Deepak Chaurasia को रोका गया, उसके चैनल ने दिखाया पीटा गया!

Deepak Chaurasia को रोका गया. उसके चैनल ने दिखाया पीटा गया. लोगों ने लिखा पत्रकारिता पर हमला हो गया. शाहीन बाग़ में बीते महीने भर से तमाम पत्रकार गए और रिपोर्टिंग करके लौटे. सब अलग-अलग विचारधारा के लोग थे.

पत्रकारिता में एक विचारधारा के लोग कभी नहीं रहे, न कभी रहेंगे. वाम-दक्षिण हर तरह के लोग हैं. इससे मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है. शायद ही किसी को भी हो. मुझे विश्लेषण से भी दिक़्क़त नहीं है. एंगल से भी दिक़्क़त नहीं है. आप घनघोर दक्षिणपंथी विश्लेषण कीजिए. आपका अधिकार है.

दिक़्क़त और ऐतराज़ सिर्फ़ एक बात से है. झूठ बोलने से और तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करने से. दीपक चौरसिया ज़िंदगी भर यही करता रहा. ज़िंदगी भर पत्रकारिता की हत्या की. तथ्यों की हत्या की, सच की हत्या की.

2002-03 में जब ये आदमी आजतक में था तो इफ़्तिख़ार गिलानी के घर के सामने खड़े होकर उन्हें आतंकवादी बता रहा था. इफ़्तिख़ार गिलानी ख़ुद उस वक़्त सम्मानित पत्रकार थे और अब भी हैं. चौरसिया ने आज तक उस घटना के लिए माफ़ी नहीं मांगी. अगर उस वक़्त भी उसे कोई रोकता तो आप पत्रकारिता पर हमला करार देते? चौरसिया पत्रकार तो गिलानी क्या?

तब से लेकर अब तक ये आदमी ऐसे ही उन्माद फैलाने का काम करता रहा. 2016 में जेएनयू के बारे में रोज़ाना बड़ा-सा मुंह फाड़कर बाल्टी भर झूठ उगलता था. पत्रकारिता को अगर बचाना है तो ऐसे लोगों को डिस-ओन करना होगा जो फेक न्यूज़ फैलाते हों, झूठ बोलते हों, उन्माद फैलाते हों.

अगर फेक न्यूज़ परोसने वालों को रोका जाना पत्रकारिता पर हमला हो गया तो उस ‘पत्रकार’ के पक्ष में खड़ा होने वालों को ये भी देखना होगा कि वो पत्रकारिता नहीं, बल्कि इस गोरखधंधे को बचा रहे हैं.

मैं ये मानता हूं कि किसी को भी कहीं आने-जाने का अधिकार होना चाहिए. बतौर पत्रकार भी, बतौर नागरिक भी. लेकिन, ग़लत दवा देकर किसी को बीमार करने वाले डॉक्टर को अगर गांव वालों ने घर आने से रोक दिया तो इसमें गांव वालों को क्या दोष दें. रोक दिया. पीटा नहीं. रोकने को फिर चौरसिया पीटना कह रहा है. जेएनयू में नकाबपोश हमलावरों के हमले को हाथा-पाई कह रहा था. आदतन ऐसा करता है. इरादतन ऐसा करता है.

सुदर्शन न्यूज़ वाले ऐसे हर प्रोटेस्ट या प्रेस कांफ्रेंस में 5-7 रिपोर्टर को उकसाने के लिए भेज देता है. कल को लोग उन्हें भी रोकेंगे तो मैं इसे पत्रकारिता पर हमला करार नहीं दूंगा. दीपक चौरसिया अगर ये गुहार लगाएं कि बतौर नागरिक उनके साथ बदसलूकी हुई तो ‘च्च च्च’ करके अफ़सोस जता दूंगा. बस, पत्रकारिता शब्द मुंह से ना निकालें.

Tweet 20
fb-share-icon20

अपने मोबाइल पर भड़ास की खबरें पाएं. इसके लिए Telegram एप्प इंस्टाल कर यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia

Support BHADAS

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *