पुण्य प्रसून बाजपेयी का सवाल- कोई भारतीय प्रधानमंत्री इससे पहले इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाया?

नजदीक होकर भी दूर क्यों रहा इजरायल… दो बरस पहले राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी इजरायल के एयरपोर्ट पर उतरे जरुर लेकिन पहले फिलीस्तीन गए फिर इजरायल दौरे पर गये। पिछले बरस जनवरी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज फिर पहले फिलिस्तीन गईं उसके बाद इजरायल गईं। लेकिन पीएम मोदी तो तीन दिन इजरायल में ही गुजारेंगे। तो क्या प्रधानमंत्री इजराइल को लेकर संबंधों की नयी इबारत लिखने जा रहे हैं और भारत के उस एतिहासिक रुख को हमेशा के लिए खत्म कर रहे हैं, जिसकी छांव में गांधी से लेकर नेहरु तक की सोच अलग रही। महात्मा गांधी ने 26 नवंबर 1938 को हरिजन पत्रिका में कई यहूदियों को अपना दोस्त बताते हुए लिखा, “यहूदियों के लिए धर्म के आधार पर अलग देश की मांग मुझे ज्यादा अपील नहीं करती। फिलीस्तीन अरबों का है, जिस तरह इंग्लैंड ब्रिटिश का और फ्रांस फ्रेंच लोगों का है और अरबों पर यहूदियों को थोपना गलत और अमानवीय है”।

इतना ही नहीं, 21 जुलाई 1946 को लिखे अपने एक और लेख में महात्मा गांधी ने लिखा, “दुनिया ने यहूदियों के साथ बहुत क्रूरता की है। अगर उनके साथ क्रूरता नहीं हुई होती तो उनके फिलिस्तीन जाने का सवाल ही नहीं उठता।” लेकिन महात्मा गांधी के विचार भारत की आजादी से पहले के थे। भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर 1947 के बाद संयुक्त राष्ट्र में इजराइल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी। उससे पहले भारत का समर्थन जुटाने के लिए इजराइल ने उस वक्त के सबसे बड़े यहूदी चेहरों में एक दुनिया के महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टाइन को मैदान में उतारा। आइंस्टाइन नेहरु के प्रशंसक और कुछ हद तक मित्र भी थे। नेहरु भी उनका बहुत सम्मान करते थे। 13 जून 1947 को अपने चार पेज के खत में आइंस्टान ने नेहरु को लिखा, “प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में हैं, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं। उन्हें न्याय और समानता चाहिए।”

इस खत में यहूदियों पर हुए अत्याचारों का विस्तार से जिक्र था। इसके अलावा कई तर्क थे कि क्यों यहूदियों के लिए अलग राष्ट्र चाहिए। नेहरु ने करीब एक महीने तक खत का जवाब नहीं दिया। फिर 11 जुलाई 1947 को जवाब देते हुए लिखा, “मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे यहूदियों के प्रति बहुत सहानूभूति है तो अरब लोगों के लिए भी है। मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और उन्होंने वहां के लोगों का जीवनस्तर सुधारने में बड़ा योगदान दिया है। लेकिन एक सवाल मुझे परेशान करता है। आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद वो अरब का दिल जीतने में क्यों कामयाब नहीं हुए। वो अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ क्यों अपनी मांगे मानने के लिए विवश करना चाहते हैं।”

दरअसल गांधी नेहरु की सोच 1992 तक जारी रही। लेकिन 1991 में यूएसएसआर का ढहना, खाडी युद्ध और भारत के आर्थिक सुधार ने अमेरिका के साथ संबंधों के दरवाजे खोले और उसमें इजरायल से करीबी अमेरिकी संबंधों तले जरुरत बनी। 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन राष्ट्रपति यासिर अराफात की सहमति के बाद भारत ने इजरायल के साथ डिप्लामेटिक संबंध को पूर्ण रुप से बहाल किया। लेकिन जिस दौर में इजरायल से संबंध नहीं भी थे तो उसका दूसरा चेहरा युद्ध के दौर में नजर आया। इतिहास के पन्ने बताते है कि 62, 71 और 99 के कारगिल युद्ध के वक्त इजरायल ने गुपचुप तरीके से भारत की मदद की थी और भारत ने बिना राजनयिक संबंधों के इजरायल से मदद मांगी भी थी।

1962 का युद्ध तो चीन का भारत की पीठ में छुरा भोंकने जैसा था। भारत युद्ध के मैदान में जा पहुंचा तब भारत की हालत ठीक नहीं थी। जिस नेहरु की अगुवाई में इजराइल गठन के विरोध में भारत ने 1950 में संयुक्त राष्ट्र में वोटिंग की थी, उन्हीं नेहरु ने 1962 युद्ध के वक्त इजराइल से मदद मांगी। इजराइल फौरन तैयार हो गया। लेकिन नेहरु ने इजराइल के सामने एक शर्त रख दी। शर्त यह कि जिस शिप से हथियार भेजे जाएं, उस पर इजराइल का झंडा न हो और हथियारों पर इजराइल की मार्किंग न हो”। इजराइल के पीएम को बगैर झंडे वाली बात हजम नहीं हुई। उन्होंने हथियार देने से मना कर दिया। बाद में इजराइल के झंडे लगे जहाज को भारत ने मंजूर कर लिया तो इजराइली मदद भारत पहुंची। फिर 1971 के युद्ध में तो अमेरिका ने भारत के खिलाफ ही अपने सातवें बेड़े को भेज दिया लेकिन तब भी इजराइल ने भारत को गुपचुप तरीके से हथियार भेजे और उन्हें चलाने वाले लोग भी।

अमेरिकी पत्रकार गैरी बैस की किताब ‘द ब्लड टेलीग्राम’ में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रधान सचिव पी एन हक्सर के दस्तावेजों के हवाले से कहा गया है कि “जुलाई 1971 में इस्राइली प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने गुप्त तरीके से एक इस्राइली हथियार निर्माता से कहा कि वह भारत को कुछ मोर्टार और हथियार मुहैया कराए और साथ ही उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने वाले कुछ लोग भी दे। जब हक्सर ने समर्थन के लिए इस्राइल पर जोर डाला तो गोल्डा मायर ने मदद जारी रखने का वादा किया।” जाहिर है इजराइल ने भारत से दोस्ती निभायी। 1999 में कारगिल युद्ध तो नयी पीढ़ी के जेहन में भी ताजा है। इस युद्ध से महज सात साल पहले ही भारत ने इजराइल के साथ पूर्ण रुप से राजनयिक रिश्ते के तार जोडे थे। लेकिन महज सात साल की औपचारिक दोस्ती को इजराइल ने युद्ध में ऐसे निभाया कि हेरॉन और सर्चर यूएवी दिए। जिनकी मदद से कारगिल की तस्वीरें ली गईं थीं वह इजरायल से आई। इजरायल ने भारत को मानवरहित विमान उपलब्‍ध कराए। सैटेलाइट से ली गई उन तस्वीरों को भी भारत से साझा किया, जिसमें दुश्मन के सैन्य ठिकाने दिख रहे थे। इतना ही नहीं, इजरायल ने बोफोर्स तोप के लिए गोला बारुद मुहैया कराया। भारतीय वायु सेना को मिराज 2000 एच युद्धक विमानों के लिए लेजर गाइडेड मिसाइल भी उपलब्‍ध कराए। यानी जिस दौर में इजरायल से कोई रक्षा समझौता भारत ने किया ही नहीं, उस दौर में इजरायल ने भारत को हथियार दिये।

अब इजरायल के साथ खुले तौर पर रक्षा संबंधों का दायरा इतना बडा हो चला है कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले ही रक्षा क्षेत्र में एकमुश्त कई बड़े डील की तैयारी हो चुकी है और 17 हजार करोड़ की मिसाइल डील को भारत मंजूरी भी दे चुका है। तो आखिरी सवाल, इन सबके बावजूद इससे पहले कोई प्रधानमंत्री इजराइल जाने की हिम्मत क्यों नहीं दिखा पाए। सच यही है कि एक तरफ देश में वोट बैंक की राजनीति है जो मानती है कि मुस्लिमों के मन में इजरायल को लेकर कड़वाहट है तो इजरायल के साथ खडे कैसे हुआ जाये। दूसरी तरफ 80 लाख भारतीय श्रमिक अरब देशो में काम कर रहे हैं। कही 70 के दशक की तर्ज पर इजरायल का साथ देने वालों के खिलाफ अरब वर्ल्ड ना खड़ा हो जाये। ये जहन में रहता जरुर है। वजह भी यही रही कि कांग्रेस को हमेशा लगा कि इजरायल से संबंध बढ़ाने का मतलब अरब देशों को खफा करना होगा, और इजरायल से संबंध भारत में रह रहे मुसलमानों को भी पार्टी से दूर करेगा। यानी राजनयिक संबंधों की डोर का एक सिरा भी घरेलू राजनीति के वोट बैंक से जुड़ गया। तो दूसरी तरफ बीजेपी के लिये मुस्लिम वोट बैक कोई मायने नही रखता है ये भी दूसरा सच है । क्योकि 2014 के चुनाव में कांग्रेस को महज 44 लोकसभा सीट मिली तब भी पार्टी को 37.60 मुस्लिम वोट मिला। वहीं बीजेपी को 282 सीटों पर जीत मिली लेकिन बीजेपी को 8.4 फीसदी मुस्लिम वोट मिला। तो सवाल कई है। लेकिन संबंधों की नई लकीर अगर पुरानी लकीर को मिटा रही है तो इंतजार करना होगा। रास्ता आगे का ही निकलना चाहिये।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी आजतक न्यूज के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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