
रोज बदलते दिखते चुनावी मुद्दों के बीच अपना प्रचार और विरोधियों को बदनाम करने की नीति जारी है
संजय कुमार सिंह
आज की खबरों में सबसे बड़ी खबर प्रधानमंत्री का यह आरोप है कि विपक्ष देश को उत्तर दक्षिण में बांटने की कोशिश कर रहा है। काफी समय से मुझे लगता रहा है कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में संघ परिवार की राजनीति देश के कई टुकड़े कर देगी। जो हालात हैं उसमें इसपर बात करना या इसे विषय भी बनाना खतरों से खाली नहीं है। पर आज जब प्रधानमंत्री ने ही यह आरोप लगाकर मुद्दे को उठा दिया है तो उसपर बात होनी ही चाहिये। इसलिए भी कि दक्षिण से भाजपा जिस तरह साफ हो रही है और उत्तर पूर्व में जो स्थितियां हैं (असम को पूर्व कांग्रेसी और सबसे भ्रष्ट कहे जा चुके मुख्यमंत्री ने ही संभाल रखा है) उससे भाजपा हिन्दी पट्टी में सिमटती जा रही है और अबकी बार 400 पार पर सवाल इसीलिए उठ रहे हैं कि ये सीटें आएंगी कहां से। ऐसे में प्रधानमंत्री ने न सिर्फ अपने ‘मन की बात’ सार्वजनिक की है बल्कि अपना डर भी दिखाया है। असल में इसके लिए कांग्रेस नहीं, भाजपा ही जिम्मेदार है।
इसका कारण यह है कि भाजपा की राजनीति दक्षिण में पसंद नहीं की जा रही है और उत्तर में अपनी लोकप्रियता को दक्षिण पर थोपने की कोशिश का विरोध हो रहा है तो अंतिम परिणाम यही हो सकता है और अब प्रधानमंत्री ने इसे स्वीकार करने की बजाय कांग्रेस पर आरोप के रूप में पेश किया है। कहने की जरूरत नहीं है कि दक्षिण में उसकी लोकप्रियता भाजपा के लोकप्रिय नहीं होने के कारण है। केरल जैसे राज्य में जहां भाजपा का अस्तित्व ही नहीं है का उदाहरण देने का कोई मतलब नहीं है। कर्नाटक की बात की जाये तो कौन नहीं जानता है कि वहां भाजपा की सरकार कैसे बनी, कैसे काम किया और कैसे बनी रही और फिर कैसे हार गई। बहुत विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है, पर यह कहा जा सकता है कि उसी राजनीति का असर दक्षिण के दूसरे राज्यों में हुआ और भाजपा के भारी पांव दक्षिण से अब लगभग उखड़ गये हैं।
दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि जनता ने मौका दिया या नहीं, मिला तो भाजपा ने उसका उपयोग नहीं किया और अपनी लोकप्रियता स्थापित नहीं कर पाई। कारणों में मैं नहीं जाउंगा। मैं सिर्फ चुनाव हार जाने के आधार पर बात कर रहा हूं। दूसरी ओर, मेरा मानना है कि जैसे-तैसे झूठ बोलकर या जुमलों से भी भाजपा को सरकार बनाने का मौका मिला था तो वह अच्छी राजनीति करके अपनी लोकप्रियता बढ़ा सकती थी। अगर अच्छी राजनीति संभव नहीं थी या जो किया वह सब करना मजबूरी थी तो संघ परिवार अभिभावक की भूमिका में सरकार के काम पर नजर रख सकता था और आदर्श राजनीति की बात करके भाजपा की छवि एक अच्छे राजनीतिक दल की बना सकता था। इससे भाजपा को ही नहीं देश, लोकतंत्र और परिवार को भी फायदा होता। पर भाजपा ने दूसरों को नाराज कर बहमत को खुश करने का प्रयास किया।
यह अच्छी राजनीति नहीं है और उसमें सबसे ताजा है अपनी नाकमी के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराना। उस पर यह गलत, झूठा और घटिया आरोप लगाया जा रहा है जो न अच्छी राजनीति है और ना अच्छा राजनेता होने की पहचान। ऐसे में हिन्दी पट्टी में भाजपा को नुकसान हो या नहीं कांग्रेस की लोकप्रियता तो बढ़नी ही चाहिये, भले न बढ़े। संयोग से (या आबादी की पंसद के कारण) वह दक्षिण में लोकप्रिय है तो उसपर यह आरोप लगाना जितना अनुचित है उतना ही अनुचित संघवाद की उपेक्षा कर डबल इंजन राज्यों के साथ मनमानी औऱ गैर भाजपा शासित राज्यों के साथ पक्षपात है। इन दिनों दक्षिण के राज्य केंद्र के राज्यों का विरोध चल रहा है तब प्रधानमंत्री का यह आरोप और भी फूहड़ लग रहा है। इसका नुकसान न सिर्फ उन्हें होगा बल्कि भाजपा और देश व लोकतंत्र को भी होगा। फिर भी कई अखबारों ने इसे खूब महत्व दिया है लगभग उसी रूप में छापा है।
संभव है, इसे प्रमुखता नहीं देने वाले मुद्दे को समझ ही नहीं पाये हों या फिर इसका समर्थन नहीं करना चाहते हों अथवा विवाद से बचने की कोशिश में छोड़ ही दिया हो। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर लीड नहीं है पर प्रमुखता से छपी है और शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, कांग्रेस ऐसी कहानी आजमा रहा है जिससे उत्तर दक्षिण का विभाजन किया जा सकता है। हाईलाइट किये अंश के अनुसार, हमारा टैक्स हमारा पैसा पर प्रधानमंत्री ने कहा है कि इससे बुरा कुछ नहीं हो सकता है। और सवाल उठाया है कि पूर्वोत्तर के राज्य अगर देश के दूसरे राज्यों में कोयला नहीं जाने दें, या हिमालय की तराई वाले राज्य पानी या नदीं पर एकाधिकार जतायें तो क्या होगा। सबको मालूम है कि मुद्दा क्या है और तय हिस्सा मांगने का ही है। कोई ज्यादा नहीं मांग रहा इसमें बताया जा रहा है हमारा हिस्सा ज्यादा है, कम मिलता है और वो भी नहीं दे रहे। दूसरी ओर कोयला तो आयात हो ही रहा है और उसका खेल सबको मालूम है। यही हाल नदियों के मामले में है।
इसके बावजूद, द हिन्दू में इस खबर का शीर्षक साफ और सरल है। विपक्ष उत्तर-दक्षिण का विभाजन कर रहा है : प्रधानमंत्री। यह खबर यहां लीड है और उपशीर्षक है, मोदी ने कहा, एक पूरा राज्य यही भाषा बोल रहा है। इससे बुरा कुछ और नहीं हो सकता है। यह दर्दनाक है कि ऐसी भाषा एक राष्ट्रीय पार्टी की ओर से उभर रही है। उन्होंने कांग्रेस से विभाजक राजनीति बंद करने की अपील की है। इसके साथ ही दूसरी खबर शीर्षक है, कर्नाटक के नेताओं ने केंद्र पर हमला बोला और दिल्ली में विरोध प्रदर्शन किया। दक्षिण के एक राज्य के नेताओं को दिल्ली में विरोध प्रदर्शन करना पड़ रहा है यही भाजपा की बंटवारे की राजनीति का सबूत है। वहां कांग्रेस की सरकार है तो आरोप कांग्रेस पर लगाया जा सकता है और इसीलिए लगाया गया है। वरना बंगाल में ममता बनर्जी की समस्या मनरेगा का पैसा है। लेकिन उन्होंने कहा है कि कांग्रेस को 40 सीट नहीं मिलेगी तो उसकी तारीफ हो रही है।
मुझे लगता है कि हिन्दी अखबार इस विभाजक राजनीति की गंभीरता समझते हैं इसीलिये ‘मोदी-मोदी’ करने वालों ने भी इस खबर को प्रमुखता नहीं दी है। अमर उजाला और नवोदय टाइम्स दोनों में लीड का शीर्षक यह नहीं है। इस खबर को इसी अंदाज में किसी भी अखबार ने नहीं छापा है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर लीड है पर बताया गया है कि 17वीं लोकसभा के खत्म होने पर प्रधानमंत्री ने कहा, …। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष के इस नजरिये के लिए इसकी आलोचना की। यह खबर कर्नाटक के कांग्रेसी मुख्यमंत्री के जंतर मंतर पर प्रदर्शन की खबर और फोटो के साथ है। इस खबर का शीर्षक है, टैक्स (की राशि) के बंटवारे पर केंद्र बनाम राज्य का बंटवारा गहराया। और पूरा मामला स्पष्ट है। प्रधानमंत्री की राजनीति भी।
कहने की जरूरत नहीं है कि आज की खबरों और शीर्षक से समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री ने जो कहा है उसका कारण या आधार क्या है और चूंकि उन्होंने जो कहा है उसे वैसे ही छाप दिया जाये तो उसका असर गहरा होगा इसीलिए वैसे नहीं छापा गया है जबकि अभी तक अखबार प्रधानमंत्री (और भाजपा) के बयानों तथा आरोपों को जस का तस छापकर उनके पक्ष में माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते रहे हैं। इसमें कांग्रेस के नुकसान या कांग्रेस के फायदे की तो परवाह ही नहीं की जाती रही है। पर आज लग रहा है कि प्रधानमंत्री के बयान के बावजूद अखबारों ने भड़काऊ शीर्षक नहीं लगाया है। उदाहरण के लिए, आम आदमी पार्टी के दिल्ली जल बोर्ड के कथित घोटाले की जांच के लिए ईडी को छापे में दो करोड़ रुपये (ही) मिले हैं।
आम आदमी पार्टी ने कहा है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने का दावा करती है लेकिन ईडी का मुकदमा पीएमएलए (प्रीवेंशन ऑफ मनी लांडरिंग) के तहत होता है क्योंकि इसमें जमानत मुश्किल है और यह कानून नशे का धंधा करने वाले माफिया के लिए बना था। पर सरकार उसका दुरुपयोग कर रही है। यह दिखाई भी दे रहा है। एक आदिवासी मुख्यमंत्री को तो ईडी ने गिरफ्तार कर लिया पर दिल्ली के मुख्यमंत्री के मामले में अदालत का आदेश लिया गया है। जांच के दौरान निर्वाचित नेता के जेल में रहने का कोई मतलब नहीं है लेकिन जनहित में सबसे अच्छा काम करने वाले राजनेताओं में एक, मनीष सिसोदिया लंबे समय से जेल में हैं। एक मामले की जांच के लिए पी चिदंबरम भी 105 दिन जेल में रहे थे, कई वर्ष हो गये मामले का कोई पता नहीं है। 350 करोड़ रुपये नकद बरामद होने का शोर आपको याद होगा पर मामले का क्या हुआ? राहुल गांधी को फंसाने की कोशिश भी जगजाहिर है।
कुल मिलाकर अब यह साफ हो चुका है कि सत्तारूढ़ पार्टी काम कम करती है, प्रचार ज्यादा होता है और काम दूसरों को बदनाम करने का कम नहीं है। अपनी प्रशंसा तो है ही। इसमें सरकार को मीडिया का पूरा सहयोग मिलता रहा है और इसी से प्रेरित होकर प्रधानमंत्री ने कांग्रेस पर यह आरोप लगा दिया जिसकी उसे जरूरत ही नहीं है। आपको याद होगा कि 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेन्द्र मोदी सरकार कांग्रेस मुक्त भारत की बात करती थी और राहुल गांधी ने कहा था कि लड़ाई विचारधारा की है और हम भाजपा को हरायेंगे। वे अपनी नीतियों, कोशिशों और विचारों से भाजपा को हराने का हरसंभव उपाय कर रहे हैं लेकिन भाजपा अभी चुनाव के लिए मुद्दा ही तय नहीं कर पाई है और अगर जातिवार जनगणना जैसे प्रयास के जवाब में कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न देना था तो कुछ ही दिन बाद लाल कृष्ण आडवाणी की पूछ नहीं होने का दबाव दिख गया।
इसीलिए, भाजपा मंडल-कमंडल दोनों का लाभ लेने की कोशिश के बावजूद चुनाव को लेकर उलझी लग रही है और रोज मुद्दा बदल जा रहा है। भाजपा जीतने के लिए कांग्रेस पर आरोप तो लगा ही रही है अखबार उसकी सहायता में शीर्षक लगा रहे हैं, आरक्षण पसंद नहीं था नेहरू को, मोदी बोले (नवोदय टाइम्स) और कांग्रेस नेहरू के समय से ही आरक्षण विरोधी, अंग्रेजी राज से प्रभावित : मोदी (उमर उजाला)। दोनों शीर्षक पढ़कर लगता है कि देश बांटने के आरोप को गंभीरता नहीं देने का कारण उसकी विश्वसनीयता कम होना भी हो सकता है। यह ज्यादा विश्वसनीय है और अखबारों ने ज्यादा लाभ वाला काम किया हो। निजी तौर पर मैं अखबारों को बेनीफिट ऑफ डाउट दूंगा और यही मानूंगा कि देश हित में उन्होंने प्रधानमंत्री के इस आरोप को ज्यादा महत्व नहीं दिया है। हालांकि, प्रधानमंत्री अपने आरोप पर कायम रह सकते हैं और दोहरा भी सकते हैं। तब देखना होगा कि अखबार क्या करते हैं। हालांकि, तब की तब देखी जायेगी।
आज अखबारों में जब कांग्रेस पर उत्तर दक्षिण के विभाजन का प्रधानमंत्री का आरोप छपा है तब ममता बनर्जी का यह आरोप भी है कि केंद्र सरकार ने मनरेगा के 21 लाख मजदूरों के पैसे नहीं दिये हैं और दो साल बाद राज्य सरकार ने उनके पैसे देने शुरू किये हैं। यह कोई नया आरोप नहीं है और कई राज्यों की ऐसी शिकायत रही है। मणिपुर का मामला सामने है और प्रधानमंत्री वहां गये तो नहीं ही मुख्यमंत्री को बदला भी नहीं गया। इसमें भाजपा की राजनीति चाहे जो रही हो वहां की जनता में भाजपा की छवि अच्छी नहीं बनी होगी। भले मुख्यमंत्री को बनाये रखने के लिए एक वर्ग विशेष द्वारा पसंद किये जाये। हिन्दुत्व की राजनीति और मुसलमानों के लिए कांग्रेस कुछ करे तो उसे तुष्टिकरण और खुद हिन्दुओं के लिए जो करें उसे संतुष्टिकरण कहना भी फूट डलो राजनीति करो ही है।
कर्नाटक में स्कूली छात्रों के परिधान को लेकर जो राजनीति की गई उसे वहां के लोगों ने पसंद नहीं किया। वहां भाजपा की सरकार नहीं बन पाई तो उसके हिस्से का टैक्स का पैसा नहीं देना और मांगने पर उत्तर दक्षिण की राजनीति का आरोप लगाना कोई एंटायर पॉलिटिकल साइंस का रहस्य नहीं है, हर कोई समझता है लेकिन यही प्रधानमंत्री की राजनीतिक है। नैरेटिव बनाने की या कहिये कहानियां गढ़ने की। यही नहीं, नीतिश के लिए भाजपा के बंद दरवाजे खोलकर उन्हें वापस पार्टी में लेना भी विचारधारा का खोखलापन है पर वे अपनी बात नहीं करते आज नेहरू की बात कर रहे हैं। मीडिया के समर्थन और सहयोग से चल रही भाजपा की इस राजनीति का एक पहलू यह भी है कि मंदिर बनने के बाद ज्ञानव्यापी का मुद्दा आ गया है। उसे ठंडा करने या 1991 के पूजास्थल कानून की आड़ में शांत करने की बजाय आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार मुख्यमंत्री योगी ने काशी, मथुरा का मामला उठाया है और शीर्षक में लिखा है कि अयोध्या के बाद नंदी और कृष्ण इंतजार नहीं कर सकते हैं। 1991 के पूजास्थल कानून के मुताबिक 15 अगस्त 1947 से पहले भारत में जिस भी धर्म का जो पूजा स्थल था, उसे किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में बदला नहीं जा सकता। अगर कोई ऐसा करने का प्रयास करता है, तो उसे तीन साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। पर इसका अब कोई मतलब ही नहीं रह गया है। लेकिन कांग्रेस की इस राजनीति के कारण दक्षिण में उसकी लोकप्रियता बढ़े को उसका क्या दोष?



Dayal
February 8, 2024 at 10:12 pm
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