर दिया गया। कुछ को अल्प अवधि का दंड देकर छोड़ दिया गया। लेकिन बहुतों को लम्बी अवधि तकके लिए जेल भेज दिया गया। दया याचिकाओं की औपचारिकता के बाद बिना किसी परिणाम के 19 व्यक्तियों को उत्तर प्रदेश की विभिन्न जेलों में जुलाई 1923 में 2 जुलाई से 11 जुलाई  के बीच फांसी पर लटका दिया गया। आंदोलन के सभी प्रमुख नेताओं जैसे नजर अली, लाल मोहम्मद, अब्दुल्ला, भगवान अहीर आदि को फांसी पर लटका दिया गया।

जिन लोगों को आजीवन कारावास की सजा मिली थी उनकी दशा गरीबी के कारण दयनीय थी। कुछ समय के लिए कांग्रेसी सरकार 1938 में सत्ता में आयी थी लेकिन उसने भी उन्हें रिहा नहीं किया। काकोरी की तरह अनेक क्रांतिकारी आंदोलनों के राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया लेकिन चौरी चौरा विद्रोह के कैदियों को रिहाई के लिए 1942-43 तक इंतजार करना पड़ा था। सरकार ने चौरी चौरा विद्रोह में मारे गये पुलिसकर्मियों के परिवारों के लिए सभी सहायता प्रदान की थी। उन्हें नौकरी और पेंशन दिया गया था लेकिन किसी ने भी चौरी चौरा विद्रोहियों की सुध न ली। उनके घरों में महिलाओं की हालत बहुत खराब थी। सजायाफ्ता 170 लोगों में से उच्च जातियों के केवल दो व्यक्तियों को 1947 के बाद कुछ सामाजिक सम्मान प्राप्त हुआ। द्वारका पांडे 1952-1957 में विधायक बन गए। द्वारका गोसाई को 1949 में पेंशन मिल गया और 1972 में उन्हें सम्मानित किया गया। विद्रोहियों के गरीब परिवारों को गुंडा, लुटेरा जैसे इल्जाम से मुक्त होने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उन्हें 1993 में दर्जा मिल पाया। इस घटना में शामिल 110 परिवारों को 1993 में पेंशन देना शुरू किया गया। ऐसा कम्युनिस्ट नेता झारखण्डे राय के संघर्षों की बदौलत हुआ न कि कांग्रेसी सरकार की वजह से। मारे गये पुलिस वालों का स्मारक, थाना परिसर में ही 1924 में बना दिया गया था जबकि किसान विद्रोहियों की याद में स्मारक बनाने का उद्घाटन 1993 में हो सका। चौरी चौरा शहीद स्मारक पर लगे शिलालेख में उन उच्च जातियों के बलिदान की झूठी कहानी लिख दी गई, जिन्होंने विद्रोह में भाग नहीं लिया था। मारे गए पुलिसकर्मियों के स्मारक पर सलामी स्वरूप ‘जय हिन्द’ लिखा गया लेकिन फांसी की सजा पाये 19 किसानों के स्मारक पर नहीं।

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कड़े परिश्रम और चौरी चौरा आंदोलन के पीड़ितों के प्रति प्यार और चिंता के साथ इस किताब को लिखा है। इससे पहले इस विषय पर प्रमुख किताब शाहिद अमीन की थी जो सबाल्टर्न दृष्टि से लिखी गयी थी। शाहिद अमीन की किताब और शोध भी प्रशंसनीय है लेकिन सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने और अधिक अनुसंधान और कठिन श्रम किया है। उन्होंने ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन से बिखरे शवों के चित्र, पुलिस स्टेशन का चित्र और कई अन्य दस्तावेजोंको हासिल किया है। उन्होंने सूचना के अधिकार के माध्यम से भारतीय कार्यालयों से दस्तावेजों की प्रतियां प्राप्त करने के लिए कठिन संघर्ष किया है। सुभाष चन्द्र कुशवहा के 12 परिशिष्ट जबरदस्त ऐतिहासिक मूल्य के हैं जिनमें पुलिस स्टेशन में मारे गए सभी पुलिसकर्मियों के नाम शामिल हैं। गांधी के गोपनीय पत्र, फांसी की सजा पाये 19 शहीदों की फांसी तिथि और विवरण, 225 अभियुक्तों की सूची, फैसले का सार, उन विभिन्न जेलों के नाम जहां अभियुक्तों को रखा गया था, शामिल हैं। यह किताब ऐतिहासिक दस्तावेजों के रूप में बहुत समृद्ध है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि लेखक ने एक सराहनीय काम किया है। यह किताब हिंदी में लिखी गई है और अंतरराष्ट्रीय पब्लिशिंग हाउस, पेंगुइन बुक्स द्वारा प्रकाशित हुई है फिर भी अंग्रेजी घमंड के कारण भारतीय शिक्षाविदों के बीच ज्यादा क्रेडिट नहीं  प्राप्त कर सकेगी। 

भारतीय शिक्षाविदों/ इतिहासकारों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारियों द्वारा प्रतिबंधित किए जाने के बावजूद कभी भी पंडित सुंदर लाल के इतिहास के दो महान खंडों- ‘भारत में अंग्रेजी राज’ को महत्व नहीं दिया। इसी प्रकार चैरी चैरा पर भारतीय भाषा में लिखे गये इस महत्वपूर्ण पुस्तक को सिर्फ इसलिए मान्यता प्राप्त होने की संभावना कम है, क्योंकि वह हिन्दी में लिखी गई है। बंगाली में लिखे गये क्रांतिकारी आन्दोलन के कई महत्वपूर्ण कार्यों को अभी तक हिन्दी या अंग्रेजी में अनुवाद नहीं किया गया है, यद्यपि कि वे इतिहास के मूल अभिलेख जैसे हैं। फिर भी उम्मीद है कि इस किताब के कारण चौरी चौरा की अनदेखी नहीं होगी, जो कांग्रेसी किस्म में नेताओं द्वारा जानबूझकर चौरी चौरा की वास्तविकता के बारे में बताने से रोका गया है। विशेषकर गांधी द्वारा हिंसक आंदोलन के रूप में इस आंदोलन की निंदा की गई है। वास्तविकता और तथ्य यह है कि गरीब किसानों ने घृणा के बीच चौरी चौरा आंदोलन का नेतृत्व किया था। महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस ले लेने के कारण भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद, दोनों का कांग्रेस पार्टी से मोहभंग हो गया था और उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन का एक नया मार्ग चुनने का निर्णय लिया था। चन्द्रशेखर आजाद 1921 में बनारस में असहयोग आंदोलन के समय चिल्ला-चिल्ला कर ‘महात्मा गांधी की जय’ का नारा लगा रहे थे। इस प्रकार चौरी चौरा ने भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के लिए एक उत्प्रेरक का काम किया। हम कह सकते हैं कि अगर चौरी चौरा विद्रोह न होता तो भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद और उनके साथी पैदा न हुए होते।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महत्वपूर्ण परिघटनाओं में से एक पर यह शोधपरक पुस्तक लिखने के लिए सुभाष चंद्र कुशवाहा को बधाई। (प्रो. चमन लाल ने यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा है। यहाँ उसका हिंदी अनुवाद दिया जा रहा है।)

पुस्तकः चैरी चैरा विद्रोह और स्वतंत्रता आन्दोलन
लेखक- सुभाष चन्द्र कुशवाहा
प्रकाशक- पेंगुइन बुक्स, पहला संस्करण- पृष्ठ 416,
मूल्य-रुपए 225, दूसरा संस्करण- मूल्य रुपए 299

प्रो. चमन लाल
भूतपूर्व प्रोफेसर, जाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।
म.न. 2690, अरबन स्टेट, फेज-2, पटियाला (पंजाब)-147002

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