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लदाख के युवा सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल का संसद में दिया भाषण न सुना तो क्या सुना! देखें वीडियो

Sushobhit : कल पूरा दिन लदाख के युवा सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल की चर्चा रही। उन्होंने धारा 370 पर बहस के दौरान लोकसभा में ऊर्जस्वित भाषण दिया। प्रधानमंत्री ने भी उनके भाषण को सुनने का आग्रह देशवासियों से किया।

उन्हें सुनते समय मैंने एक चीज़ पर ग़ौर किया। मैंने पाया कि जामयांग जो बोल रहे हैं, वह तो वास्तव में एक सबाल्टर्न-कैटेगरी (वंचित-वर्ग) के दु:खों का खरा वृत्तांत है! वे बता रहे थे कि कैसे मेनलैंड कश्मीर (जी हां, कश्मीर भी मेनलैंड है और जम्मू-कश्मीर मामलों में श्रीनगर की तूती बोलती है, यह भी एक परिप्रेक्ष्य है) केंद्र द्वारा जारी की गई सहायता राशि को हज़्म कर लेता है और उसके लाभ लदाख तक नहीं पहुंच पाते (बक़ौल दुष्यंत, “यहां तक आते-आते सूख जाती हैं सभी नदियां”)। कि कैसे लदाख को प्रशासनिक अधिकार नहीं दिए जाते, उच्चशिक्षा के संस्थान नहीं दिए जाते, कैसे लदाख की भाषा को मान्यता नहीं दी जाती, राज्य के सचिवालयों में लदाखी लोगों का प्रतिनिधित्व नगण्य है, फिर निर्वाचित सरकार में उनके नुमाइंदों की तो बात ही रहने दें।

जामयांग का भाषण सुनते समय मैंने सोचा- ये तो क्लासिकल सबाल्टर्न कैटेगरी है! एक वंचित-तबक़े के जितने भी संताप होते हैं, उन सभी का वर्णन वे कर रहे हैं। फिर उदारवादी बौद्धिकता ने इसका संज्ञान क्यों नहीं लिया? पहले भी नहीं लिया और कल जामयांग के भाषण के बाद भी उसे हाथोंहाथ लेने वालों में वे ही लोग थे, जो नेशनलिस्ट नैरेटिव को आगे बढ़ाते हैं। लेफ़्ट-लिबरल्स ने किंचित सतर्क और सशंकित हिक़ारत के साथ उससे दूरी बनाए रखी। किन अर्थों में लदाख उनकी सहानुभूति का पात्र बनने के मानदंडों पर खरा नहीं था, यह जिज्ञासा मेरे मन में उग आई।

ऐसा लगा, जैसे कल तक किसी को मालूम ही नहीं था कि जम्मू-कश्मीर में लदाख नाम की भी कोई जगह है, वहां भी मनुष्य रहते हैं, उनके भी कुछ अधिकार और स्वप्न और आकांक्षाएं हैं, और अगर वे धारा 370 के उन्मूलन का स्वागत करते हैं तो उनकी आवाज़ भी सुने जाने योग्य है। उदारवादी बौद्धिक अपनी नीयत में कितने कलुषित हैं, इसकी बानगी आंखों के आगे तैर गई। वंचितों में भी सभी उनकी संवेदना के पात्र नहीं हैं, वे उसके लिए ही रुदन करेंगे, जिसे वे वंचित के रूप में मान्यता देते हैं। तब व्यापक मनुष्यता के हितों, विवशताओं, दु:स्वप्नों की वे कैसे बात करेंगे, जब सबाल्टर्न के भीतर भी उन्होंने दोहरे मानदंड बना रखे हैं?

बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के द्वैत में बहुसंख्यक त्याज्य है, यह एक सुपरिचित उदारवादी पूर्वग्रह है। किंतु अगर किसी दूसरे परिप्रेक्ष्य में अल्पसंख्यक ही वर्चस्वशाली वर्ग बन जाए तो? जैसे कि जम्मू-कश्मीर में कश्मीर घाटी का वर्चस्व है। कैटेगरी के भीतर भी सबकैटेगरीज़ होती हैं। अल्पसंख्यकों के बीच भी तो कुछ वर्ग अधिक अल्पसंख्यक होंगे कुछ कम। तब क्या उदारवादी बौद्धिकता अपनी संवेदना की री-पोज़िशनिंग नहीं करेगी? या वह कहेगी कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में जो वंचित है, एक प्रांत-विशेष के परिप्रेक्ष्य में उसके वर्चस्वशाली हो जाने के बावजूद हम उसी के हितों का संरक्षण करेंगे? मैं इस पर निवेदन करूं कि अगर यह बौद्धिक धूर्तता नहीं है (जो कि वह निश्चित ही है) तो यह बौद्धिक क़ाहिली ज़रूर है।

जो वर्गचेतना उदारवाद के मूल में है, उसका उद्‌गम शास्त्रीय मार्क्सवाद के द्वंद्वात्मक दर्शन में है। जब मार्क्स और एंगेल्स लिख रहे थे, उस समय तक राष्ट्र-राज्य जैसी कोई राजनीतिक इकाई नहीं थी। राष्ट्र-राज्य बीसवीं सदी के मध्य में अस्तित्व में आई परिघटना है। उस समय होती तो मार्क्स निश्चित ही उसका भी प्रतिकार करते। उनके काल में साम्राज्य थे, और सामंत (फ़्यूडल लॉर्ड्स) थे, जिनका घनघोर विरोध मार्क्स ने किया है। औद्योगिक क्रांति हो चुकी थी और मैनचेस्टर की मिलें धुंआ उगलने लगी थीं तो पूंजीपति और उद्योगपति (शोषक) उनके प्रमुख निशाने पर थे। किंतु मार्क्स ने सम्प्रदायों को भी बख़्शा नहीं था। वे धर्मों को भी मनुष्य का दमन करने वाली एक सत्ता मानते थे और उनका प्रतिकार करना एक रैशनल माइंड का दायित्व समझते थे। तब आप कह सकते हैं कि मार्क्स की वर्गचेतना भले ही स्थूल और बायनरीज़ में सोचने वाली हो, किंतु कम से कम वे अपने पूर्वग्रह में कंसिस्टेंट तो थे, और मनुष्य को छलने वाली हर सत्ता का विरोध करते थे।

कल भी इस पर संकेत किया था, आज फिर कहूं। बौद्धिक उदारवादियों द्वारा जो चित्र देश को दिखाया जा रहा है, वो यह है कि भारतीय-राज्य क्रूर और आक्रामक और सर्वसत्तावादी है, (वह वैसा है या नहीं है, यह भिन्न विमर्श है), और उसके उलट कश्मीरियों के मानवाधिकार और नागरिक-अधिकार हैं, जिनका हनन किया जा रहा है। यह स्थापना अर्धसत्य का जंजाल है। क्योंकि कश्मीर-समस्या की मूल प्रिमाइस यह नहीं है कि एक राज्य के लोग अपने नागरिक-अधिकारों और मानवीय-अधिकारों की प्रैक्टिस करना चाहते हैं और राज्यसत्ता अपने बूटों के तले उसे कुचल रही है, जैसा कि बौद्धिक उदारवादी बतलाते हैं। कश्मीर-समस्या की मूल प्रिमाइस यह है कि सामुदायिक-जड़ता मिली-जुली संस्कृति की भावना से संचालित एक राष्ट्र की मुख्यधारा का अंग बनने से इनकार कर रही है और स्वयं के लिए एक पृथक विधान चाहती है। इसके मूल में मानवाधिकार नहीं, साम्प्रदायिकता है। पाकिस्तान के निर्माण के मूल में भी यही था, धार्मिक क़ानूनों के प्रति आग्रह के मूल में भी यही।

तिस पर मैं यह निवेदन करूं कि जब कार्ल मार्क्स मनुष्यता का हनन करने वाली समस्त सत्ताओं का प्रतिकार कर सकता था तो भारतीय बौद्धिक उदारवाद केवल राष्ट्र का प्रतिकार क्यों करता है, सम्प्रदाय का प्रतिकार क्यों नहीं करता? करता भी है तो सभी का समान रूप से प्रतिकार क्यों नहीं करता? मैं यह नहीं कह रहा कि राष्ट्र की सम्प्रभुता के समक्ष मनुष्य को अपनी अस्मिता का बलिदान कर देना चाहिए। मैं कह रहा हूं कि अगर आप स्वयं पर ऊपर से थोपे गए आग्रहों के साथ सहज नहीं हैं, तो वैसा कैसे सम्भव हैं कि आप राष्ट्र को शत्रु मानते हैं किंतु धर्म को नहीं? रिलीजियस प्रैक्टिस का अधिकार फिर कैसे वैध है, अगर नेशनल सोव्रेनिटी की आज़माइश को आप होमोजेनाइज़ेशन मान रहे हैं? क्योंकि रिलीजियस प्रैक्टिस भी तो एक डॉग्मैटिक कोड-ऑफ़-कंडक्ट का अनुपालन करना है। एकरूपता तो उससे भी आती है और बहुलता का विनाश होता है। जैसा कि कल एक रामोन मैग्सेसे पुरस्कृत किंतु अल्पशिक्षित पत्रकार ने कहा कि राज्यसत्ता सभी नागरिकों के लिए एक नाप का स्वेटर बुनना चाहती है। तिस पर यह भी पूछें कि वैसा एक नाप का स्वेटर क्या रिलीजियस आइडेंटिटी नहीं बुनती, क्या वह मोनोलिथिक नहीं है? और अगर कश्मीर समस्या के मूल में धर्म है, तो आप इस पर बात करते समय राष्ट्र पर क्यों रुक जाते हैं, धर्म पर क्यों नहीं जाते? जबकि राष्ट्र तो फिर भी डेमोक्रेटिक फ्रेमवर्क में काम करता है, सम्प्रदाय तो हम पर जन्म से ही ईश्वरों और अवतारों और धार्मिक नियमों को थोप देता है। तो दोनों में से ज़्यादा बुरा क्या है?

धारा 370 पर हुआ निर्णय बौद्धिक उदारवाद की कड़ी परीक्षा है। अभी तक जो दृश्य देखा गया है, उसके आधार पर आप कह सकते हैं कि इस बौद्धिक वर्ग से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। इसके पास परिप्रेक्ष्य ही नहीं बचे हैं, श्रेणियों का विवेक ही इसका नि:शेष हो गया है, यहां तक कि तार्किक सुसंगति भी इनसे विरत हो चुकी है, भाषा की शुचिता इनसे रूठ गई। ये अर्धसत्यों के उपासक और प्रस्तोता हैं और इनका लक्ष्य केवल अपने पूर्वनियत पूर्वग्रह को आप पर थोपना है, मनुष्यता के हित में खुला संवाद करके व्यापक निष्कर्षों पर पहुंचना नहीं है। और मैं आपसे कहूं कि पूर्वग्रह के साथ कहा गया सत्य भी मलिन होता है, दुर्भावना के साथ किया गया न्याय भी अतिचार होता है और दोहरे मानदंड वाली करुणा भी हिंसा होती है। इस निकष पर बौद्धिक उदारवाद का सतर्क मूल्यांकन करें तो सर्वजन के लिए वही शुभ होगा। इति।

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1 Comment

1 Comment

  1. मनीष दुबे

    August 7, 2019 at 9:23 pm

    सच मे इस युवा सांसद का पूरा वीडियो देखा था कल. वीडियो शेयर भी किया मैंने. शेयर इसलिए किया था कि वाकई सुनकर मजा आ गया था. कोई भी देशभक्त होगा अपने देश की देशभक्ति करने वाले पर इतरायेगा ही. बहुत खूब जामयांग सेरिंग नामग्याल हमे आप पर गर्व है.

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