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सुख-दुख

मीडिया से भागकर जहां जाओगे वहां भी उतनी ही गंदगी मिलेगी!

-Ashwini Kumar Srivastava-

मुझे मीडिया की नौकरी छोड़े हुए अब दस साल से ज्यादा हो चुके हैं मगर अब भी अपने मीडिया के साथियों के संपर्क में रहता हूं। जैसे मैं तब मीडिया में वर्क प्लेस की गुटबाजी, राजनीति आदि गंदगियों के लेकर दुखी रहता था, वैसे ही आज भी मैं अपने ज्यादातर साथियों को दुखी पाता हूं। मीडिया के मेरे ज्यादातर साथी मुझसे बराबर यह अफसोस जताते हैं कि अगर मीडिया को छोड़कर वह कहीं और होते तो उन्हें एक बेहतर वर्कप्लेस मिल जाता। जबकि मेरा अनुभव अब मुझे यह स्पष्ट कर चुका है कि आदर्श वर्क प्लेस भी राम राज्य की तरह की कल्पना ही है। जिसका सपना देखने से कोई फायदा नहीं है। हकीकत में तो रावण राज की लंका जैसा माहौल ही हर वर्क प्लेस में नसीब होना है।

मुझे याद है कि मैं जब पहली नौकरी में आया था, तब से लेकर अपना बिजनेस शुरू करने तक मैंने कई बार अपनी मनपसंद जगह ढूंढने के लिए कम्पनियां बदलीं।

कम्पनी बार- बार बदलने का यह फायदा जरूर मिला कि चंद ही बरसों में कई गुना सेलरी और कई छलांगे मारकर सम्मानजनक पद हासिल हो गया। लेकिन उसके बाद यह भी पता चल गया कि लगभग हर कंपनी में गुटबाजी भयंकर तरीके से हर तरफ हावी है इसलिए सिर्फ मेहनत, ईमानदारी, लगन अथवा योग्यता के बल पर यहां टिक पाना तकरीबन असम्भव है।

फिर अपना बिजनेस शुरू किया तो सोचा कि अब यहां तो किसी भी कीमत पर गुटबाजी की गंदगी कर्मचारियों में नहीं फैलने दूंगा। लेकिन पार्टनरशिप में बिजनेस शुरू करने के कारण लगातार गुटबाज कर्मचारियों को हटाते रहने के बावजूद यह गंदगी साफ नहीं कर पाया। क्योंकि कर्मचारी चाहे लाख बदल लूं, मगर जो आपकी ही तरह मालिक समझा जा रहा है यानी आपका पार्टनर, यदि वह गुटबाज है तो हर कर्मचारी उसी की छत्रछाया में जाने की फिराक में रहेगा या खुद पार्टनर ही हर कर्मचारी को अपनी तरह नाकारा और गुटबाज बनाने में लगा रहेगा।

हालांकि किसी पार्टनरशिप के बिना जो लोग अकेले ही कोई बड़ा बिजनेस संभाल रहे हैं, वे भी अपने कर्मचारियों के बीच गुटबाजी को शायद ही रोक पाते होंगे। क्योंकि हर कम्पनी के मालिक को अपने दिशा- निर्देशों, नियमों आदि का पालन करवाने के लिए अपने ठीक नीचे ताकतवर पदों पर लोगों को तैनात करना ही होता है।

जाहिर है, शीशे की तरह पारदर्शी नजर आने वाली गंगा में अगर गोमुख से निकलने के बाद कहीं आगे जाकर मसलन हरिद्वार से ही हर शहर की गंदगी भी मिलने लगे तो कानपुर पहुंचते-पहुंचते तो उसका पानी काला या मटमैला तो हो ही जाएगा। इसीलिए कम्पनियां भी मालिक के अच्छे होने के बावजूद अक्सर अपने कर्मचारियों के लिए आदर्श वर्क प्लेस नहीं तैयार कर पातीं। क्योंकि किसी एक के अच्छे और सच्चे होने से भी आदर्श संस्थान नहीं खड़ा किया जा सकता।

लिहाजा अब अपने पूर्व साथियों को मैं यही राय देता हूं कि जहां हो जैसे हो , उसी में खुश रहना सीख लो। गुटबाजी आदि की गन्दगी हर जगह है और पर्याप्त मात्रा में है। मीडिया में रहकर कम्पनी बदलने या मीडिया छोड़कर किसी और क्षेत्र में कम से कम इसलिए तो मत जाओ कि जहां हो , वहां की गन्दगी से कोफ्त हो रही है। बाकी तरक्की या और ताकतवर पद अथवा बढ़िया सेलरी के लिए जहां छलांग मारनी हो मार लो। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता जैसा दिव्य ज्ञान देने वाले महापुरुष की भावनाओं को समझो और बजाय आदर्श समाज या वर्क प्लेस तलाशने के, अपनी कामयाबी की डगर तलाशो।

पत्रकार और उद्यमी अश्विनी कुमार श्रीवास्तव का विश्लेषण.

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