बेहद गरीबों के लिए ‘न्याय’ योजना का समर्थन और विरोध

देश के सर्वाधिक गरीबों की आय 12,000 रुपए प्रतिमाह करने और जिनकी आय इतनी नहीं है उन्हें हर साल अधिकतम 72,000 रुपए देने की राहुल गांधी की ‘न्याय’ योजना के बारे में कल (शनिवार, 30 मार्च 2019) को दैनिक भास्कर में इलेक्शन एनालिसिस के तहत सुधीर चौधरी की टिप्पणी छपी है – “न्याय योजना : कांग्रेस अध्यक्ष के स्वाभिमान की एंड ऑफ सीजन सेल”। इसी विषय पर आज पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने अपने साप्ताहिक कॉलम ‘अक्रॉस दि आइल’ में लिखा है जो मूल रूप से इंडियन एक्सप्रेस में है। इसका अनुवाद जनसत्ता में छपता है और आज ‘अमर उजाला’ में भी है।

मेरा मानना है कि यह योजना भले ही महंगी हो, पर जरूरी है। सरकार (चाहे जिसकी हो) के पास इसे लागू करने की इच्छाशक्ति होनी चाहिए। अगर इच्छाशक्ति हो तो कोई काम मुश्किल नहीं है। जब सरकार को जरूरत लगी तो 2000 रुपए महीने में किसानों का ‘सम्मान’ करने की योजना आई ही और लागू भी हो गई। अगर सरकार जरूरत समझे तो 6000 रुपए महीने में ‘न्याय’ भी कर सकती है और योजना को मैंने जितना समझा है उससे लगता है इस छह हजार में 2000 रुपए कट जाएंगे यानी न्याय योजना में प्रति परिवार (सिर्फ किसानों के मामले में क्योंकि यह सिर्फ किसानों के लिए है) कुल 4000 रुपए महीने ही खर्च होने हैं बाकी के 2000 तो उन्हें मिल ही रहे हैं।

अगर किसानों को मुफ्त में बिना काम के ये 2000 रुपए महीने दिए जा सकते हैं तो 6000 रुपए महीने कैसे गलत हो सकता है। कम ज्यादा तय करना भी आसान नहीं है। मुझे तो 6000 भी कम लगता है और असल में राशि 12,000 रुपए महीने ही होनी चाहिए। हालांकि वह अलग विषय है। जहां तक बिना काम पैसे देने का मामला है, मनरेगा योजना इसीलिए है। पर उससे बात बनी नहीं और उसकी सफलता के बाद ही इस योजना की जरूरत समझी गई है। अगर इस घोषणा को राजनीतिक चाल के रूप में देखें तो इसकी कामयाबी इसके विरोध से ही स्पष्ट है।

खास बात यह भी है कि इस योजना का विरोध करने वाले ना नए बनने वाले जियो विश्वविद्यालय को 1000 करोड़ मुफ्त में दिए जाने का विरोध कर रहे हैं ना काला धन वापस आने पर गरीबों को 15 लाख रुपए दिए जाने की संभावना पर उंगली उठाई थी। पी चिदंबरम ने लिखा है, यूनिवर्सल बेसिक इनकम (यूबीआई) पर कई साल से बहस चल रही है। लोगों के लक्षित समूह तक सीधा नगदी हस्तांतरण यूबीआई का एक परिवर्तित रूप है। लक्षित समूहों को नगदी हस्तांतरण की प्रायोगिक योजनाएं कई देशों ने चला कर देखने की कोशिश की है। इस विषय पर काफी सामग्री है। सीधे नगदी हस्तांतरण के बारे में जो संदेह हैं उनका स्पष्ट जवाब मिल चुका है। वैसे भी गंरीबों की स्थिति सुधारऩे के लिए अनंत काल तक इंतजार नहीं किया जा सकता है और पहले की कोशिशों को आगे बढ़ाते हुए ही राहुल गांधी ने इसे गरीबी पर अंतिम हमला कहा था।

न्याय योजना के बारे में आज पी चिदंबरम ने अच्छा लिखा है। इस कॉलम के बारे में मैंने पिछले हफ्ते लिखा था, “कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री हर हफ्ते एक लोकप्रिय कॉलम लिखकर मौजूदा सरकार की बखिया उधेड़ते हैं और सरकार ना तो उनका जवाब देती है और ना भाजपा के पास ऐसा बौद्धिक काम कर सकने वाला कोई नेता है। चैनल शुरू कर सकने वाले धनपशु से लेकर पेशेवर, वेतन पा रहे पत्रकार होंगे पत्रकारिता के शिक्षक होंगे पर सरकार की तारीफ करने या विपक्ष की बखिया उधेड़ने का कोई काम शालीन ढंग से होता तो नहीं दिखता है। अखबारों के जरिए जो फूहड़ पक्ष प्रचार हो रहा है वह भी इस तरह के काम का मुकाबला नहीं कर सकता है।”

न्याय योजना पर आज तवलीन सिंह का लिखा भी छपा है। जनसत्ता में यह पी चिदंबरम के कॉलम के साथ ही है। “गरीबी का मकड़जाल” शीर्षक इस लेख की शुरुआत होती है, “खास शाही अंदाज में राहुल गांधी ने पिछले हफ्ते ‘न्याय’ देने का एलान किया, एक आमसभा को संबोधित करते हुए। जैसे देश के प्रधानमंत्री अभी से बन गए हों और जनता पर खास मेहरबान होने का जी चाह रहा हो। न्यूनतम आय योजना की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि मोदी के अन्याय के बदलने में वे न्याय देंगे।” यह टिप्पणी योजना के बारे में कम, राहुल गांधी के बारे में ज्यादा है। इसमें एक जगह कहा गया है, “… ऐसी योजनाएं अक्सर नाकाम रही हैं और नाकाम रहेंगी क्योंकि अपने देश में गरीबी ऐसा मर्ज है जिसके लिए एक योजना से दवा या हल ढूंढ़ना बेवकूफी है।” इससे तो यही लगता है कि गरीबी दूर करने की कोशिशों पर बात करना भी बेवकूफी है। फिर भी।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट।



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