केन्द्र और यूपी सरकार के बीच की बढ़ रहीं दूरियां

उत्तर प्रदेश की अखिलेश और केन्द्र सरकार के बीच सामंजस्य के अभाव में दूरियां बढ़ती जा रही हैं। खासकर केन्द्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद हालात और भी बिगड़ गये हैं। जब तक केन्द्र में कांग्रेस की सत्ता रही तब तक तो मनमोहन सरकार को दोस्ताना समर्थन के एवज में समाजवादी और बसपा नेताओं ने खूब मनमानी की। चाहें माया की सरकार रही हो या अब अखिलेश हुकूमत दोनों ही सरकारों ने समय-समय पर दिल्ली को आंख दिखाने और ‘चुराने’ का कोई भी मौका नहीं छोड़ा। जब सपा-बसपा सरकारों को मदद की जरूरत होती तो वह मनमोहन सरकार को आंख दिखाने लगती और जब सीबीआई का मसला आता तो आंख चुराने को मजबूर हो जातीं।

यह सिलसिला लम्बे समय तक चला लेकिन दिल्ली में सत्ता बदलते ही अखिलेश सरकार को मोदी सरकार में खोट ही खोट नजर आने लगी है। केन्द्र पर राज्यों से संबंध के मामले में दोहरा चरित्र अख्तियार किये जाने की बात कई राज्यों सरकारों के साथ-साथ अखिलेश सरकार भी कर रही है। चाहें यूपी को पूरा बिजली कोटा या कोयला नहीं मिलने की बात हो या फिर विकास कार्यो के लिये केन्द्र से मिलने वाली मदद का सवाल। अथवा सूखे से निपटने के लिये मिलने वाली केन्द्रीय सहायता का मसला। अखिलेश सरकार और उसके नेता मोदी सरकार को घेरने का कोई भी मौका छोड़ते नहीं है।

मोदी सरकार की तस्वीर कुछ ऐसी पेश की जा रही है जैसे वह प्रदेश के विकास की विरोधी हो। राज्य की छोटी-बड़ी सभी समस्याओं के लिये कभी सही मायनों में तो अक्सर सियासत के तहत मोदी सरकार को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहराया जा है। केन्द्र पर दोषारोपण करने के चक्कर में समाजवादियों ने अपने गिरेबान में झांकना बंद कर दिया है। बिजली को ही ले लीजिये अखिलेश सरकार की नजरों में इसके लिये मोदी सरकार जिम्मेदार है, लेकिन वह यह नहीं बताते कि उत्तर प्रदेश में बिजली का उत्पादन क्यों नहीं बढ़ पा रहा है। बिजली प्रबंधन पूरी तरह से ध्वस्त हो रखा है।

नये प्लांट लग नहीं रहे हैं, जो हैं भी वह अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर रहे हैं। बिजली का अरबो रूपया उपभोक्ताओं पर बकाया है। बिजली चोरी एक अभिाशाप बन गया है। ऐसे में केन्द्र क्या कर सकती है। बिजली खरीदने के लिये राज्य को पैसा चाहिए वह भी उसके पास नहीं है। राज्य सरकार बिजली संकट पर मैराथन बैठकें कर रही है, लेकिन कोई रोड मैप नहीं होने की वजह से सभी मोर्चों पर नाकामी ही हाथ लग रही है। ऐसे में मोदी पर उंगली उठाना कैसे तर्कसंगत हो सकता है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बार-बार कहते हैं कि राज्य सरकार बिना केन्द्र की मदद से विकास कार्यो को आगे बढ़ा रही है। वहीं भाजपा के यूपी प्रवक्ता विजय पाठक का कहते हैं कि केन्द्र पूरी मदद कर रहा है। मगर यूपी में विकास का माहौल ही नहीं है। बजट का पैसा खातों में पड़ा है, लेकिन कई विकास कार्य शुरू ही नहीं हो पा रहे हैं। अखिलेश सरकार को जनविरोधी बताते हुए भाजपाई आरोप लगाते हैं कि जब मुख्यमंत्री के अधीन विभागों में ही विकास का पैसा नहीं खर्च हो पा रहा है तो अन्य विभागों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है। सीएम के अधीन आने वाले आवास विकास परिषद के 1238.22 करोड़ रूपय में से सिर्फ करीब 140 करोड़ रूपया खर्च हो पाया है। इसी तरह से गन्ना विकास विभाग का बजट खर्च शून्य के बराबर है। अखिलेश उधोग विकास के बजट का मात्र 10 प्रतिशत ही खर्च कर पाये हैं। बुंदेलखंड पर भी यहां बात करना जरूरी है जो तमाम आपदाओं से जूझता रहता है। केन्द्र से इस क्षेत्र के लिये समय-समय पर मदद भी मिलती रहती है। परंतु राज्य सरकार यहां भी खरी नहीं उतरती है। इसी के चलते राज्य को बुंदेलखंड राहत की अगली किस्त नहीं मिल पा रही है।

राष्ट्रीय अनावृष्टि क्षेत्र प्राधिकार(एनआरएए) ने केन्द्र को भेजी एक रिपोर्ट में कहा है कि बुंदेलखंड क्षेत्र में जरूरत से ज्यादा बारिश हुई और यूपी को बुंदेलखंड पैकेज के तहत जो धनराशि मिली थी, उसका अखिलेश सरकार पूरा उपयोग नहीं कर पाई। ऐसे में बुंदेलखंड पैकेज के लिये नयी किस्त जारी करना उचित नहीं है। एनआरएए की इसी रिपोर्ट के आधार पर केन्द्र ने बुंदेलखंड पैकेज की शेष धनराशि रोक दी है। वैसे,केन्द्र से पैकेज को लेकर उत्तर प्रदेश में हमेशा से ही सियासत होती रही है। कभी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी तो कभी समाजवादी पार्टी एवं बसपा सरकारों इसके सहारे राजनैतिक रोटियां सेंकती रही हैं।

 

लेखक अजय कुमार लखनऊ में पदस्थ हैं और यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं में वरिष्ठ पदों पर रह चुके हैं। अजय कुमार वर्तमान में ‘चौथी दुनिया’ और ‘प्रभा साक्षी’ से संबद्ध हैं।



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