जिन ढूंढा तिन पाइयां, मुद्दत बाद आखिर मिल ही गए वो स्टेट्समैन वाले जेके साहनी

करीब चार साल की नौकरी के बाद 2001 में मैंने पहली बार राष्ट्रीय सहारा की नौकरी को विदा कहा था। तब मैं रुड़की में संवाददाता हुआ करता था। मेरे करीबी मित्रों में, सबसे करीब थे जे.के.साहनी, दि स्टेट्समैन के रिपोर्टर। 2001 के बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर रुड़की की तरफ नहीं देखा! पिछले दिनों करीब 13 साल बाद रुड़की में नाइट स्टे का संयोग बना। होटेल में वक्त बिताने की बजाय मैं साहनी साहब से मिलने को आतुर था।

दीवान जेके साहनी से मैंने बहुत कुछ सीखा था! खासकर मेरी अंग्रेंजी पर उनकी विशेष कृपा रही। मुझे याद हैं उन्होंने ही मुझे पहली बार, इंडिया टुडे और आउटलुक की अघोषित वार के बारे में बताया था! कैसे एक आदमी जिसका नाम विनोद मेहता था, ने इंडिया टुडे के साम्राज्य को चुनौती दी थी! दीवान जेके साहनी मेरे जीवन में अहम हैं।

ऑटो से सीधा मैँ उनके घर पहुंचा, रामनगर (रुड़की)। लेकिन दरवाजा खोलने वाला कोई अजनबी था! ऐसा अजनबी जिसने उस व्यक्ति के बारे में बताने से इनकार कर दिया, जिससे उसने मकान ख़रीदा था! 

फिर दो तीन घंटे तक ऑटो घूमता रहा। कॉफी शॉप,, हॉटेल पॉलरिश का वो बार जहाँ कभी हम बैठा करते थे, सब बदल गया था ! क्या करूँ? शिकायत भी नहीं कर सकता! क्योंकि 13 साल का वक्त सामने खड़ा था!! अंततः एक डेरी वाले से साहनी साहब के बेटे का नाम सुना, पुनीत के पापा! 

शायद, हाँ पुनीत के पाप!

मैंने तुरंत कहा हाँ, जो मोटे लेंस का चश्मा लगाते हैं। जो सुबह चार बजे अपना कुत्ता घुमाने निकलते थे। जो मेरे उठने के पहले, मेरे रूम पर समोसे लेकर पहुँच जाते थे, मैंने स्वयं को थोडा इमोशनल पाया। 

अंततः तीन चार घंटे की जद्दोजहद के बाद मैंने अंततः जेके साहनी का आवास विकास कालोनी में नया पता खोज लिया था! बेटे की शादी हो गई थी। लेकिन साहनी साहब, अब पहले की तरह बोल नहीं पाते! या बमुश्किल सुन पाते हैं! बोल पाते हैं- सुन पाते हैं! मेरे आंसू टपकना स्वाभाविक था। तो यही है हम सबका निष्कर्ष! 

खैर साहनी साहब ने जैसे ही मुझे देखा, उनके चेहरे पर भावनात्मक चमक थी! ख़ुशी का ठिकाना नहीं था! साहनी साहब हैं और सामान्यतः सकुशल हैं, मेरे लिए इतना काफी था!

मुकेश यादव के एफबी वॉल से



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