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सियासत

40 जवानों की शहादत ने मुझे जरा भी विचलित नहीं किया : दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’

Daya Sagar : पुलवामा में 40 जवानों की शहादत ने मुझे जरा भी विचलित नही किया। जब मौतें इकठ्ठा होती है तो संख्या बड़ी दिखती है। पिछले करीब चार साल से कश्मीर में औसतन हर हफ्ते एक सैनिक मरता है और उसकी लाश खामोशी से ताबूत में रख कर उसके घर भेज दी जाती है। तब टीवी चैनल सिर्फ टीज़र में खबर निपटा देते है। क्या वे सैनिक सैनिक नही थे। क्या सामूहिकता शहादत को ज्यादा महान बना देती है? जम्मू में रहते मुझे हैरत होती थी कि कोई देश इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है। शांतिकाल में भी बार्डर पर हमारे सैनिक रोज मर रहे हैं और किसी को कोई परवाह नही। लिख लिख कर थक गया और अंत में मैने हथियार डाल दिये।

यकीन मानिए इन मौतों के लिये पाकिस्तान जिम्मेदार नही। दुश्मन से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो आपको कोई नुकसान नही पहुँचायेगा। इसके लिये जिम्मेदार हमारे ही देश की राजनीति है। मोदी की कश्मीर और पाकिस्तान की नीति वही है जो नेहरू की थी और अटल की थी।

केंद्र की तरीबन हर सरकार ने अलगाववादियों को पालने का काम किया है। मंत्रालय में बैठे अफसरों ने समझा रखा है कि कश्मीर को शांत रखना है तो अलगावादियों को मत छेड़ो। जबकि सच ये है कि इन अलगावादियों को आम कश्मीरी भी इज़्ज़त की नज़र से नही देखता।

अब आप देखिये पिछले दो साल से सुप्रीम कोर्ट 35A पर सुनवाई शुरू करने के लिये केंद्र और राज्य सरकार से रिपोर्ट मांग रहा है और सरकार अलगावादियों के दबाव में मंजूरी नही दे रही।

कश्मीर में मैं सैनिक कैम्पों में रहा हूँ। एक सैनिक को अकेले बाजार जाने तक की इजाज़त नही। बिना लोकल पुलिस के वे कोई कार्रवाई नही कर सकते। एक आतंकी की मौत पर लाखों की भीड़ उसके जनाजे में शामिल होती है। यही ग्लैमर देख कर नए आतंकी पैदा होते है। सेना, सीआरपीएफ यहाँ तक कश्मीर पुलिस केंद्र सरकार को लिख चुकी है कि आतंकी की लाश उसके घर वालो को न दी जाए। लेकिन पीएमओ इस फ़ाइल पर आज तक निर्णय नही ले सका।

तो आप देखिये दुःख और ग़म के इस माहौल में भी सब अपने काम कर रहे है। मोदी जी चुनावी रैलियां कर रहे हैं। जेबकतरे उनकी रैलियों में लोगों की जेबें साफ कर रहे हैं। राहुल भी पूरी संजीदगी से विपक्षी दल की भूमिका निभा रहे हैं। तेजस्वी यादव आलीशान बंगला छोड़ कर छोटे सरकारी आवास में शिफ्ट हो रहे हैं। टीवी चैनल वाले टीआरपी टीआरपी खेल रहे है।
ऐसे में ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है

ग़ालिब’-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ.

जम्मू में अमर उजाला के संपादक रह चुके वरिष्ठ पत्रकार दयाशंकर शुक्ल ‘सागर’ की एफबी वॉल से.

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