‘गर्व’ करने वाले जयदीप कर्णिक को नीरेंद्र नागर ने कुछ यूं समझाया

Nirendra Nagar

फ़ेसबुक पर टहलते हुए आज मित्र Sanjay Abhigyan के पेज पर यह पोस्ट दिखा जो जयदीप कर्णिक ने लिखा था और संजय ने शेयर किया था। पोस्ट मार्च का है और साथ में एक चार्ट है जिसमें अमर उजाला वेबसाइट को नंबर वन पायदान पर दिखाया गया है।

इसमें लिखा है –

अमर उजाला डॉट कॉम के सर पर सजा ये ताज, टीम की सतत मेहनत और समर्पण का ही परिणाम है। गर्व है।

मुझे इस पचड़े में नहीं पड़ना कि अमर उजाला नंबर वन वेबसाइट है या नहीं क्योंकि वेबसाइटों की पज़िशनें ऊपर-नीचे होती रहती हैं। मेरा प्रश्न ‘गर्व’ से जुड़ा है। किसी महीने अमर उजाला वेबसाइट नंबर वन पर पहुँच गई और इसके कारण आप अपनी टीम पर ‘गर्व’ महसूस कर रहे हैं तो इतने सालों तक जब वह नंबर वन पर नहीं थी, या मार्च के बाद जब वह फिर नीचे चली गई (देखें दूसरा चित्र), तब क्या आपको अपनी टीम पर ‘शर्म’ महसूस हुई थी?

सफलता और असफलता कई कारकों (factors) का सामूहिक प्रतिफल होती है। हमारा काम (action) उन कारकों में से एक कारक है लेकिन वह एकमात्र या सबसे महत्वपूर्ण फ़ैक्टर नहीं है। मसलन मैंने पूरी मेहनत की लेकिन मेरे प्रतिस्पर्धी ने मुझसे कम मेहनत की या वह मुझसे कम प्रतिभाशाली है या कम साधनसंपन्न है तो मैं नंबर वन हो गया। मैंने पूरी मेहनत की लेकिन मेरे प्रतिस्पर्धी ने मुझसे ज़्यादा मेहनत की या वह मुझसे ज़्यादा प्रतिभाशाली है या मुझसे ज़्यादा साधनसंपन्न है तो मैं नंबर टू हो गया।

इसीलिए नवभारत टाइम्स वेबसाइट का संपादक रहते हुए मैंने अपनी टीम पर हमेशा ‘गर्व’ महसूस किया है चाहे साइट एक नंबर पर रहे, दो नंबर पर रहे, तीन नंबर पर रहे या किसी नंबर पर नहीं रहे। गर्व इसलिए भी कि जब टीम के किसी सदस्य से कोई चूक हो जाती थी तो हम वाक़ई ‘शर्म’ महसूस करते थे और पाठकों से माफ़ी भी माँगते थे। मुझे याद है, मेरे एक साथी ने सोशल मीडिया पर कोई ग़लती करने के बाद उस रात खाना नहीं खाया था।

हमारी टीम का एकमात्र ध्येय था – अच्छा काम करना, पूरी लगन और मेहनत के साथ काम करना। नंबरों के लिए भ्रामक शीर्षक लगाना बिल्कुल मना था। हम जानते थे कि नंबर बहुत सारी चीज़ों पर निर्भर करते हैं जिनमें सोशल मीडिया और मार्केटिंग का बहुत बड़ा रोल है। इसलिए नंबर हमारे लिए टीम पर गर्व या शर्म करने का आधार कभी नहीं रहे।

वरिष्ठ पत्रकार नीरेंद्र नागर की एफबी वॉल से.



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