‘काबा-ए-हिंदुस्तान’ में याद किए गए मिर्ज़ा ग़ालिब

वाराणसी : उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के पुण्य तिथि की 150वी वर्षगाठ के उपलक्ष्य में पराड़कर स्मृति भवन, मैदागिन पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया| मानवाधिकार जननिगरानी समिति के सीईओ डा. लेनिन रघुवंशी ने बताया कि 19वीं सदी के भारतीय साहित्य में सबसे बड़े और महान शायर के रूप में पहचान बनाया है| बनारस में रहकर बनारस के बनारसी मिजाज़ से वह इतना प्रभावित हुए कि चार सप्ताह तक रुकने के लिए मजबूर हो गए| साथ ही उन्होंने यहाँ की गंगा जमुनी तहजीब को देखते और महसूस करते हुए काशी को “काबा-ए-हिंदुस्तान” की उपाधि दे डाली| आज उनकी पुण्य तिथि की 150वी वर्षगाठ पर यह कार्यक्रम आयोजित कर उनके द्वारा जो साझा संस्कृति और साझी विरासत को कायम रखने का जो उन्होंने प्रयास किया था उसी को हम आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं|

इस कार्यक्रम में पदमश्री राजेश्वर आचार्य जी को उनके शास्त्रीय संगीत में अपना उत्कृष्ट योगदान देने और काशी का गौरव व मान बढ़ाने के लिए उन्हें “जनमित्र सम्मान” से नवाज़ा गया| उन्हें मानवाधिकार जाननिगरानी के ट्रस्टी डा0 महेंद्र प्रताप द्वारा प्रशस्तिपत्र व शाल भेट कर उनको सम्मानित किया| आचार्य मृत्युंजय त्रिपाठी ने अभिनन्दन पत्र देकर काशी गौरव पदमश्री राजेश्वर आचार्य का सम्मान किया|

पदमश्री राजेश्वर आचार्य जी ने कहा कि ग़ालिब का यह सपना था कि हिन्दुस्तान में जो विभिन्न सम्प्रदायों की संस्कृति की जो मिली जुली एक एकता है व अनवरत ऐसे ही कायम रहे इसके लिए वह सतत अपनी ग़ज़ल और शायरी के माध्यम से उसको आगे बढ़ाते रहे|

कार्यक्रम में आगे आचार्य मृत्युंजय त्रिपाठी जी ने कहा कि ग़ालिब ही एकमात्र ऐसे शायर है जो किसी एक सम्प्रदाय विशेष के न होकर सभी सम्प्रदायों पर अपनी अमिट छाप छोड़ते है | हमें भी उनसे प्रेरणा लेकर अपने व्यक्तित्व को ऐसे ही बनाना चाहिए|

मौलाना हारून रशीद जी ने कहा कि ‘बेदिल’ से प्रभावित गालिब फारसी में शायरी करते थे | उर्दू शायरी के भीतर एक नई परंपरा की बुनियाद डाली | गालिब अपने जीवन में ही नहीं बल्कि शायरी में भी इंसानी रिश्तों को जीते हैं|

प्रोफ़ेसर शाहिना रिज़वी ने कहा कि उन्होंने अपनी प्रसिद्ध मसनवी ‘चराग-ए-दैर’ (मंदिर का दीप) में बनारस की आध्यात्मिकता, पवित्रता और सौंदर्य को बेहद खास अंदाज में चित्रित करते हुए इसे ‘काबा-ए-हिंदोस्तान’ कहा है। गालिब का मानना था कि बनारस की हवा में उन्हें शक्ति की अनुभूति होती है जो मृत शरीर को भी जीवित कर देती है।

घर से नौ मील दूर निजामुद्दीन में ग़ालिब के दफनाए जाने का रहस्य

ग़ालिब घर से नौ मील दूर क्यों दफनाए गए(मिर्ज़ा ग़ालिब के बल्लीमारान की जगह निजामुद्दीन में दफनाए जाने का रहस्य)

Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಶುಕ್ರವಾರ, ಫೆಬ್ರವರಿ 15, 2019

डॉ. मोहम्मद आरिफ ने कहा कि ग़ालिब उर्दू साहित्य और साझी विरासत के सिरमौर है| भविष्य का भारत कैसा हो इसकी परिकल्पना ग़ालिब ने बनारस में बैठ कर ही महसूस की थी और ‘चराग-ए-दैर’ लिखकर उसे साकार किया है|

इसके बाद कार्यक्रम में यातना से संघर्षरत पीडितो ने सबके सामने अपनी स्व व्यथा कथा रखी और अपने संघर्षो के बारे में विस्तार से लोगों को बताया कि कितने संघर्षो व मानसिक यातनाओ के उपरांत उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद जगी है| ऐसे ही यातना से संघर्षरत 7 पीडितो को उनकी टेस्टीमनी और एक शाल देकर उनको सम्मानित किया गया|

इसी अवसर पर मानवाधिकार जननिगरानी समिति की मैनेजिंग ट्रस्टी श्रुति नागवंशी ने बताया कि ग्लोबल इंगेजमेंट, जर्मन सरकार व इण्डो जर्मन सोसाईटी (DIG), रेमसाईड, जर्मनी के आर्थिक सहयोग से मदरसों में शिक्षा की गुणवत्ता को और मजबूत करने के लिए वाराणसी के बजरडीहा व लोहता के 20 मदरसों में लाईब्रेरी स्थापित करने के लिए लाईब्रेरी की किताबे वितरित की गयी जिससे बच्चो को पाठ्य पुस्तक के अलावा अन्य माध्यम से पढ़ने लिखने का अवसर भी मिल सके जिससे उनकी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार हो सके| इसके साथ ही 10 मदरसों में किताबो की रख-रखाव के लिए आलमारी के साथ कुर्सी और मेज भी वितरित किया गया|

इस अवसर पर मदरसों के मैनेजमेंट सदस्य व प्रधानाचार्य के साथ ही समुदाय के भी लगभग 250 लोग उपस्थित रहे| इस कार्यक्रम का संचालन मानवाधिकार जननिगरानी समिति के सीईओ डा. लेनिन रघुवंशी ने किया और धन्यवाद मानवाधिकार जननिगरानी समिति के ट्रस्टी डा. महेंद्र प्रताप ने किया|

बंदर भगाने के लिए लाया गया लंगूर दो पिल्लों के प्यार में डूबा

बंदर भगाने के लिए लाया गया लंगूर दो पिल्लों के प्यार में डूबा!…लंगूर ने पाल लिए दो पिल्ले! ताजनगरी आगरा में एक लंगूर और दो पिल्लों के बीच पनपा प्यार चर्चा का विषय बना हुआ है. यहां एक लंगूर दो पिल्लों को मां की तरह प्यार करता है. लंगूर और पिल्ले कभी आपस मे अठखेलियाँ करते हैं तो कभी लंगूर मां की तरह अपनी गोद में उन्हें उठाकर प्यार करता है. ये कहानी है आगरा के कमला नगर पार्क की. यहां एक लंगूर को बंदरों को भगाने के वास्ते रखा गया है. पार्क में रहने वाला लंगूर पिल्लों को बेहद प्यार करता है. उनको खाना भी खिलाता है. कॉलोनी में रहने वालों ने बताया कि कॉलोनी की पार्क में कुछ महीने पहले एक कुतिया ने दो बच्चों को जन्म दिया. तब से ही ये दोनों पिल्ले लंगूर के साथ खेलते हैं और अठखेलियाँ भी करते हैं. -आगरा से फरहान खान की रिपोर्ट.

Bhadas4media ಅವರಿಂದ ಈ ದಿನದಂದು ಪೋಸ್ಟ್ ಮಾಡಲಾಗಿದೆ ಸೋಮವಾರ, ಫೆಬ್ರವರಿ 25, 2019
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