कानाफूसी : देशभर के पत्रकारिता जगत की निगाहें इन दिनों जागरण की तरफ है। सभी के मन में एक ही सवाल है क्या जागरण को विष्णु से मुक्ति मिलेगी?
विष्णु का जन्मदिन 27 मई को है। यानी इन दिन वह 58 साल के हो जाएंगे। साथ ही दैनिक जागरण से सेवानिवृत्त होने की आयु भी पूरी कर लेंगे। ऐसे में मीडिया जगत में एक ही सवाल है क्या वह रिटायर होंगे?
कोरोना काल के बाद अखबारों को जो आर्थिक नुकसान हुआ है और नई नीति बनी है, उसके तहत किसी को सेवा विस्तार नहीं दिया जा रहा है। अपने संपादकीय कार्यकाल में जागरण को पत्रकार प्रिय अखबार से पत्रकारों का सबसे बड़ा दुश्मन बनाने के साथ विष्णु ने एक और काम किया है, उन्होंने सभी सक्षम लोगों को जागरण से विदा कर दिया है। अभी जागरण में सिर्फ उनके ही दोअम दर्ज के पत्रकार शिष्य हैं। जिनके पास ज्ञान के नाम पर सिर्फ विष्णु वंदना है।
उधर, विष्णु ने कानपुर ग्रुप के सहारे सीजीएम नितेंद्र से बेहतर संबंध बनाकर सचान को भी किनारे कर दिया है। अब विष्णु और नितेंद्र श्रीवास्तव सारा खेल करते हैं और मालिक संजय तक कोई जानकारी पहुंच नहीं पाती। संजय भी विष्णु प्रेम में अंधे हैं। इस कारण लोगों को विष्णु विदाई की उम्मीद कम है। बाकी सब वक्त की बात है। देखती रहिए होता क्या है!
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
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Sudeep Sharma
April 30, 2022 at 10:53 pm
दैनिक जागरण से खराब स्थिति इसी समूह के अखबार नवदुनिया की है। भोपाल में जागरण से आया हुआ संपादक स्टॉफ से दवाई, चप्पल, मिठाई, कपड़े तक मांग लेता है। विदिशा और रायसेन जिला कार्यकाल से जब दबाव बनाकर मोबाइल लिया गया, तब नाराज स्टॉफ ने कच्चा चिट्ठा खोल दिया। उत्तराखण्ड से आए लोगों ने प्रसार और विज्ञापन का बंटाधार कर रखा है। दबाव बनाने के लिए संपादकीय के लोगों को वसूली में लगा दिया है।
सूरमा भोपाली
May 1, 2022 at 11:47 am
सूरमा भोपाली नूं के रिया है कि इन चोट्टों को चौराये पे क्यों नी ला रिये हो? मामू इंका स्टिंग करो, इनकी नँगाई को सूरमा बनके एक्सपोज करो के मियां।
patrakar
May 1, 2022 at 10:12 am
उदय सिन्हा जैसे लोगों से अमर उजाला को मुक्ति नहीं मिल पा रही है तो विष्णु जी तो किताबों से जुड़े लोग हैं। जबकि काफी साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं. कंपनी से अपना फायदा और दूसरों का नुक्सान करा रहे हैं.
Josh Karamati
May 2, 2022 at 1:05 am
धृतराष्ट्र ने संजय की मदद से महाभारत देखा था… यहां तो संजय ही धृतराष्ट्र बना हुआ है… ज़ुल्म सहते बेकसूर ज़ालिम के मददगार हैं… मुट्ठी भर बचे हैं… हौसला करके एक हो जाओ… ज़ुल्मी ख़ुद जान की तौबा कर लेगा… परवरदिगार गवाह बन झूठ ना बुलवाये… ज़ुल्मी सबसे ज़ियादा कायर है… ऐब उसकी ज़ुबान में है… बदनियति दिल में… ये दौरे-दर्द गुज़र जायेगा… मालिक को सबकुछ लुटाके होश आयेगा… वो करामाती है, मालिक का वफ़ादार बनता है… पीठ में ख़ंजर घोंपता है… भाई को भाई से लड़ाता है… ज़ुल्मी शिकस्त खायेगा… मिलके बेनक़ाब करना होगा… जिसे जो बन पड़े सबूत इकट्ठा करो… दलालों को दारू दो… वो बोलेंगे… वो भी तख़्त पे बदलाव की चाहत रखते हैं… वो बोलेंगे…
Manoj
May 3, 2022 at 11:53 am
भोपाल के संपादक कोई साथ नहीं दे रहा है फिर भी और नकारात्मक माहौल में जी जान लगाकर नवदुनिया को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। इंदौर मुख्यालय के वरिष्ठ लोग ही भोपाल के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह लोग मैनेजमेंट के साथ मिलकर, एडिटोरियल के खिलाफ काम कर रहे हैं। यह लोग मोटी तनख्वाह लेते हैं और ना काम करते हैं और ना काम करने देते हैं। गाइडेंस नहीं मिलता है और वरिष्ठ जनों की राय लेकर भोपाल में नोएडा का आदेश लागू करके कोई काम किया जाता है तो यह लोग अड़ंगा डालते हैं। फिर यह आरोप लगाते हैं कि सीनियर की इज्जत नहीं होती। सीनियर को इज्जत मिलती नहीं उसे कमानी पड़ती है। नईदुनिया समूह में MP CG के बीच या फिर इंदौर और भोपाल के बीच जंग चल रही है तो इसकी जिम्मेदारी इंदौर में बैठे एडिटोरियल चीफ की है। इंदौर की कुंठित मानसिकता पूरे ग्रुप का नुकसान कर रही है। यही लोग मैनेजमेंट को झूठी शिकायत करवा रहे हैं। इनका भांडा जल्दी फूटेगा।
Harsh Kumar
May 4, 2022 at 3:39 pm
दैनिक जागरण वाले विष्णु त्रिपाठी कैसे संपादक हैं?
हर्ष कुमार-
दोस्तों, ये पोस्ट मैं लंबे समय से लिखना चाह रहा था। लगभग सात साल(2003-10) तक दैनिक जागरण में काम करने के बाद मैंने ये पाया कि कर्मचारी के लिहाज़ से सबसे ख़राब संस्थान अगर मीडिया हाउसों में से कोई है तो वो दैनिक जागरण ही है। कभी भी अपने कर्मचारी के हित में न सोचना और कुछ प्रबंधकों के ग़लत फैसलों को नज़रअंदाज़ करना इस संस्थान की और मालिकान की सबसे बड़ी कमज़ोरी है।
हाल ही में मेरे मेरठ में और अमर उजाला व दैनिक जागरण के पुराने साथी रहे मनोज झा ने दैनिक जागरण को लगभग 20 साल की सेवाओं के बाद अलविदा कह दिया।मनोज झा मेरठ में संपादकीय प्रभारी रहे, नोएडा में भी रहे हैं। बिहार के राज्य प्रभारी रहे हैं और अब रायपुर में नई दुनिया के संपादक थे। उन्होने हाल ही में इस्तीफ़ा देकर दिल्ली सरकार के चीफ़ मीडिया सलाहकार के रूप में कार्यभार ग्रहण कर लिया है। इसके अलावा दैनिक जागरण के बनारस के संपादक मुकेश सिंह ने भी इस्तीफ़ा दे दिया है। उन्हें बनारस से नोएडा में सेंट्रल डेस्क पर बुला लिया गया था। मुकेश सिंह इससे पहले मेरठ और अलीगढ़ के संपादक भी रहे हैं और अमर उजाला में मेरे साथ मेरठ में हुआ करते थे।
जब भी दैनिक जागरण में कुछ उथल पुथल होती है तो बस एक ही शख़्स का नाम सामने आता है – विष्णु त्रिपाठी । मुझे नहीं पता कि विष्णु त्रिपाठी जी संपादक हैं, प्रबंधक है, या क्या है? ना ही मैंने कभी उनके साथ काम किया, यहां तक कि मैं उनसे कभी मिला भी नहीं हूं लेकिन उनके बारे में जितना सुना है उससे इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि उनसे ख़राब संपादक पूरे देश में कोई दूसरा नहीं है। कोई उनकी तारीफ़ नहीं करता।और जैसा कि उनके साथ काम कर चुके लोग बताते हैं कि वो मनमानी करते हैं और किसी की नहीं सुनते। मेरी समझ में यह नहीं आता कि ये बातें मालिकों तक नहीं पहुंचती क्या? ये फीडबैक क्या मालिकों के पास नहीं है कि विष्णु त्रिपाठी सबसे ख़राब संपादक हैं? इसके बावजूद भी मनमाने फ़ैसले लिए जाते हैं लोगों को परेशान करने के लिए उन्हें सिलीगुड़ी, जबलपुर, रायपुर,रांची, बिहार और न जाने कहां कहां ट्रांसफर कर दिया जाता है। सिर्फ़ इसलिए कि वे परेशान होकर इस्तीफ़ा देकर संस्थान छोड़ दें।
अफ़सोस की बात तो यह है दैनिक जागरण में काम कर चुके लोग दैनिक जागरण को छोड़ देने के बाद भी विष्णु त्रिपाठी जैसे लोगों के विरोध में आवाज़ उठाने का साहस नहीं करते हैं।शायद उनके मन में ये भाव बना रहता है कि कल नौकरी की ज़रूरत पड़ जाए और फिर उनके ही पास जाना पड़े तो? मैंने तो तय किया हुआ है कि कहीं भी नौकरी कर लेंगे लेकिन दैनिक जागरण में नहीं जाएंगे। और कई साथियों को भी इस तरह की सलाह दी, कुछ ने मानी कुछ ने नहीं। बहरहाल मनोज झा जी का यह फ़ैसला देर से आया बहुत सही आया। अब उनके हाथ में कुछ विशेष अधिकार भी है। लंबे समय से केजरीवाल सरकार ने दैनिक जागरण के विज्ञापन बंद किये हुए हैं और उम्मीद करता हूं कि ये बंद ही रहेंगे।
दोस्तों अपने काम को इंजॉय करें जिस भी संस्थान में रहें पूरी वफ़ादारी से काम करें लेकिन हमेशा अपने लिए विकल्प तलाशते रहें क्योंकि संस्थान कितना भी अच्छा हो आपकी एक ही गलती आपकी बरसों की मेहनत पर पानी फेरने के लिए पर्याप्त होती है। फ़िलहाल इतना ही।
दैनिक जागरण में लम्बे समय तक कार्यरत रहे पत्रकार हर्ष कुमार की एफ़बी वॉल से।