रजनीकांत की ‘कबाली’ और इरफान खान की ‘मदारी’ देखने लायक है या नहीं, दो पत्रकारों की ये राय पढ़िए

Om Thanvi : ‘कबाली’ देख कर आए हैं। मैं समीक्षा नहीं कर रहा। पर इतना कहूँगा कि निहायत बेतुकी, बेसिरपैर फ़िल्म है। हिंदी में यह चलेगी, मुझे शक़ है। रजनीकांत भले आदमी हैं। दक्षिण – ख़ासकर तमिलनाडु – के दर्शकों के लिए देवता हैं। लेकिन अभिनय की वजह से उतने नहीं, जितने अपनी स्टाइल-अदाओं के कारण। हिंदी में भी ऐसे बहुत-से सुपरस्टार स्टाइल-अदाओं से चले हैं। पर उन फ़िल्मों की सफलता में कथा-सम्वाद, गीत-संगीत, सहयोगी अभिनेता-अभिनेत्रियाँ साथ देते रहे।

रजनीकांत अपने सुपरमैन-मार्का करिश्मे में निपट अकेले चलते हैं। निश्चय ही फ़िल्म के मूल तमिल रूप में सम्वाद-संगीत भी बेहतर प्रभाव वाले होंगे। पर वहाँ भी उनके प्रशंसक उनके अलावा परदे पर शायद ही कुछ देखना चाहते हों। दिल्ली में ऐसे दर्शक हॉल में थे जो परदे पर उनके आते ही चीख़ने से अपने आप को रोक नहीं पाए। ऐसे समर्पित ‘फ़ैन’ किसी अभिनेता के न बॉलीवुड में मिलेंगे, न हॉलीवुड में। फिर भी मुझे लगता है अगर मनोरंजन मात्र के लिए हम फ़िल्म देखने जाते हों, तो ‘सुल्तान’ ‘कबाली’ से दस गुणा बेहतर साबित होगी! मित्रों, यह “समीक्षा” नहीं है। फ़ौरी राय है। यह बात ऊपर और स्पष्ट कर दी है। आप अपनी रुचि से देखें फ़िल्म।

Abhishek Srivastava : देख लिए Madaari लेकिन एक बात समझ में नहीं आई- मदारी कौन है। फिल्‍म की भावना का लिहाज रखते हुए कहा जा सकता है कि मदारी इसका नायक है जो हफ्ते भर तक सरकार को अपने इशारों पर नचाता रहता है। फिल्‍म जहां हमें छोड़ती है, वहां व्‍यापक फ़लक पर कह सकते हैं कि मदारी तो दरअसल सरकार ही है जो छोटे-मोटे मदारियों को इस व्‍यवस्‍था में रह-रह कर डुगडुगी बजाने का मौका भर देती है। बाकी, चलती उसी की है। अब आपके समझने का फेर है कि मदारी कौन है।

यह फिल्‍म दरअसल बंदर के बारे में है, मदारी के बारे में नहीं। बंदर जनता है, यह साफ़ है। जनता के बीच से निकले छोटे-मोटे मदा‍री भी जनता को ही नचाते हैं, संसदीय प्रणाली से निकले जनप्रतिनिधि भी। मीडिया भी जनता को नचाता है। जनता लगातार इनके इशारे पर नाचती है और उसके बीच से जब कोई छोटा-मोटा मदारी बड़े मदारी की नाक में दम करता है तो जनता खिखिया कर बंदर की तरह दांत चियार देती है। आयरनी यानी विडम्‍बना यह है कि बंदरों को उनकी औकात बताने वाला, आईना दिखाने वाला और कोई नहीं बल्कि सबसे बड़ा मदारी ही है- फिल्‍म का गृहमंत्री। मौके पर रघुवीर सहाय की कविता याद आती है- ”खतरा होगा/खतरे की घंटी होगी/उसे बादशाह बजाएगा, रमेश।”

बचे अपने इरफ़ान खान, तो उन्‍हें बाप-वाप का रोल नहीं करना चाहिए। उन्‍होंने अपने दर्शकों के भीतर खुद को इमोशनल शीशे में देखे जाने की आदत नहीं डाली है। इसलिए उनकी स्‍वीकार्यता एक दुखी बाप के रूप में बन नहीं पाती। उनके तीखे डायलॉग, सेंस ऑफ ह्यूमर और कटाक्ष भरी आवाज बाप के दर्द पर भारी पड़ जाते हैं। बीच-बीच में एक ”ओ री चिरैया” टाइप का फर्जी गाना माहौल को और नकली बना देता है। सबसे बड़ा जुलुम तो ये है कि इस नकली गाने के ठीक बाद इंटरवल रख दिया गया है। बाकी सबकी एक्टिंग ठीक है। हमारे समय के सबसे अंडररेटेड अभिेनेता जिमी शेरगिल को एक बार फिर पुलिसवाले के रूप में देखकर इस इंडस्‍ट्री की रवायत पर अफ़सोस होता है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और अभिषेक श्रीवास्तव की एफबी वॉल से.

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