द टेलीग्राफ की लीड खबर ‘हमारा ध्यान भटकाया जाना क्यों जरूरी था’ सिस्टम को आइना दिखा रही!

कोलकाता से प्रकाशित द टेलीग्राफ अखबार के पहले पन्ने पर छपी लीड खबर की आज अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। पैदल गांव की तरफ निकल पड़े विस्थापित मजदूरों के चित्र समेत सात कालम की देव राज की बाइलाइन यह खबर सिस्टम को आइना दिखा रही है। टेलीग्राफ की इस लीड खबर का शीर्षक हिंदी में कुछ यूं होगा- ‘हमारा ध्यान भटकाया जाना क्यों जरूरी था’। इसे पढ़ने के साथ ही समझने की भी जरूरत है।

खबर राज्यों को सील करने के बाद की अफरातफरी झेल रहे मजदूरों की बेबसी, मजबूरी, आपबीती के जरिए आज के हालात से रुबरु कराती है। टेलीग्राफ ने साफ शब्दों में स्पष्ट किया है कि अपनी नाकामी छुपाने के लिए ही सरकार हमारा ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

जब चैनलों और अखबारों में नॉन स्टॉप खबरें परोसी जा रही हों कि हालात पर काबू पाने में सरकार कितनी तत्परता के साथ काम कर रही है, तब ये खबर ग्राउंड रियल्टी तक ले जाती है। गोदी मीडिया के जरिए हमें हकीकत से दूर रखने की भरपूर कोशिश की जा रही है। सरकार भी जनता का ध्यान भटकाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। पर वास्तविकता तक निगाह कुछ लोगों की ही पहुंच पा रही है।

आखिर मजदूर क्यों छोड़ रहे शहर। लाखों की तादाद में पैदल अपने गांव जाने को क्यों मजबूर हुए। वजह ये कि उन्हें सरकार और प्रशासनिक अधिकारियों से यह आश्वासन नहीं मिला कि उनके रहने खाने के इंतजाम में दिक्कतें नहीं आयेगी। पूरे शहर में श्मशान की खामोशी पसरी दिखायी दे रही। सरकार ने आनन फानन में पूरे देश में बंदी (लॉकडाउन) का ऐलान कर दिया। इसी दरम्यान मालिकों ने अपने मजदूरों-वर्करों को चंद पैसे थमाकर नौकरी से निकाल दिया। लिहाजा इन मजदूरों के पास किराये का मकान छोड़ अपने गांव लौटने के सिवा कोई और चारा भी न था।

ताज्जुब की बात ये है कि सरकार ऐसे हालात में संसाधनों का सही इस्तेमाल कर पाने में नाकाम साबित हो रही है। इन प्रवासी मजदूरों को आश्वस्त नहीं कर पायी और घबराये मजदूरों के पास घर लौटने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था। मुसीबत ये कि घर लौटने के भी इंतजाम नदारद थे। न रेल चल रही थी और न बस। कभी न खत्म होने वाले रास्ते में रोते-बिलखते परिजनों को लेकर ये प्रवासी मजदूर चले जा रहे थे।

सफर के बीच में सरकार इन मजदूरों को बसों में लादकर पटना पहुंचा देती है। इन मजदूरों को क्वारंटाइन में रखा गया है जहां आकर उनके रिश्तेदार मिल रहे हैं। हालांकि ये मजदूर अभी तक अपने घर नहीं पहुंच पाये हैं। इक्कीसवीं सदी में भी अपने घर पहुंचने के लिए मजदूरों को जिन हालातों से गुजरना पड़ा है, जाहिर है सरकार हमारा ध्यान इसी लिए भटकाना चाहती है। टेलीग्राफ ने सरकार की नाकामियों पर उंगली उठाने का साहस दिखाया है। ऐसे सवाल करने की हिम्मत मीडिया में कम ही दिखायी पड़ती है।

जरूरी तो नहीं, हम तमाम चैनलों पर और अखबारों में जो दिखाया या पढ़ाया जा रहा हो, उस पर आंख मूंद कर भरोसा कर लें। देश के तमाम हिंदी और अंग्रेजी के अखबार वही परोस रहे जो सरकार हमें समझाना या जतलाना चाहती है।

कोलकाता की पत्रकार एसएस प्रिया का विश्लेषण.

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