मैंने यूट्यूब पर ‘इंटरनेट का प्राइम टाइम’ क्यों शुरू किया?

पत्रकारिता से कुछ 6 साल पहले मोहभंग हो गया था और मैं नौकरी छोड़कर कुछ नया करने (जो मालूम भी नहीं था कि क्या) निकल पड़ा। इसके लिए यूं तो तमाम वज़हें ज़िम्मेदार थीं लेकिन उनमें से एक बड़ी वज़ह थी ये समझ में आ जाना कि वहां करने के लिए बहुत कुछ नहीं था। पत्रकारिता की जितनी भी गुंजाइश थी वो भी मालिकों की निजी राजनैतिक निष्ठा, स्वार्थ और हिडेन मोटिव्स के अनुसार ही थी, यानि अगर मालिक कांग्रेस के प्रति वफ़ादार है तो आप बीजेपी के ख़िलाफ़ चाहे जितनी निर्भीक पत्रकारिता कर सकते थे, लेकिन कांग्रेस के ख़िलाफ़ नहीं।

आज भी वही हालत है। बल्कि पहले से और ख़राब हो गई है। पहले आप गिन सकते थे कि फलां मीडिया फलां पार्टी की प्रोपेगेंडा मशीनरी है, अब तो ले देकर गिनती के मीडिया हाउस हैं जो सरकार के चारण नहीं हैं। जो बचे हैं उनकी भी फंडिंग वगैरह पर सवाल उठते रहते हैं। यानि कुल मिलाकर इस हमाम में सब नंगे हैं। ‘निष्पक्ष पत्रकारिता’ कहीं नहीं बची है। अगर ‘ज़ी न्यूज़’, ‘एबीपी’, ‘आज तक’, ‘रिपब्लिक’, ‘इंडिया टीवी’ को आप मोदी या बीजेपी की प्रोपेगेंडा मशीनरी मानते हैं तो फ़िर ये भी एक तथ्य है कि ‘एनडीटीवी’, ‘द वायर’, ‘द प्रिंट’, ‘द क्विंट’ जैसे मीडिया प्रतिष्ठान भी ‘एंटी मोदी या एंटी सरकार’ प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं और उनकी पत्रकारिता भी संदिग्ध है।

ऐसे में एक बड़ा संकट जो खड़ा हुआ है निरपेक्ष पाठकों और दर्शकों के लिए (सो कॉल्ड भक्त और एंटी नेशनल इस कैटेगरी में नहीं आते) जो सिर्फ़ सच देखना या जानना चाहते हैं। एक सच जिसमें किसी मीडिया हाउस ने कोई प्री-नोशन ना बना रखा हो। एक ऐसा सच जिसमें ऑब्जेक्टिविटी हो बिना किसी सेट नैरेटिव या एजेंडा के। एक ऐसा सच जिसमें एंकर या पत्रकार अपनी पसंद-नापसंद और अपनी निजी खुन्नस, फ़्रस्ट्रेशन या फ़िर अपने संस्थान के हितों की अनुकूलता की परवाह किये बगैर — बिना किसी मिलावट के तथ्य रख दे। एंकर या तो सरकार के प्रवक्ता बन चुके हैं या फ़िर सो कॉल्ड एक्टिविस्ट। बस पत्रकार नहीं रहे।

इसी बीच पिछले 6 सालों में टीवी चैनलों पर डिबेट्स की बहार आई हुई है। आम लोगों को लग सकता है कि ये एक स्वाभाविक परिवर्तन है कि सभी चैनल एक साथ 8-8 विंडो में गेस्ट्स को बिठाकर मज़मा लगा लेते हैं। और फ़िर जमकर चिल्लमचिल्ली, हो-हल्ला, एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप, एक दूसरे की औक़ात दिखाने, नीचा दिखाने से लेकर कुछ मौकों पर स्टूडियो में जूतम-पैज़ार तक की नौबत ऑन स्क्रीन लाइव दिखाया जाता है। पर ऐसा हुआ क्यों, क्या टाइम्स नाउ पर अर्णब गोस्वामी के न्यूज़ आर की अभूतपूर्व सफलता की वजह से ऐसा हुआ या फ़िर इसलिए कि बाक़ी टीवी न्यूज़ वाले ‘फीलिंग ऑफ़ मिसिंग आउट यानि फोमो’ के शिकार हो गये थे? दरअसल कहानी कुछ और है।

छह साल पहले देश की राजनीति का माहौल अलग था। बहुत कुछ कहने सुनने की गुंजाइश थी। यही वजह है कि जब मोदी जी का नाम प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार पद के लिए सामने आया तो न्यूज़ चैनलों ने गोधरा से लेकर नरौदा पटिया तक के गड़े मुर्दे उखाड़े, और उनकी जमकर छीछालेदर की। कुछ मीडिया हाउस ने पत्रकारिता के नाम पर जमकर एंटी-कैंपेनिंग भी की। गुजरात मॉडल को लेकर सवाल उठाये। लेकिन सब कुछ करने के बाद भी मोदी जी का कुछ नहीं बिगड़ा उल्टे उन्हें इसका फ़ायदा मिला। कांग्रेस के दस साल के भ्रष्टतम शासन से उकताए हुए लोगों को मोदी जी में एक करिश्माई जादूगर नज़र आने लगा। जिस हद तक कांग्रेस ने पिछले साठ सालों में मुसलमानों का तुष्टिकरण किया था उससे हिंदुओं का एक बड़ा तबका भीतर ही भीतर बहुत नाराज़ था और उसे लगा कि मोदी जी आडवाणी से बेहतर हिंदू हृदय सम्राट बनने की काबिलियत रखते हैं। नतीज़ा बताने की ज़रूरत नहीं। मोदी जी दो-दो जगहों से चुने गए और देश के प्रधानमंत्री बने। लेकिन मोदी जी ये कतई नहीं भूले कि चुनाव के दौरान उनके खिलाफ़ मीडिया ने किस तरह की कैंपेनिंग की। फ़िर क्या था, मोदी जी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में मीडिया की ऑक्सीजन सप्लाई बंद करनी शुरू कर दी।

सबसे पहले मोदी जी ने तमाम मंत्रालयों में पत्रकारों की एक्सेस ख़त्म कर दी। रिपोर्टर्स के लिए नो एंट्री का बोर्ड लगा दिया गया। यानि अब रिपोर्टर फील्ड में जाकर भी ख़बर नहीं निकाल सकता था। सरकार की कम्यूनिकेशन मशीनरी जो डिसेंट्रलाइज्ड हुआ करती थी, उसे सेंट्रलाइज़्ड कर दिया। नौकरशाहों को फरमान जारी किए गए कि अगर कोई फाइल, कोई सरकारी सूचना या फ़िर नोट्स मीडिया को लीक हुए तो उनकी ख़ैर नहीं। तमाम बड़े-बड़े मंत्रियों को भी मीडिया से सीधा संवाद करने से रोक दिया गया। यानि अख़बारों और चैनलों में जो अलग-अलग बीट के रिपोर्टर थे एक झटके में उनके पास कोई काम ही नहीं बचा। जो भी बात कहनी थी सरकार को वो पीआईबी की ओर से कही जाती थी या फिर गिने-चुने मंत्रियों या फ़िर गिनती के प्रवक्ताओं के ज़रिए। मनमोहन सिंह के ज़माने में पचासों की संख्या में पत्रकार मुफ़्त में ही देश-विदेश की यात्रायें किया करते थे। लेकिन मोदी जी ने केवल दूरदर्शन और एएनआई जैसी एजेंसी के इक्का-दुक्का पत्रकारों को ही साथ ले जाते थे जो सिर्फ़ सुनने में माहिर थे और सवाल भी सरकार की तरफ़ से तय होते थे। निजी चैनलों के पास ये विकल्प था कि वो अपने पत्रकारों को अपने ख़र्चे पर प्रधानमंत्री की विदेश यात्रायें कवर करने भेजें लेकिन सारे संस्थानों की ना तो इतनी औक़ात थी और ना ही उनके मालिक ये ख़र्चा करने के हक़ में थे। और इस तरह सरकार से जो सूचनाएं सिर्फ़ रिपोर्टर निकालकर लाते थे और अपनी दिहाड़ी पूरी करते थे उनमें से 70 फ़ीसदी बेकार हो गये। और इस तरह से पहले से घात लगाए बैठे मीडिया मालिकों को अपना खर्चा कम करने का अच्छा बहाना भी मिल गया। और वैसे भी फील्ड में काम करने वाले रिपोर्टर एक दिन में एक या दो ख़बर निकालकर लाते थे जो उनकी भारी भरकम सैलरी को जस्टिफाई नहीं कर सकती थी। इसलिए तमाम रिपोर्टर्स की छुट्टी कर दी गई और कई-कई बीट्स एक ही रिपोर्टर को दे दी गई।

बस यहीं से सारा खेल शुरू हुआ — चैनल पर डिबेट्स का। रिपोर्टर की गैर मौजूदगी में चैनलों के पास अपना ओरिजिनल कंटेंट कम होने लगा 24 घंटे स्क्रीन भरने की मजबूरी के बीच डिबेट शोज़ के तौर पर उनके एक लो बजट प्रोग्रामिंग फॉर्मूला उनके हाथ लग गया जिससे कम ख़र्चे में ज्यादा ऑन एयर टाइम भरा जा सकता था। यानि टीवी डिबेट्स की उत्पति कॉस्ट कटिंग और ‘मिनिमम इन्वेस्टमेंट मैक्सिमम प्रोडक्शन’ के फॉर्मूले को आज़माने के लिए हुई जो सरकार के लिए भी काम की रही। सरकार ने जब सरकारी विज्ञापन देने बंद किये और दबी ज़बान में ऐसा कहा जाता है कि कार्पोरेट्स को भी धमकाया कि फलां चैनल को विज्ञापन दिया तो ख़ैर नहीं तो चैनलों ने डिबेट शोज़ के ज़रिये सरकार को ख़ुश करना शुरु कर दिया। वैसे भी सपाट न्यूज़ रीडिंग वाले किसी शो से कहीं ज्यादा गुंजाइश होती है डिबेट शो में सरकार का एजेंडा सेट करने की। आज की तारीख़ में ये शो कुछ इस तरह से डिजाइन किये जाते हैं कि आख़िरकार सरकारी एजेंडा ही कन्विंशिंग नज़र आए। शो के टॉपिक तय करने से लेकर, उसकी लाइन तय करना, उसके गेस्ट तय करना सब कुछ एक तय निष्कर्ष को ध्यान में किया जाता है। मुझे तो ये भी शक है कि सरकार को गाली देने वाले लोग भी सरकार की ओर से अप्रूव्ड होते हैं क्योंकि वो अक्सर ही ऐसा माहौल बनाते हैं कि सरकारी पक्ष सही नज़र आने लगता है। अब एक दिक्कत ये रही कि सारे चैनल उतर आए– यही करने। ऐसे में टीआरपी की गलाकाट प्रतियोगिता में बने रहने के लिए ऑन एयर अपने शो में जितनी नौटंकी, हल्ला-गुल्ला, मारपीट की स्थिति बन सकती है, वो बनाई जाती है। जो चैनल सरकार को गाली देते हैं ऐसे शोज़ में उनको किसी और की फंडिंग और बैकिंग है ताकि वो ज़िंदा रह सकें।

यानि कुल मिलाकर चैनलों पर आने वाले डिबेट शो प्रोपेगेंडा ड्राइव करने की एक मशीनरी और ख़ुद को जिंदा रखने की चैनलों की मज़बूरी से ज्यादा कुछ भी नहीं है। जो भक्तों के अलावा बची आबादी को बखूबी समझ में आता है। और यही वजह है कि यंग लोग, या कहें कि 40 साल से कम उम्र की एक बड़ी आबादी को इन टीवी डिबेट शोज़ में कोई इंटरेस्ट नहीं है। हालांकि इनमें से बहुत से लोग देश से जुड़े तमाम सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक मसलों पर अपनी राय साफ़ करने के लिए ऐसी बहसे देखना चाहते हैं लेकिन चिल्लमचिल्ली, हल्ला-गुल्ला, प्रोपेगेंडा और गेस्ट्स को बेइज्जत किया जाना, बहस को सेट नैरेटिव की तरफ़ ले जाना उन्हें रास नहीं आता। बस इन्हीं लोगों के लिए मैंने ‘इंटरनेट का प्राइम टाइम’ शुरू किया है। वैसे भी लॉकडाउन में समय काटना एक चुनौती है तो मैने सोचा कि क्यों ना इंडिपेडेंट जर्नलिज्म ही किया जाए।

एक लाइन में कहूं तो इंटरनेट का प्राइम टाइम सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे आने वाला एक ऐसा शो है — जिसमें कोई प्रोपेगेंडा ड्राइव नहीं किया जाता, जिसमें किसी नैरेटिव के साथ किसी विषय का चुनाव नहीं होता, जिसमें आने वाले गेस्ट्स विश्वसनीय हैं और युवा हैं, जिसमें कोई हो-हल्ला नहीं होता, जिसमें सबको अपनी बात शांति से कहने का मौक़ा मिलता है और बतौर होस्ट मैं खामखा ज्ञान नहीं देता और ना ही किसी की बैंड बजाता हूं। इस शो का मकसद शांतिपूर्ण तरीके से उन मसलों के अलग-अलग पहलुओं को दर्शकों के सामने लाना है जो उनकी ज़िंदगी पर डाइरेक्ट या इनडाइरेक्ट असर डालते हैं। यूं तो इसे कोई भी देख सकता है लेकिन मैने अपनी ओर से चालीस साल से कम उम्र वालों की टारगेटिंग रखी है। हां, मैं ये ज़रूर मानता हूं कि मीडिया को शाश्वत विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए इसलिए आपको सरकार के पक्ष में कोई मुद्दा नज़र नहीं आएगा। पत्रकार के तौर पर हमारी भूमिका सच दिखाना है और सत्ता पक्ष से आम आदमी की तरफ़ से सवाल पूछना है। बस वही कर रहा हूं मैं। पिछले दो हफ्ते में अब तक 10 शोज़ कर चुका हूं। अगर आपको लगता है कि आप ऐसा कार्यक्रम देखना चाहेंगे तो आप मेरा चैनल नीचे दिए गए लिंक के ज़रिये सब्सक्राइब कर सकते हैं। आपके सुझावों का इंतज़ार रहेगा।

https://www.youtube.com/VivekSatyaMitram

[अगर आप मेरी बातों से सहमत हों और इस मुहिम में मेरी मदद करना चाहते हों तो आप ये पोस्ट भी शेयर कर सकते हैं ताकि मेरे कार्यक्रम के बारे में थोड़ी जागरूकता फैले और लोग प्रोपेगेंडा से ख़ुद को बचा सकें जो मेरी कोशिश है। मैं फिलहाल किसी मीडिया से नहीं जुड़ा हूं। अलग-अलग क्षेत्रो में वेंचर रन कर रहा हूं इसलिए ये इनिशिएटिव किसी मॉनेटरी बेनेफ़िट के लिए हो, ऐसा नहीं है। अपने खाली समय का सदुपयोग करना चाहता हूं और इसी बहाने वो भी करने का मौका मिल रहा है जो बतौर पत्रकार अपने एक दशक से ज्यादा लंबे करियर में नहीं कर पाया। बाक़ी मुझे कोई एंटी या प्रो मोदी ग्रुप फंड नहीं कर रहा है इस बात को लेकर आप निश्चिंत रह सकते हैं। 🙂 ]

शुक्रिया, आपका इंतज़ार रहेगा।

विवेक सत्य मित्रम्

विवेक सत्य मित्रम् कई न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर रहे हैं. अब वे उद्यमी के साथ साथ डिजिटल जर्नलिस्ट भी हैं.

  • भड़ास की पत्रकारिता को जिंदा रखने के लिए आपसे सहयोग अपेक्षित है- SUPPORT

 

 

  • भड़ास तक खबरें-सूचनाएं इस मेल के जरिए पहुंचाएं- bhadas4media@gmail.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *