दैनिक जागरण, इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी अवधेश गुप्ता से परेशान हैं आम मीडियाकर्मी

दैनिक जागरण इलाहाबाद का माहौल यहाँ के निरंकुश सम्पादकीय प्रभारी अवधेश गुप्ता की अराजकता और तानाशाही से दिन प्रतिदिन खराब होता जा रहा है। आलम यह है कि अवधेश ने डरा-धमकाकर करीब दस लोगों को नौकरी से निकाल दिया है, जबकि और भी कई लोगों से इस्तीफा देने को कहा जा रहा है। इस खराब माहौल के चलते जागरण इलाहाबाद में कोई नौकरी करने आना ही नहीं चाहता। फिर भी अवधेश गुप्ता सबके उत्पीड़न पर उतारू है। यहाँ अवधेश के दो साल के कार्यकाल में पीयूष उपाध्याय, कौशलेंद्र मिश्रा, विशाल सिंह, शोमा रॉय, विपिन त्रिवेदी, मनीष मिश्रा, संदीप दुबे समेत कइयों ने इसके उत्पीड़न के बाद नौकरी से हाथ धो दिया।

सीनियर रिपोर्टर अमरीश शुक्ला की नौकरी भी इसने लगभग ले ही ली थी। वो तो भला हो लखनऊ के गार्जियनों का, कि अमरीश का पक्ष सुनने के बाद किसी तरह इन्हें काम करने दिया जा रहा है। ताज़ा जानकारी यह है कि अभी कुछ दिन पहले ही सीनियर सब एडिटर के रूप में आये मिथिलेश यादव भी विगत दस दिनों से ऑफिस नहीं आ रहे हैं। वह भी अवधेश के व्यवहार से आजिज़ थे। बताया जा रहा है कि अब वह भी यहाँ सेवाएँ नहीं देंगे। क्या जूनियर क्या सीनियर, अवधेश गुप्ता का व्यवहार सभी के साथ बेहद खराब है। यह सबको नौकरी से निकालने की धमकी देता रहता है। इलाहाबाद के सम्पादकीय विभाग में इसके दो-तीन खास गुर्गे हैं, जो इसे गाड़ी और शराब मुहैया करते हैं। ये सभी अखबारी काम में नकारा हैं, लेकिन इन गुर्गों के खिलाफ अवधेश कुछ नहीं करता। ऐसा नहीं है कि ऊपर के लोग इसकी करतूतों को नहीं जानते। लेकिन कहते हैं न कि कुएँ में भंग पड़ना। यही हो रहा है जागरण समूह में।

अभी कुछ महीने पहले तक जब श्री रामेश्वर पाण्डेय जी यू पी स्टेट हेड थे, तो वे सबकी सुनते थे और आवश्यक कार्रवाई भी ज़रूर करते थे। लेकिन उनके संस्थान में न रहने के बाद तो मानो सभी प्रभारी निरंकुश हो गये हैं, जबकि लखनऊ और नोएडा में बैठे लोग ‘धृतराष्ट्र’। शिकायत करने पर यह लोग लिखित जानकारी मांगते हैं और जब पुख्ता सबूतों के साथ जानकारी दी जाती है तो शिखंडी की भूमिका में आकर प्रभारी का ही बचाव करते हैं। लगता है जागरण प्रकाशन लिमिटेड में नियम-कानून रह ही नहीं गया है। यही शह पाकर अवधेश गुप्ता अब गाली-गलौज पर उतारू हो गया है और रिपोर्टर, फोटोग्राफर, जिला प्रभारी सबको गालियां देकर गंदे ढंग से बात करता है।

दो दिन पहले इलाहाबाद में तीन नए सब एडिटर मिल गए, इसके बाद तो यह हवा में उड़ रहा है और सबको लात मारकर नौकरी से निकालने की धमकी दे रहा है। अवधेश गुप्ता का कहना है कि “ये सभी नियुक्तियां मैंने स्वयं की हैं। लखनऊ और दिल्ली के बड़े लोग मेरे ठेंगे पर। मैं ‘गुप्ता’ हूँ। मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।” इसका कहना कुछ हद तक सही भी है क्योंकि आये दिन इस यूनिट में पुलिस घुसती है, रिपोर्टरों को थाने ले जाती है। वकील आकर इसको माँ-बहन की सरेआम गलियां देते हैं। विश्वविद्यालय के छात्र ऑफिस में आकर तोड़-फोड़ करते हैं। पीड़ित छात्राएँ आकर लोकल इंचार्ज की माँ-बहन करते हुए मार-पीट करती हैं। संस्थान का ही एक फोटोग्राफर गंगा नदी के किनारे अरैल के पास झाड़ियों में एक महिला के साथ संदिग्धावस्था में इंचार्ज की फोटो खींचता है। मामला बढ़ता देख वह इंचार्ज फोटो डिलीट करवाता है। यह सभी जानकारियाँ ऊपर बैठे धृतराष्ट्रों को है, लेकिन निकाले जा रहे हैं  दो जून की रोटी के लिए परेशान सब एडिटर।

दो-तीन तथ्य और। अपने आपको स्टेट हेड का रिश्तेदार बताने वाले एक नवागन्तुक सब एडिटर के सामने तो अवधेश गुप्ता की गुंडई फाख्ता हो गयी। महज़ दो दिन पूर्व इस सब एडिटर ने आते ही प्रशासन देखने वाले सीनियर रिपोर्टर से सर्किट हाउस में ठहरने की बात कही। सीनियर रिपोर्टर ने जब इस सन्दर्भ में असमर्थता ज़ाहिर की तो अवधेश गुप्ता ने उन्हें हड़काते हुए कहा कि, “तुम मेरी नौकरी खा जाओगे क्या?” आनन-फानन में ऊपर तक बात कर इस दबंग सब एडिटर को जिलाधिकारी इलाहाबाद का मुख्य गेस्ट मानते हुए सर्किट हाउस के केबिन नंबर-19 में ठहरा दिया गया है। यानि कि जिलाधिकारी का मेहमान और सभी सुख-सुविधाओं से लैस। जबकि दो और नए आगंतुक साथी यहाँ ठौर-ठिकाने की तलाश में दर-दर भटक रहे हैं। जय हो दैनिक जागरण और जय हो अवधेश गुप्ता।

विगत 15 साल से इस यूनिट में सेवा देने वाले एक सीधे-सादे साथी की नौकरी लेने पर अब अवधेश गुप्ता आमादा हैं। वह इस साथी से आये दिन सादे कागज़ पर इस्तीफ़ा लिखवाता रहता है। अवधेश सीनियर साथियों को भी नहीं छोड़ता। अभी कुछ दिन पहले इसने स्टेट हेड से लगायत निदेशकों तक यह ई-मेल चलायी थी की न हमारे यहाँ इनपुट काम करता है, न आउटपुट। सब नकारे हैं। दिन-रात गन्दी राजनीति करने वाले इस ईगोइस्ट प्रभारी से अभी कल ही में सीनियर साथियों का भी जमकर झगड़ा हुआ और एक दूसरे को देख लेने की बात दोनों तरफ से हुई, जिसे पूरे ऑफिस ने सुना। हँसी का पात्र बन चुके यहाँ के महाप्रबंधक की भूमिका सबकी समझ से पर है। जो पक्ष मज़बूत होता है, महाप्रबंधक उसी तरफ लुढक जाते हैं। और लुढ़कें भी क्यों न! इनके रिटायरमेंट का काउंट डाउन जो शुरू हो गया है।

पीड़ित पत्रकार
दैनिक जागरण
इलाहाबाद
(भड़ास के पास भेजे गए एक पत्र पर आधारित.)

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Comments on “दैनिक जागरण, इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी अवधेश गुप्ता से परेशान हैं आम मीडियाकर्मी

  • Vishal Singh says:

    mahaparbandhak to gadyaal hai, maha jativadi aur matlab parast….. iski hi antim muhar ke baad aadmi bahar hota hai, aakhir ravi uppahaaya aur ss khan kyun nahin bahar ho paye, yeh jisko chahta hi usko rokta hao , vastav mein yeh sansthan mein dalali ki pravritti ko reporteron ke madhayam se badhava deta hai, isne samarpit logon ko sadguru aur avdesh ke sath milkar hataya hai, taki iski dukaan chalti rahe ….

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  • Kumar Manish says:

    इधर स्थिति बहुत बदल गयी है। एस.एस. खान साहब के साथ कोई अच्छा थोड़े ही हुआ है। कभी इलाहाबाद मुख्यालय में चीफ रिपोर्टर व लोकल इंचार्ज से लेकर और भी बड़ी जिम्मेदारियां निभा चुके बहुत सीनियर पत्रकार खान साहब को अपमानित कर भेज दिया गया प्रतापगढ़। तो कानपुर से आये एक युवा पत्रकार सचिन शुक्ल को कौशाम्बी जैसी जगह जूझने भेज दिया, जहां कोई जाता ही नहीं था। मंशा थी कि ये दोनों खुद इस्तीफा देकर भाग जायेंगे, पर इन दोनों प्रभारियों ने तो दोनों जिलों में अवधेश गुप्ता का जाल-बट्टा पकड़ लिया। इसीलिए इन दोनों पर और आफत आ गयी है। उधर रवि उपाध्याय की भी हालत ठीक नहीं है। अवधेश ने एक-एक करके सबको हटाने के बाद अब रवि उपाध्याय को भी निशाने पर ले रखा है। इन सबमें महाप्रबंधक की भी अहम भूमिका है।

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  • Lal Mohammad says:

    Allahabad Unit ka durbhagya hai ki use Govind Srivastave aur Sadguru jaise adhikari mile, dono ne dil khol kar manmani ki ab us parampara ko Avdesh aur Govind aage badha rahe hain, Gair Brahman aur Muslim inke nishne par rahte hain, Chun Chun kar safai karvata hai. Muslimon ko to is papers se puri tarah kinara kar lena chahiye, Ek Employ ko nahin tikne dete…
    Ramzan ki khabar mein darjanon galtiyan karte hain lekin ek stringer tak nahin rakh sakte. pura anti Islamic paper hai,,,, Vigyapan ke leye Inqlab khared liya hai, lekin sonch nahin badli…. mahaprabandhak murdabaaad

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  • its true ki jagran Allahabad ka mahual bilkul bekar ho chuka hai,jiske liye sampadak Awdhesh Gupta doshi ai. unhe ek ladki se bat krne ki tameez nhi na hi koi knowledge, kaise wo editor ki post per hai, its strange. by d way not only awdhesh but the seniors who are in well position in jagran group they also have cheap mentality. they can’t understand the problems of media persons.

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  • no doubt the atmosphere of Allahabad Jagran became worse and its reason is there poor management. who raises the voice against them, they fired. interesting thing is the seniors who obtained a well position in Jagran Group, they also supports them, thats the reason humiliation with common media persons are increasing.

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  • गिर रही है अखबार की साख
    गत दो वर्षों में अखबार प्रयोगशाला बन चुका है। अपने चहीतों और नीतियों की स्थापना में यहां पर ऐसे ऐसे प्रयोग हुए हैं जो सोचे भी नहीं जा सकते। बनारस की नीतियों का खुलेआम उल्लंघन हुआ। तर्रा यह कि मै संजय गुप्त जी का भेजा हुआ आदमी हुू कोई कुछ उखाड नहीं सकता। ऐसे में बनारस और नोयडा में बैठे हुए कंपनी के निर्देशकों से अपील है कि इलाहाबाद की कार्यप्रणाली की समीक्षा करें। यह तो हमारे सुधी पाठको की कृपा है कि अखबार 1 नंबर बना हुआ है। बौदिृध्क वर्ग की राय में खबरो का स्तर नहीं उठ पा रहा है। पाठक

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  • रमजान में रूटीन कवरेज के लाले पडे
    जागरण की राज्य और संेटल डेस्क के दिशा निर्देश के अनुसार समाचारपत्र का विस्तार इलाहाबाद के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में अधिक बढे इसके लिए प्रयास हुए थे। सर्कुेलेशन विभाग अधिक से अधिक पैसा खर्च कर रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि रमजान के दिनों में रूटीन कवरेज के लाले पडे हैं। लेकिन समचार संपादक अपनी पक्षपाती सोच के कारण समाचार को पत्र में स्थान ही नहीं देेते हैं। इसी माह मुस्लिम समाज का बडा आयोजन स्थान ही नहीं पायेगा। शीर्ष नेतत्व के निर्देश पर मुस्लिम बेल्ट में समाचार पत्र का वितरण बढाने के लिए जीतोड कोशिश हुई। नतीजन अखबार भी बढा और इसकी साख भी। वर्ष 2005 से इस वर्ग में न्यूज पेपर को बढाने के लिए विशेष निर्देश मिले उससे कही आगे काम किया गया। दो वर्ष पहले अब इन्होंने इस वर्ग की संवेदना समेटने वाले रिपोर्टर अजहर तक को संपादकीय टीम से हटा दिया। एसएस खान को प्रतापगढ भेज दिया गया है। यह इनकी मुस्लिम विरोधी मानसिकता का नतीजा है।

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