चैनलों में कंटेंट खत्म हो गया है, बस फार्मेट ही बचा है : रवीश कुमार

चैनल देखने की आदत लगाता है फार्मेट, आप कटेंट पर ज़ोर देकर लत छुड़ाएं… फार्मेट और कटेंट में अंतर होता है। फार्मेट होता है बक्सा। जो किसी खास म्यूज़िक और नाम से शुरू होता है। एंकर ऐसे आता है जैसे कोई मसीहा आ रहा हो। स्लो मोशन में। पढ़ाई लिखाई और पत्रकारिता साढ़े बाइस मगर आने का रौब ऐसा कि जैसे महान लोकतंत्र अब अपने घुटनों से खड़ा होकर परचम बन जाएगा। चुनाव आते ही या चुनाव के बग़ैर ही चैनलों की दुनिया में आप इस तरह के फार्मेट देखेंगे। कंटेंट एक ही है सबके पास। उसी कटेंटे को अलग अलग फार्मेट में पेश किया जाता है ताकि आपको लगे कि आप कुछ नया और अलग देख रहे हैं। नया और अलग देखने की अति-चाहत आपको जंक फुड की तरफ ले जाती है। आप कब बर्गर गटक जाते हैं और कब फ्रेंचफ्राई तब तक पता नहीं चलता जब इससे होने वाली बीमारियां आपको नाज़ुक मोड़ पर पहुंचा देती हैं।

चैनलों में कटेंट ख़त्म हो गया है। फार्मेट भी ख़त्म हो गया है मगर फिर भी इसमें थोड़ा फर्क होता है। जैसे डिबेट आप स्टुडियो में करते हैं। वही चार फालतू लोग होते हैं। फिर स्टुडियो के दूसरे फार्मेट में होता है उसमें वही फालतू चार लोग बुलाए गए नौजवान वक्ताओं से घिरे होते हैं। घटिया किस्म के पत्रकारिता संस्थानों के मासूम बच्चों को ठगने के लिए वहां भेजा जाता है ताकि वे भविष्य में वैसा बनने की चाह में कुछ और पैसों को दांव पर लगा सकें। भ्रम पाल सके कि पत्रकार बन रहे हैं और भविष्य चुन रहे हैं। ऐसे नौजवानों से मिलकर रोना आ जाता है। ठगे वे जाते हैं, कराह मैं रहा होता हूं। जब इससे बोर हो जाते हैं तो एक फार्मेट होता है वन टू वन का। इसमें उन चार फालतू वक्ताओं में से एक को छांट कर अलग से इंटरव्यू किया जाता है। वही बातें। वही सवाल। बिना तैयारी। रंग रोगन और साज सज्जा से चमकाकर आपको बताया जाता है कि आप कोई भारी भरकम प्रश्नोत्तरी पत्रकारिता का नमूना देख रहे हैं।

फिर एक फार्मेट होता है उसी फालतू चार वक्ताओं को लेकर स्टुडियो से बाहर जाने का। चुनाव शुरू होते ही महापंचायत, महामुकाबला टाइप के फार्मेट बन जाते हैं। इसमें शहर से कुछ लोग बुलाए जाते हैं। उन्हें लगता है कि न्यूज़ चैनल ने बुलाया है। मीडिया ने बुलाया है। टीवी पर आएंगे। इसमें जिमी-जिब कैमरा आपके सर से घुमते जाता है तो आप सावधान हो जाते हैं। जैसे बड़ा भारी प्रोग्राम शुरू होने वाला है। एंकर ऐसे एलान करता है जैसे धरती हिलने जा रही हो। एक दो सवाल होते हैं। फालतू दो प्रवक्ता चीखने लगता है। हमारे नेता ऐसे हैं। तुम्हारे नेता वैसे हैं तब तक पब्लिक कुर्सी उठा कर मारा मारी कर देती है। इसे बोला जाता है कि शो में एक्शन हो गया। एनर्जी आ गई। कंटेंट हवा में उड़ गया। आने वाले लोग चुपचाप निकल लिए। जो रह गए एंकर से सेल्फी खिंचाने लगे।

इसी तरह का एक और फार्मेट होता है डिबेट को कालेज में ले जाने का। अपनी पढ़ाई का पता नहीं, क्लास में टीचर अच्छा है या है ही नहीं। कालेज के आडिटोरियम में फालतू चार वक्ताओं में छांट कर दो वक्ता आते हैं। एंकर वही बेसिक सवाल करता है। यहां इसलिए जाया जाता है कि ताकि यंग इंडियो को सामने से बेवकूफ बनाते हुए उनसे कहा जाए कि आप ताली बजाएं। या किसी बात पर ठठा कर हंसे। ऐसे डिबेट में शामिल नौजवान यू ट्यूब पर जाकर दोबारा से देखें। सोचें कि उनका इस्तमाल फार्मेट बनाने में हुआ या उन्हें कटेंट देने के लिए फार्मेट बना।

कालेजों में या किसी मॉल में या फिर किसी ऐतिहासिक इमारत की रौशनी में भी वही बातें होती हैं जो चैनलों के भीतर होती हैं। मीडिया का सतहीकरण इसी बात से ऊर्जा प्राप्त करता है कि दशर्कों का भी लगातार सतहीकरण होता रहे। कालेज के ज्यादातर छात्र भी सूचनाविहीन हैं। वही दो चार मुद्दों तक सीमित डिबेट को लेकर धारणा बनाए बैठे हैं और पूछ कर या ताली बजाकर या उसे कंफर्म कर लौट जाते हैं।

एंकर भी छवि लेकर आता है और छवि लेकर चला जाता है। उसकी तैयारी बेसिक होती है। अगर वायर द हिन्दू या स्क्रोल या डाउन टू अर्थ में कुछ न छपे तो एंकरों के पास चार सवाल न हों पूछने के लिए। खुद एंकर हूं तो बता रहा हूं। मगर नौजवान इस बात से खुश रहते हैं कि एंकर से सेल्फी खिंचाने का मौका मिल गया और टीवी पर आने वाले दो वक्ताओं को करीब से देख लिया जो वो घर में ही बैठ कर देख सकते हैं। इस तरह वे एक ज़िम्मेदार दर्शक से ज़िम्मेदार नागरिक होने की प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते। न दर्शक रह पाते हैं और न नागरिक।

इसलिए चैनलों के पास फार्मेट ही बचा रह गया है जिसे सब ढो रहे हैं। कटेंट ख़त्म हो गया है। कंटेंटलेस यानी तत्वविहीन मीडिया है। डिबेट जारी रहे इसलिए सूचना की जगह सर्वे की खुराक दी जाती है। सर्वे का भी कटेंट एक ही है। डिबेट का भी कटेंट एक ही है। एक बात बताइये जो इस तरह के ओपिनियन में हिस्सा लेते हैं क्या उन्हें किसी दूसरे संसार से सूचनाएं मिलती हैं? क्या उन्होंने अस्पताल देखे होते हैं, स्कूल देखे होते हैं, पंचायतों में ब्राडबैंड और जनऔषधि केंद्र देखे होते हैं? मुमकिन है कि कुछ ने देखा होगा लेकिन आप कल्पना कर सकते हैं कि हम सबका संस्थाओं से नाता कितना सीमित रह गया है। पता नहीं जिनका अधिक है वो इन सर्वे में किस मात्रा में हैं। तो फिर सर्वे से भी वही बातें निकलेंगी जो डिबेट से निकलती हैं।

मुख कैंसर है या नहीं, घर बैठे जांचें, देसी तरीके से!

मुख कैंसर है या नहीं, घर बैठे जांचें, देसी तरीके से! आजकल घर-घर में कैंसर है. तरह-तरह के कैंसर है. ऐसे में जरूरी है कैंसर से जुड़ी ज्यादा से ज्यादा जानकारियां इकट्ठी की जाएं. एलर्ट रहा जाए. कैसे बचें, कहां सस्ता इलाज कराएं. क्या खाएं. ये सब जानना जरूरी है. इसी कड़ी में यह एक जरूरी वीडियो पेश है.

Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಫೆಬ್ರವರಿ 11, 2019

आप जो भी न्यूज़ चैनल देखते हैं, जिसे भी पसंद करते हैं, आपका वक्त और पैसा लगता है। आप इन सवालों के साथ इन कार्यक्रमों को देखिए, सोचिए। चैनल बेशक चाहते हैं कि आप एक दर्शक के तौर पर उत्तेजित बातों की जाल में फंस जाएं ताकि आप मूल प्रश्न या गंभीर प्रश्न से कट जाएं। आपका सतही होना बहुत ज़रूरत है। इसलिए ये संघर्ष आपका है कि आप सतही होने से ख़ुद को बचाएं। अब आप सोचिए। फालतू चार प्रवक्ताओं को लेकर हर घंटे एक नए एंकर के साथ एक नया शो करने से क्या यह बेहतर नहीं होता कि दो कार्यक्रम रिकार्ड कर लो और वही दिन भर दिखाते रहो। क्यों हर घंटे नए होने का झांसा दिया जाता है और आप झांसे में हर घंटे आते हैं?

आप इसे पढ़ने के बाद एक डायरी लें। एक हफ्ते तक दो से तीन चैनलों के ऐसे कार्यक्रमों को देखें। अपने हित में एक ईमानदार नोट्स बनाएं। आपको लगता है कि ये आपके लिए ज़रूरी था, आपने कुछ अलग जाना तो देखते रहिए, वर्ना रिमोट उठा कर फेंक दीजिए। टीवी महंगा तो कुछ महीनों के बाद फेंक दीजिएगा। आप इस तरह के निष्क्रिय दर्शक कैसे हो सकते हैं, एंकर कोई देवता नहीं हैं। ज्यादातर आवारा और लोफर किस्म के हैं। आप उनकी तैयारी, पढ़ाई और भाषा से समझ सकते हैं। इसके लिए आक्सफोर्ट कैम्ब्रीज जाने की ज़रूरत नहीं है। बाकी आप समझदार हैं। ये मत कहिएगा कि बताया नहीं। वैसे ये बातें कई साल से बता रहा हूं। न आप बदलें न हम।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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Comments on “चैनलों में कंटेंट खत्म हो गया है, बस फार्मेट ही बचा है : रवीश कुमार

  • Truly spoken Ravish Ji..
    Completely agree that no content is left in any news channel, serials, movies, etc. with very rare exception..
    All are following one or the other format..
    Even Political parties are format driven only, and not content driven, and this is true for all political parties without any single exception…
    Keep the spirit up and update us all the time..
    Thanks

    Reply
  • Ye to Rubbish Kumar hai Jo congress ke talve chathta yai, aur PM ki burai karta hai. Isla Malik to khud Dordarshan me ghapla Karke baitha hai. Iske liye ise 18 lakh rps mahine tankha me milenge to ye Prannoy Roy ke kehne par galat kyon nai likhe?

    Reply
  • Laleshwar Chauhan says:

    Dear Sir g aapko nahi lagta ki is loktatra me Aap akele par gai hai sir g Mai Aap se Milna chata hu mumkin hai to please address de

    Reply
  • Sneha Thakur says:

    in the worlds largest democracy ,where everybody runs behind power and position and give a damn about the loss(here,intellectual) of the country in anyway but do care about themselves and eventually thats what all matters.
    in this when someone like Ravish kumar who himself is a reporter,an editor and a fantastic anchor reveals and gives you the insight of the real inside dirty plight condition of media or one may say the deteoreorating condition of media is quite fascinating.
    in this article he revealed or you say he shared his real opinion about the current scenario of media.
    All the birds of different feathers are flocking together,which means every news channel more or less in a way or two is fooling the audience by showcasing some shit which have no real or concrete content but it appeals the audience because its in the wrap of a good structured format and with an add of the screening of some minister and officials( where in most of the cases they know nothing )which is icing on the cake,how can they take the responsibility of inspiring or motivating the huge masses.
    every news channel is more or less doing the same thing “the art of making fool” where audience are sitting ducks.
    Another thing that is to be taken into consideration is the issue of aspiring journalism students who are being just used and they learn nothing,but the whole process runs so smoothly that even the victims do not realize it.
    the question is why to showcase the same thing in a different way 24*7 most of the time.
    i would just conclude by recognising this fact that the media houses or the anchor or even the editor cant be straightly blamed for anything its the audience who is equally responsible to bear this shit because eventually the content the format or anything for that matter is produced according to the demand of the situation.
    there is nothing new about whats said above,the speciality is somebody dared to share his opinion and its becpme even more special because its the ones veredict who himself belong to this community.
    THANKYOU SIR.

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  • Chandra prakash kumar says:

    Ravish sir sabse pahle mai aapko thank u bolna chauga qki aapne bilkul sach bat khi hai sir sabhi bolte hai ki media ke pass bahut freedom hota hai but society me hota kuch or hai lekin on screen kuch or show kiya jata hai ya to phir usi news ko pura din dikhaya jata hai.sir aapke article padhne ke bad yhi lagta hai ki media ke pass koi news or content hi ni hota hai isliye vo ek news ko alag alag format me dikhate hai ,ya media ke upar political pressure to ni hota?

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  • Very good they are not focussing on General man problem only some uneducated person crying aimless on any party or person debate should healthy and in the benefit of nation.why we waist our5 time in useleuseless article.

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