रिचर्ड एटेनबरो का सपना थी ‘गांधी’

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अचानक ब्रिटिश अभिनेता, निर्माता, निर्देशक सर रिचर्ड एटेनबरो के निधन का समाचार सुना तो बहुत ही दुख हुआ। उनका रविवार 24 अगस्त 2014 को 90 वर्ष की अवस्था में लंदन में निधन हो गया। वे लंबे अरसे से बीमार थे और नर्सों की देखरेख में जिंदगी के बाकी पल बिता रहे थे। वे अपनी पत्नी शेला सिम के साथ रहते थे। जो 92 साल की हैं। शेला से उनकी शादी 1945 में हुई थी। 1943 से लेकर 2007 तक वह फिल्मों में किसी न किसी रूप में सक्रिय रहे, चाहे अभिनय हो या फिल्म निर्माण और निर्देशन। उन्हें ब्रिटिश एकाडेमी आफ फिल्म एंड टेलिविजन आर्ट्स समेत कई सम्मान मिले जिनमें आस्कर भी शामिल है। 1983 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया। 1982 में उन्हें फिल्म ‘गांधी’ के लिए 8 आस्कर एवार्ड मिले जिनमें सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का भी एवार्ड शामिल था।

यह फिल्म उनका वह सपना थी जिसके लिए उन्होंने गांधी के जीवन पर 20 साल तक अध्ययन किया फिर उस महान फिल्म की शुरुआत की। हालांकि उन्होंने कई फिल्मों का निर्देशन किया लेकिन गांधी को वह अपने जीवन की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण कृति मानते हैं। गांधी पर फिल्म बनाने के उनके सपने को पूरा होने में इसलिए भी लंबा अरसा लगा कि उनको इसके लिए सरकारी अनुमति देर से मिली। अनुमति मिलने के बाद भी उनको तरह-तरह की दिक्कतों से दो-चार होना पड़ा। उस समय कई नामचीन भारतीय फिल्मकारों ने नाक-भौं सिकोड़ा था कि गांधी के जीवन पर कोई अंग्रेज किस तरह से अच्छी फिल्म बना पायेगा। क्या वह बापू के चरित्र से न्याय कर पायेगा जिनकी आजादी की लड़ाई ही अंग्रेजों के खिलाफ थी।

इसकी भनक एटेनबरो को भी मिली और उन्होंने इसको चैलेंज के तौर पर लिया। उन्होंने न सिर्फ गांधी के चरित्र, फिल्म के कथानक और अन्य पक्षों पर बखूबी ध्यान दिया अपितु इस फिल्म को बड़े पैमाने पर विश्व स्तरीय फिल्म बना दिया। पूरी दुनिया में धूम मच गयी। लगा जैसे उन्होंने इस फिल्म के माध्यम से राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को फिर जिंदा कर दिया हो। ब्रिटिश नाटकों और अंग्रेजी फिल्मों में काम करने वाले बेन किंग्सले इस पारखी फिल्मकार का संग और फिल्म में प्रमुख गांधी की भूमिका पाकर अमर हो गये। उन्होंने गांधी के चरित्र को इस खूबी से जिया जैसे उन्होंने उस व्यक्तित्व को पूरी तरह से आत्मसात कर लिया हो। इस फिल्म के लिए एटेनबरो की सारी दुनिया में तारीफ हुई और उनके आलोचक भारतीय फिल्मकारों की भी बोलती बंद हो गयी। ‘गांधी’ को उन्होंने जिस बड़े पैमाने पर बना दिया, शायद ही भविष्य में किसी का साहस ऐसा करने को हो सके।

1977 में वे महान भारतीय फिल्मकार सत्यजित राय की फिल्म ’शतरंज के खिलाड़ी’ में काम करने आये थे। महान कथाशिल्पी मुंशी प्रेमचंद की इसी नाम की कहानी पर आधारित इस फिल्म में उन्होंने लेफ्टीनेंट जनरल आउट्राम की भूमिका निभायी थी। फिल्म की शूटिंग पूरी होने के बाद फिल्म के निर्माता सुरेश जिंदल ने कोलकाता के ग्रांड होटल में फिल्म के बारे में जानकारी देने के लिए संवाददाता सम्मेलन बुलाया था। इस सम्मेलन में जाने का मुझे भी मौका मिला। वहीं रिचर्ड एटेनबरो से मुलाकात हुई। यह गरमी की उमस भरी दोपहर थी। एटेनबरो सफेद मलमल के सफेद कुरते और पाजामे में थे। सुर्ख रंगत वाला गोरा-चिट्टा चेहरा और उस पर छोटी सी मुसकराती आंखें, चेहरे पर हलकी दाढ़ी कुल मिला कर उनका व्यक्तित्व भीड़ में उन्हें अलग करता था। वैसे भी भारतीयों की भीड़ में एक ब्रिटिश अभिनेता को पहचान पाना आसान था।

वे सबसे बातें कर रहे थे और फिल्म में अभिनय के बारे में, पहली बार भारतीय फिल्म में काम करने के बारे में अपने अनुभव साझा कर रहे थे। मैंने उनसे पूछा कि सत्यजित राय से अपनी पहली मुलाकात और इस फिल्म में भूमिका मिलने के बारे में बताइए। उन्होंने कहा कि सत्यजित राय उनको आउट्राम की भूमिका के लिए सेलेक्ट करने के लिए लंदन गये थे। वहां रहते वक्त उन्होंने एटेनबरो से फोन पर बात की और बातचीत के दौरान यह साफ कर दिया कि सत्यजित राय की फिल्म में काम करना है तो पूरी स्क्रिप्ट पढ़ कर अपने चरित्र और कहानी की आत्मा के बारे में जानना जरूरी है। ऐसा उन्हें (एटनेबरो) भी करना होगा। इस पर एटेनबरो का जवाब था कि सत्यजित राय जैसे महान निर्देशक के साथ काम करने का मौका मिले तो वे पूरी टेलीफोन डाइरेक्टरी तक पढ़ने को तैयार हैं। यहां यह बताते चलें कि उस वक्त तक सत्यजित राय पूरी दुनिया में एक सशक्त और सफल फिल्म निर्देशक के रूप मे प्रतिष्ठित हो चुके थे।

जब एटेनबरो सत्यजित राय की फिल्म में काम करने आये थे तब तक वह भी अभिनेता के रूप में अपार ख्याति पा चुके थे। लेकिन उनसे मिल कर, उनके व्यवहार से कभी नहीं लगा कि हम इतने बड़े कलाकार से मिल रहे हैं। अपने यहां तो किसी कलाकार की एक फिल्म भी हिट हो गयी तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर होता है, वह सामान्य आदमी को कुछ नहीं मानता और ना ही उससे सामान्य ढंग से मिलने-जुलने में विश्वास रखता है। अगर ऐसे कलाकार की फिल्म 100 करोड़ के क्लब में पहुंच जाये तो फिर पूछना ही क्या। वैसे भी ये कलाकार खुद को भगवान जैसा मानते हैं। एटेनबरो में ऐसा कुछ भी नहीं था। जब तक वे हमसे मिले, सहजता से बात की, हमेशा चेहरे पर स्मित हास्य तैरता रहा, न कोई तनाव ना ही माथे पर कोई शिकन।

वह मुलाकात बहुत याद आती है क्योंकि ऐसे व्यक्तित्व धरती पर बार-बार नही आते। एटेनबरो महान अभिनेता पर बहुत ही सरल, हंसमुख और लाजवाब इनसान थे। किसी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसका स्वभाव एक बार की मुलाकात में भी परखा जा सकता है अगर वह व्यक्ति एटेनबरो जैसा निश्छल, निर्मल और निराला हो। यह बात उन पर कतई लागू नहीं होती जो होते कुछ और हैं और कोशिश कुछ और दिखाने की करते हैं। ग्रांड कोलकाता की वह दोपहर हर उस व्यक्ति के लिए यादगार बन गयी जो उनसे मिल या उन्हें सुन सका। उनकी महानता, सरलता के किस्से उन लोगों ने भी बखान किये जिन्होंने ’शतरंज के खिलाड़ी’ में उनके साथ काम किया।

कोलकाता के इंद्रपुरी स्टूडियो व शहर के अन्य स्थानों पर इसकी शूटिंग हुई थी। स्टूडियो के सभी कर्मचारी ’साहेब’ के साथ काम करने को लेकर आशंकित थे। एक तो साहब उस पर भाषा का व्यवधान और उस पर इतने बड़े कलाकार, पता नहीं कौन-सी बात उन्हें बुरी लग जाये। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। गरमी के उन दिनों में हालांकि उनको एयरकंडीशंड मेकअप रूम दिया गया था पर वे सेट पर घंटों सेट के सज जाने या लाइटमैन के लाइट्स और कैमरामैन के कैमरा एंगल वगैरह सहेज, सजा लेने तक धैर्य से प्रतीक्षा करते रहते। ना उस गरमी की परेशानी से शिकायत और ना ही माथे पर कोई शिकन। यहां अपने यहां के कलाकारों की स्थिति बयान करते चलते हैं।

इसे विषयांतर ना समझें इस घटना से आपको यह पता चल जायेगा कि कलाकार-कलाकार में फर्क क्या होता है। कहानी यों है- दक्षिण के एक फिल्म निर्माता ने फिल्म निर्माता ने हिंदी में फिल्म बनानी चाही। उन्होंने उसमें उस वक्त के हिंदी के बहुत बड़े कलाकार को लेना चाहा। कलाकार ने काम करने की शर्तें रख दीं, मसलन स्टूडियो एयरकंडीशंड होना चाहिए, गाड़ी एयरकंडीशंड होनी चाहिए और ना जाने क्या-क्या। निर्माता इस पर भी राजी हो गये। उस अभिनेता के आश्चर्य का ठिकाना ना रहा जब वह मद्रास एयरपोर्ट पर उतरा तो एक नहीं कई इम्पाला एयरकंडीशंड गाड़ियां उसके स्वागत के लिए खड़ी थीं। वह स्टूडियो पहुंचा तो वह भी एयरकंडीशंड मिला।

खैर काम शुरू हुआ। वह अभिनेता अपनी आदत के मुताबिक मद्रास में भी स्टूडियो में देर से आने लगा। स्टूडियो के दरबान ने दो-चार दिन इस बात पर ध्यान नहीं दिया, सोचा साहब नये-नये हैं शायद दो-एक दिन में अपनी आदत सुधार लेंगे, समय से आने लगेंगे लेकिन वैसा नहीं हुआ। इस पर दरबान ने निर्माता से उन साहबान की लेटलतीफी की शिकायत कर दी। निर्माता ने दरबान को ताकीद कर दी कि अगर अब वे लेट आते हैं तो उनसे कहना वहीं से सीधे एयरपोर्ट जायें और मुंबई लौट जायें। मुझे ऐसे अभिनेता के साथ काम नहीं करना। दरबान ने अगले दिन अभिनेता से वैसा ही कह दिया। इस पर अभिनेता झेंप गये, उन्हें लगा कि यह मुंबई नहीं मद्रास है और उनका पाला किसी कड़े और वक्त के पाबंद निर्माता से पड़ा है। उस अभिनेता की आदत सुधर गयी, स्टूडियो वे समय से आने लगे, फिल्म बनी और जबरदस्त हिट हुई।

माना कि विषयांतर हुआ लेकिन यह कहानी इंसान-इंसान के व्यवहार और प्रकृति में अंतर बताने के लिए जरूरी थी।

वापस एटेनबरो के प्रसंग पर लौटते हैं। वे स्टूडियो में बड़े धैर्य से शूटिंग शुरू होने की प्रतीक्षा करते। कैमरामैन से पूछते कि क्या वे शॉट लेने के तैयार हैं। बंगला फिल्मों से थोड़ा-सा भी संबंध रखने वाले लोग जानते हैं कि लोग यहां पर सत्यजित राय को प्यार से ’मानिक दा’ कह कर बुलाते थे। स्टूडियो में लोगों से उनके लिए यह संबोधन सुन कर एटेनबरो भी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे थे। कहते हैं जब फिल्म की शूटिंग खत्म हुई और वे लंदन वापस जाने लगे तो उन्होंने उन तकनीशियनों को उपहार तक दिये जो ’शतरंज के खिलाड़ी’ से किसी भी तरह से जुडे थे।

अपने तकरीबन छह दशक लंबे फिल्मी जीवन में उन्होंने 70 से अधिक  फिल्मों में अभिनय किया और कई फिल्मों का निर्माण और निर्देशन किया। इन सभी में वे अपनी फिल्म ’गांधी’ को ही अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ कृति मानते थे। अभिनेता के रूप में उनकी कुछ प्रसिद्ध फिल्में हैं-ब्रिटन रॉक, द ग्रेट स्केप, जुरासिक पार्क, 10 रिलिंग्टन प्लेस, जोसेफ एंड द एमेजिंग टेकनिकलर ड्रीम कोट व अन्य।

29 अगस्त, 1923 को कैंब्रिज में जन्मे एटेनबरो ने अभिनय की शुरुआत नाटकों से की। एक नाटक ‘द माउसट्रेप’ में तो उनके साथ उनकी पत्नी शेला सिम ने भी अभिनय किया था। उन्होंने वीवर फिल्म्स नामक अपनी एक प्रोडक्शन कंपनी भी बनायी थी जिसके बैनर तले उन्होंने ‘द लीग जेंटलमैन’ (1959), ‘द एंग्री साइलेंस’ (1960) ‘द ह्विसिल डाउन द विंड्स’ (1961)। उन्होने फिल्मों का निर्देशन भी किया। उनके निर्देशन में बनने वाली फिल्मे हैं-‘ओ ह्वाट ए लवली वार’, ‘यंग विन्सटन’ ‘ए ब्रिज टू फार’व अन्य। लेकिन सबसे ज्यादा संतुष्टि (ख्याति भी) उन्हें ‘गांधी’ बना कर मिली।

अभिनय के साथ-साथ वे अन्य क्षेत्रों में भी रुचि रखते थे। उनकी खेल में भी रुचि थी और वे लंदन के चेलेसा फुटबाल क्लब से भी डाइरेक्टर के रूप में जुड़े थे। फिल्म और टेलीविजन से संबंधित कई संस्थाओं में भी वे बड़े पदाधिकारी के रूप में अरसे तक जुड़े रहे। एटेनबरो जैसे व्यक्तित्व बिरले ही होते हैं जो जब जाते हैं अपने पीछे ऐसा रिक्त स्थान छोड़ जाते हैं जिसे भरना आसान नहीं होता।

अभिनेता तो अनेक होंगे लेकिन दूसरा एटेनबरो होना नामुमकिन है। क्योंकि उनके जैसा सशक्त अभिनेता और इनसान होना हंसी खेल नहीं। सदियां गुजर जाती हैं तब कहीं आता है ऐसा एक इंसान। दुनिया उनके अभिनय, निर्देशन के उस खजाने से बहुत कुछ सीख सकेगी, जो वे अपने पीछे छोड़ गये हैं। उनकी फिल्में, उनके आदर्श बेहतर कला और बेहतर जिंदगी के लिए पाथेय बनेंगे।

Rajesh Tripathi

लेखक राजेश त्रिपाठी कोलकाता के वरिष्ठ पत्रकार हैं। वे अपने ब्लाग कलम का सिपाही http://rajeshtripathi4u.blogspot.in में सम सामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं। राजेश त्रिपाठी से tripathirajesh2008@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

 



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