बिहार में डॉक्टर ड्यूटी पर हैं फिर भी बच्चे ‘चमकी’ और ‘लू’ से मर रहे, अखबारों में खबर गोल

डॉक्टर्स की हड़ताल और उससे जुड़ी खबरों को मिली प्राथमिकता देखिए

आज का टेलीग्राफ : शीर्षक में अपील देखिए और फिर दूसरे अखबारों की सोचिए

अब यह बताने और यकीन दिलाने की जरूरत नहीं है कि पश्चिम बंगाल में चिकित्सकों की हड़ताल उनकी मांग और जरूरतों के लिए कम, राजनीति के लिए ज्यादा है। इस बारे में मैं कई दिनों से लिख रहा हूं और मेरे लिखने के केंद्र में अखबारों की भूमिका, खबरें और शीर्षक होते हैं। मेरा यह निष्कर्ष भी इसी पर आधारित है। आज द टेलीग्राफ ने अपनी मुख्य खबर (खासकर शीर्षक) और एक पुरानी खबर को प्रमुखता से याद दिलाकर वर्तमान स्थिति में आदर्श अखबार की भूमिका निभाई है। मैंने इस बारे में पहले भी लिखा है – आज फिर एक अखबार के रूप में टेलीग्राफ की भूमिका रेखांकित कर रहा हूं। आप खुद देखिए बाकी अखबारों और टेलीग्राफ में क्या अंतर है। पहले टेलीग्राफ की खबरें और फिर चिकित्सकों की हड़ताल से संबंधित दूसरे अखबारों की खबरें।

टेलीग्राफ में आज दो लाइन का फ्लैग शीर्षक है और मुख्य शीर्षक है, “लेट गुड सेंस प्रीवेल”। इस हिन्दी में लिखा जाता तो कुछ इस प्रकार होता, “चिकित्सकों, आपने अपनी बात रख दी है और मुख्यमंत्री के तेवर तर्कसंगत हैं, उन्होंने अपना लहजा बदल लिया है। अब समय आ गया है कि …. समझदारी लागू हो”। इस खबर की प्रस्तुति देखिए और इसके साथ प्रकाशित फोटो तथा दूसरी खबर भी। दूसरी खबर का शीर्षक है, डॉक्टर भी बात करने को उत्सुक हैं। कुल मिलाकर, अखबार की भूमिका तो अच्छी है ही खबरों और शीर्षक से नहीं लगता है कि सोमवार को देश भर में चिकित्सकों की हड़ताल हो गई तो क्या होगा। ना डर फैलाने वाली खबर है और ना आग में घी डालने वाली। एक सीधी, स्पष्ट अपील से सबका भला करने की कोशिश की गई है। मौके का लाभ उठाने की कोई कोशिश भी नहीं है।

इसके साथ, अखबार अपना दायित्व भी नहीं भूला है। पहले पन्ने पर गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान की फोटो रीमाइंडर (अनुस्मारक) शीर्षक से छपी है। इसके साथ बताया गया है, गोरखपुर के डॉ. कफील खान। इनका कहना है कि राज्य सरकार ने उन्हे अनुचित ढंग से मुअत्तल कर दिया था। शनिवार को इन्होंने कहा कि सोमवार को जूनियर डॉक्टर्स के समर्थन में हड़ताल की अपील करने वाले इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने सहायता की उनकी कई अपील पर कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई थी। अखबार ने इस संबंध में विस्तृत खबर विस्तार से छापी है। कल सोशल मीडिया में इस और ऐसे कई अन्य मामलों की खूब चर्चा हुई और आईएमए की सक्रियता को अच्छी तरह याद किया गया। कोई कारण नहीं है कि अखबारों में इस मामले को आज याद नहीं किया जाए और सोशल मीडिया की चर्चा का हवाला न हो। देखिए आपके अखबार में कुछ है?

मैंने कल लिखा था कि इंडियन एक्सप्रेस में कोलकाता डेटलाइन से तीन एक्सक्लूसिव यानी बाईलाइन वाली खबरें थीं। आज जब स्थिति यह है कि डॉक्टर बात करने को तैयार नहीं हैं तो इंडियन एक्सप्रेस में इस संबंध में सिंगल कॉलम की एक बाईलाइन वाली खबर है। इसमें फोटो भी सिंगल कॉलम की है और खबर का शीर्षक है, “ममता अपील्स फॉर टॉक्स; कम टू एनआरएस, से एजीटेटिंग डॉक्टर्स”। इसे हिन्दी में लिखा जाए तो कुछ इस प्रकार होगा, ममता ने वार्ता की अपील की; आंदोलनकारी चिकित्सकों ने कहा एनआरएस (अस्पताल) आइए”। इसपर कोई एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड नहीं है और अखबार ने लिखा नहीं है पर इस शीर्षक से लग रहा है कि आंदोलनकारी चिकित्सकों ने कहा हो, अब तो आईएमए हमारे साथ है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें कुछ गलत नहीं है और यह निश्चित रूप से संपादकीय स्वतंत्रता और विवेक का मामला है। मैं सिर्फ इसके उपयोग को रेखांकित कर रहा हूं।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। शीर्षक है, ममता ने नीति बदली, ‘इच्छुक’ चिकित्सकों से काम शुरू करने के लिए कहा। चिकित्सकों ने वार्ता की पेशकश को नकार दिया। खबर का पहला वाक्य हिन्दी में कुछ इस प्रकार होता, सुरक्षा के वादे के साथ बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शनिवार को ‘इच्छुक’ जूनियर डॉरक्टर्स से काम शुरू करने के लिए कहा और अन्य से यह अपील की कि वे “मानवता” के लिए राज्य सचिवालय नबन्ना में वार्ता के लिए आएं। पर उन्होंने एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पीटल परिसर में जाने से मना कर दिया जो इस टकराव का केंद्र रहा है। हड़ताली जूनियर डॉक्टर उनसे यहां आने की मांग कर रहे हैं।

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर चार कॉलम में लीड है। शीर्षक हिन्दी में लिखा जाता तो कुछ इस तरह होता, ममता ने अपील की पर चिकित्सकों ने इसे धोखा / बहाना करार दिया। इसके साथ तीन कमरे मे एक और खबर है जिसका शीर्षक है, चिकित्सकों ने ‘बंद दरवाजे’में वार्ता को ठुकराया। कहने की जरूरत नहीं है कि हड़ताली चिकित्सकों ने सख्त रुख अपना रखा है और ज्यादातर शीर्षक से ऐसा ही लग रहा है। हिन्दुस्तान टाइम्स की इस मुख्य खबर का उपशीर्षक है, मुख्यमंत्री के रुख नरम करने पर प्रदर्शनकारियों ने कहा कि देशव्यापी आंदोलन, मुख्य मांगें अभी भी पूरी नहीं हुईं हैं।

अखबारों और खबरों के साथ खास बात यह भी है कि बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित मुजफ्फरपुर के एसकेएमसीएच अस्पताल में कथित चमकी बुखार से दो दिन में करीब 70 बच्चे मर चुके हैं। टीवी9भारतवर्ष के संपादक Ajit Anjum ने कल रात अस्पताल परिसर से अच्छी लाइव रिपोर्टिंग की। आईसीयू में डॉक्टर नहीं थे। सिस्टर गोल-मोल जवाब दे रही थी। उसे ड्यूटी पर तैनात डॉक्टर का नाम नहीं पता था और अस्पताल सुपरिंटेंडेट बगलें झांक रहे थे। संबंधित डॉक्टर को फोन करने के लिए कहने पर टालते रहे और सीधे डॉक्टर को फोन नहीं ही किया …। बताया गया कि मरीज की मौत हो जाती है तो सिस्टर डॉक्टर को बुला लाती है (कोई समस्या नहीं है)। अखबारों में इसकी खबर नहीं है। बंगाल में 70 मौतों की खबर भी अखबारों ने नहीं दी है पर वहां का मामला प्रमुखता पा रहा है। बिहार के अस्पताल की हालत खबरों में नहीं है। मुझे लगता है कि यह हालत बिहार के अच्छे और बेहतर सरकारी अस्पतालों में है। ज्यादातर अस्पतालों में इससे भी खराब हालत है।

दैनिक भास्कर में चिकित्सकों की हड़ताल की खबर पहले पन्ने पर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, “पश्चिम बंगाल, ममता ने मांगे मानी, केंद्र ने हड़ताल हिन्सा पर रिपोर्ट मांगी”। मुख्य शीर्षक है, “ममता बनर्जी ने बैठक के लिए बुलाया, डॉक्टर बोले डर का माहौल है, नहीं आएंगे”। भास्कर में पहले पन्ने पर मुजफ्फरपुर के अस्पताल की तो नहीं, बिहार में लू से एक दिन में 50 मौतों की खबर है। इनमें 30 मौतें औरंगाबाद में और 20 मौतें गया में हुई हैं। इसके मुताबिक, लू के शिकार 10 और लोगों की हालत गंभीर बनी हुई है। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार डॉक्टर की हड़ताल की खबर तो दे रहे हैं पर उनके काम करते हुए हो रही मौतों की खबर नहीं दे रहे हैं। मेरा देश बदल रहा है, नया भारत बन रहा है। भास्कर में ही एक और शीर्षक है, आईएमए अब भी सोमवार को हड़ताल पर अड़ा।

नवभारत टाइम्स में चिकित्सकों की हड़ताल की खबर लीड है। शीर्षक है, ममला उमड़ी पर डॉक्टर नरम नहीं। दिल्ली एनसीआर में मरीज रहे बेहाल। पर बिहार की खबर नहीं है। हिन्दुस्तान में भी यह खबर लीड है। फ्लैग शीर्षक है, आंदोलन खत्म करने की कोशिश बेनतीजा, सरकार चिकित्सकों में तकरार जारी। मुख्य शीर्षक है, “असर : डॉक्टरों की हड़ताल दिल्ली से बंगाल तक बेहाल।” यहां बिहार में लू से 24 घंटे में 27 मरे, खबर तो है पर मुजफ्फरपुर अस्पताल की खबर नहीं है। नवोदय टाइम्स में लीड है, हजारों मरीजों को नहीं मिला इलाज। इसके साथ एक अलग खबर है, देशव्यापी हड़ताल कल से। इसमें पहले पन्ने पर ना बिहार की लू की खबर है और ना यह बताया गया है कि बिहार में डॉक्टर की हड़ताल नहीं है फिर भी कोई 70 बच्चे अस्पताल में कथित चमकी बुखार से मर गए और कई लोग लू से मर गए।

अमर उजाला में लीड है, हड़ताल हिन्सा पर केंद्र ने तलब की रिपोर्ट। तीन कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, ममता सरकार से पूछा – हालात से निपटने के लिए क्या कदम उठाए, राजनीतिक मौतों पर भी जताई चिन्ता। इसके साथ दो कॉलम में एक और खबर है। इसका शीर्षक है दिल्ली में 30 हजार मरीजों को नहीं मिला इलाज, 500 ऑपरेशन टले। वैसे इसके साथ ही खबर है कि देर रात नरम पड़े डॉक्टर, वार्ता को तैयार। पर बिहार की दोनों ही खबरें – अस्पताल में चमकी बुखार से बच्चों की मौत और लू से कई लोग मरे पहले पन्ने पर नहीं हैं।

दैनिक जागरण में मुख्य खबर (लीड) का शीर्षक है, केंद्र ने ममता से मांगा हिंसा का हिसाब। उपशीर्षक है, सख्त रुख, जारी की एक और एडवाइजरी, हिंसा रोकने में विफल रहने का आरोप। इंट्रो है, 2016 के बाद राजनीतिक और चुनावी हिंसा पर जताई गंभीर चिंता। अखबार में इसके अलावा भी दो खबरों के शीर्षक हैं, बंगाल में हिंसा का दौर जारी, चार की हत्या। दूसरी खबर का शीर्षक है, ममता बोलीं, उप्र और गुजरात के लिए जारी करें एडवाइजरी। अखबार ने एक और खबर पहले पन्ने पर छापी हैं, ममता ने मानीं सारी शर्ते, पर हड़ताली डॉक्टर झुकने को तैयार नहीं। यही नहीं, जागरण ने बिहार की एक खबर, बिहार में लू लगने से 60 लोगों की मौत पहले पन्ने पर छापी है। लेकिन मुजफ्फरपुर में 70 बच्चों के मरने की खबर यहां भी नहीं है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट

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