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‘हिंदुस्तान’ ने पादरी स्टेन स्वामी के त्रासद निधन के समाचार के साथ यह सुलूक क्यों किया?

वीरेंद्र यादव-

आज ‘हिंदुस्तान’ के लखनऊ संस्करण ने पादरी स्टेन स्वामी के एनआईए की कस्टडी में निधन का समाचार पृष्ठ संख्या 9 पर विज्ञापनों के बीच इस गैर-महत्वपूर्ण ढंग से प्रकाशित किया है कि जल्दी उस पर ध्यान नहीं जाएगा.

जबकि इसी घराने के अंग्रेजी अखबार ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने इसे फ्रंट पेज बाटम पर लिया है. अंग्रेजी के इंडियन एक्सप्रेस, हिंदू, दि टेलिग्राफ, टाइम्स आफ इन्डिया ने तो इसे फ्रंट पेज लीड बनाया है. इन्डियन एक्सप्रेस ने तो इस पर संपादकीय भी लिखा है.

आखिर उत्तर भारत के हिंदी के एक प्रमुख अखबार ने पादरी स्टेन स्वामी के त्रासद निधन के समाचार के साथ यह सुलूक क्यों किया?

क्या अखबार की दृष्टि में उसके पाठकों के लिए यह गैर जरूरी समाचार है या कि वह नहीं चाहता कि उसके पाठक इस समाचार के सत्ता विरोधी निहितार्थ को ग्रहण कर सकें.

जो भी हो, इतना तय है कि अखबार पत्रकारिता के दायित्व का निर्वहन न करके पाठकों के साथ अन्याय कर रहा है. अकारण नहीं है कि सजग पाठकों का बड़ा वर्ग अब हिंदी अखबारों से विमुख हो रहा है. इन अखबारों में जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों द्वारा अपनी अंतरात्मा को इस तरह सुषुप्त कर देना पत्रकारिता के मूल्यों का हनन होने के साथ नागरिक व संवैधानिक दायित्व से विमुख होना भी है.

आने वाला समय पत्रकारिता के इस पतन को भी दर्ज करेगा.


प्रमुख अंग्रेजी अखबारों में पेज 1 की प्रमुख खबर है ये

सत्येंद्र पीएस-

झारखंड में आदिवासियों के लिए आंदोलन करने वाले 84 साल के बुजुर्ग स्टैन स्वामी को भीमा कोरेगांव में हिंसा मामले में गिरफ्तार किया। वह जेल में मर गए।

हिंसा का मुख्य आरोपी मनोहर कुलकर्णी भिड़े छुट्टा घूम रहा है।

स्टेन स्वामी के ऊपर कोई आरोप सिद्ध नहीं था। संदेह के आधार में जेल में थे। उनकी अंतरराष्ट्रीय ख्याति है जिसे अब तक के भारत के सभी भारत के जीवित प्रधानमंत्री निजी तौर पर जानते हैं। ऐसा नहीं है कि न्यायालय के लिए यह जानना कठिन रहा हो कि वह अपराधी नहीं हो सकते। लेकिन न्यायालय ने उन्हें जमानत नहीं दी।

यह भारत की पहचान रहे एक असाधारण व्यक्ति की सरकारी हिरासत में और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हत्या है। देश के सभी प्रमुख अंग्रेजी अखबारों ने इसे पेज 1 की प्रमुख खबर बनाई है और दुनिया भर के अखबारों में इस निरपराध व्यक्ति की सरकारी न्यायिक हत्या की खबर है।

इस तरह के कई और बुजुर्ग इस समय जेल में हैं जो आईआईटी के प्रोफेसर, वाइस चांसलर, अंतराष्ट्रीय कानून विद रहे हैं। पद पर रहते इन्होंने कोई ऐसा गुनाह नहीं किया कि इन्हें जेल में डाला जाए और जमानत न मिले, लेकिन जब यह शारीरिक रूप से असहाय हो चुके हैं तब ये लोग इस ताकतवर 56 इंची सरकार के लिए खतरा हैं।

यह सरकार उस नालायक बेटे की तरह व्यवहार कर रही है जो बुढापे में अपने बाप को पीटता है कि समस्या की जड़ यही है क्योंकि अगर इसने मुझे पैदा न किया होता तो आज मुझे कोई समस्या न होती।

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2 Comments

2 Comments

  1. meggie

    July 7, 2021 at 12:45 pm

    I think the importance given to this man by leading media houses is absolutely unnecessary, as he was in jail, asking for bail and that too in a CONGRESS ruling state, then how does the question of “५६ इंची सीना”, arise? I think yashawant ji should moderate this attentive website more carefully.

    • Rikshwala

      July 8, 2021 at 3:58 pm

      you are right, Sten was not at all a gud man

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