एमिटी के गंजेड़ी स्टूडेंट्स!

विकास मिश्र-

ये एक फूड कोर्ट है, जिसमें करीब दर्जन भर दुकाने हैं, इनमें हर जगह ऐसा ही बोर्ड लगा है। लिखा है-यहां गांजा पीना मना है। ये नोएडा की एमिटी यूनिवर्सिटी के बगल में है। जी हां एमिटी यूनिवर्सिटी, देश में अच्छी रैंकिंग वाली एमिटी यूनिवर्सिटी। जहां तमाम छात्र-छात्राओं के लिए गांजा पीना बहुत ही आम है, ऐसे गंजेड़ी छात्र-छात्राओं के लिए ही जगह-जगह ये बोर्ड बनाए गए हैं।

एमिटी यूनिवर्सिटी नोएडा में है। सड़क के उस पार यूनिवर्सिटी है और इस पार हमारा दफ्तर। दुनिया में आठवां अजूबा मेरे ख्याल से ये यूनिवर्सिटी और यहां के स्टूडेंट ही हैं। यूनिवर्टिसी कैंपस बहुत बड़ा है और इसके चारों तरफ गाड़ियों का रेला लगा रहता है। यहां के छात्रों के पास मर्सिडीज, बीएमडब्लू, ऑडी समेत तमाम बड़े ब्रांड्स की गाड़ियां हैं। गाड़ियां दो-तीन-चार करोड़ रुपये की भी हैं। इन दिनों सबसे ज्यादा प्रचलन में है महिंद्रा की थार।

सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक यहां फॉर्च्यूनर, थार, मर्सिडीज, ऑडी, बीएमडब्लू और दूसरी गाड़ियां बेहिसाब रफ्तार से सड़कों पर दौड़ती हैं, ब्रेक ऐसे लगाते हैं कि टायरों की चीख एक्सप्रेस वे तक पहुंचे। अलमस्ती ऐसी कि बीच सड़क पर कार खड़ी करके कोई फोन पर बतिया रहा है, पीछे कारों का रेला है। अब कौन छेड़े इन्हें, कौन कहे कि भाई साहब किनारे लगा लो। जो कहेगा वो पिटेगा, क्योंकि कार के भीतर बैठे सूरमा मार-पीट में भी उस्ताद हैं।

दिन भर आसपास हंगामे की स्थिति रहती है। कार में लड़के-लड़कियों का औसत कभी समानुपाती तो कभी असमानुपाती क्रम में रहता है। एक गाड़ी में चार लड़कियां, 2 लड़के भी हो सकते हैं तो दूसरी में 2 लड़कियां और तीन लड़के। एक गली है, जिसमें बमुश्किल दो गाड़ियां आ-जा सकती हैं, लेकिन इसी गली में रेस लगती है। एक दिन तो एक कार वाला ब्रेक मारकर गाड़ी को रेस दे रहा था। आगे वाले पहियों में ब्रेक और पीछे के टायर घूमते, चीखते और जलते हुए।

ऐसी हरकतें करने वाले ज्यादातर छात्र लोकल हैं। नोएडा, फरीदाबाद और गुड़गांव के। इनके पालनहारों को जमीन का अरबों रुपये मुआवजा मिला है, या फिर पहले से ही अरबपति हैं। बच्चे करोड़ों की गाड़ी में सैर कर रहे हैं। सिगरेट, शराब, गांजा के संग विद्याध्ययन कर रहे हैं। इनमें से ज्यादातर वो हैं, जिन्हें यहां कुछ साल मौज-मस्ती करके पिता का कारोबार संभालना है।

यहां का हाल देखकर कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम किसी और देश में आ गए हैं, जहां न तो शासन है, न प्रशासन, और न ही सरकार। भयानक अराजकता। एक रोज छात्रों के दो गुटों में मारपीट हो गई, एक का सिर फट गया। पुलिस ने कार्रवाई ये रही कि वहां से बेचारे चाय के स्टॉल लगाने वाले हटा दिए गए। हमारे मित्र और सहकर्मी Kumar Vinod का बेटा यहां से पढ़ाई कर रहा था। पहला साल निकल गया था, दूसरे साल का एडमिशन होना था। जब उन्होंने ये मंजर देखा तो तय किया कि बेटे को कहीं और पढ़ाएंगे।

यूनिवर्सिटी के बाहर दिन भर रोजाना ऐसा ही हंगामा चलता है। शाम ढलने के बाद एमिटी दूसरे रंग में दिखती है। कारों के काफिले गायब हो जाते हैं। स्टूडेंट पैदल सड़कों पर झुंड में घूमते हैं। हाथों में हाथ डाले। कोई डिवाइडर पर बैठा है तो कोई सड़क की साइड में। कोई सिगरेट के कश लगा रहा है तो कोई आइसक्रीम खा रहा है। यहां कोई लिंग भेद नहीं, कोई जातिभेद नहीं। लड़का-लड़की समान भाव से सिगरेट के कश खींच रहे हैं। ये शंका भी कोरी है कि यहां कोई अफेयर का सीन है। लड़की के दोनों कंधों पर अपनी बाहों के हार डालते हुए दिख रहा छात्र हो सकता है कि कोर्स के किसी जटिल प्रश्न को हल कर रहा हो। रात गहराती जाती है, लेकिन सड़कों पर छात्र-छात्राएं अपनी ही धुन में मगन रहते हैं।

मेरे पुत्र समन्वय ने भी इसी यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी से बीए ऑनर्स किया है। उनकी क्लास में 47 लड़कियां थीं और 3 लड़के। मेरे सामने तो ‘बेटा पढ़ाओ-बेटा बचाओ’ जैसा सवाल भी था। क्लास में करोड़पतियों-अरबतियों की संताने भी थीं। एक स्टेट की प्रिंसेज भी थी।

एक रोज समन्वय का फोन पहुंचा उनकी माताजी के पास, बोले कि मम्मी मुझे आने में देर हो जाएगी। वजह बताई कि एक लड़की ने क्लास के बाद ज्यादा वोदका पी ली, उल्टियां कीं और बेहोश हो गई है। उसे कैब करके घर पहुंचाने जा रहे हैं। उसके घर गए तो उसकी मां से अपनी मां की बात कराई। लड़की की मां ने बताया कि वो तलाकशुदा हैं। इकलौती बेटी है, थोड़ा मनमानी हो गई है। उन्होंने धन्यवाद भी दिया कि बच्चों ने उनकी बेटी को सकुशल घर पहुंचा दिया।

इस यूनिवर्सिटी की फीस बहुत ज्यादा है। बच्चा बीए कर रहा होगा, गार्जियन को फीस भरते वक्त इंजीनियरिंग, मेडिकल की फीलिंग आएगी। यहां सामान्य लोगों के बच्चे नहीं पढ़ सकते हैं। तमाम बच्चे ऐसे यहां हैं, जिनके माता- पिता के पास अकूत दौलत है, लेकिन बच्चों के लिए समय नहीं है। लिहाजा यहां एडमिशन करवाकर करोड़ों रुपये की कार और लग्जरी लाइफ देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं। कुछ छात्र ऐसे भी हैं, जो इधर उधर कुछ फ्रीलांस काम करके अपनी फीस का जुगाड़ करते हैं। यानी हर वर्ग के हर तरह के छात्र हैं यहां।

यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के स्तर पर कोई सवाल नहीं है। सब कुछ आला दर्जे का है। यहां की एक स्टूडेंट हमारी सहकर्मी भी रही है। एक रोज एक लड़की ने उसकी शिकायत करते हुए मुझे बताया- सर, वो और उसकी सहेली कल माल में 4 लड़कों के साथ घूम रही थीं। मैं चौंका नहीं, क्योंकि उसी ने बताया था कि दो दर्जन लड़के-लड़कियों का झुंड भी वहां साथ ही निकलता था।

लॉकडाउन के दौर की बात है, एक रोज समन्वय से मिलने 5 लड़कियां और तीन लड़के घर आ गए। खूब चकल्लस की, समन्वय ही संकोच में थे, लड़कियों ने ही पहल की-अपना कमरा नहीं दिखाओगे। कमरे में उनकी गप चली। फिर मुझसे पूछा- अंकल समन्वय को क्या हम अपने साथ ले जा सकते हैं, कल आ जाएगा। मैंने कहा- जो तुम लोग चाहो।

दरअसल ये यूनिवर्सिटी बदलते दौर का एक नमूना है। जहां फुटपाथ की मैगी से लेकर 7 स्टार होटल तक का खर्च वहन करने वाले छात्र-छात्राएं हैं। जमकर पढ़ाई करने वाले हैं तो जमकर मस्ती करने वाले भी हैं। ज्यादतर के दिलोदिमाग में कोई टैबू नहीं है। यहां सीरियस अफेयर नहीं होते। अच्छी दोस्ती होती है। कोल्ड ड्रिंक से लेकर बीयर, वोदका, सिगरेट, गांजा-चरस यहां आम चलन में हैं। इसका सेवन करने वाले हैं तो इसे बचे रहने वाले भी। ये यूनिवर्सिटी एक छोटा सा संसार है, जहां संसार के सारे रंग भी दिखते हैं। अगर आप मुझसे पूछेंगे कि क्या अपनी संतान को इस यूनिवर्सिटी में डालें तो मेरा जवाब होगा- अगर फीस आसानी से भर सकते हों तो जरूर डालें, आपकी संतान को आज के दौर आने वाले दौर का पूरा ज्ञान हो जाएगा।



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