मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता की खुफिया जांच जारी

भोपाल। व्यापम घोटाले के चलते ही एक और घोटाले की जाँच खुफिया तौर पर गृह विभाग के आदेश से शुरू हो गई है। जनसपंर्क संचालनालय में स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता को लेकर खींचतान मची है। मुख्यमंत्री से लेकर जनसंपर्क आयुक्त और अधिकारियों से इस संबंध में प्रदेश के पत्रकारों ने शिकायत करते हुए जानकारी मांगी है।  बताया जाता है कि पिछले कुछ वर्षों में स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता को लेकर भारी बवाल मचा हुआ है। विधान सभा में इस संबंध में प्रश्न भी पूछे गये थे।

सूत्रों का कहना है कि इस संबंध में कथित पत्रकारों को इस श्रेणी में अधिमान्यता दिये जाने की शिकायत की गई थी। गृह विभाग ने इस संबंध में खुफिया जाँच के आदेश दे दिए है। खुफिया विभाग को जानकारी मिली है कि स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता के नाम पर रेलवे में रियायत के लिए एक गिरोह के काम करने के भी संकेत खुफिया विभाग को मिले है। गोपनीय तौर पर चल रही खुफिया विभाग की जाँच के बाद स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता में सख्ती बरती जा रही है। इस सख्ती के चलते गेहूँ के साथ घुन पिसने की कहावत भी चरितार्थ हो रही है। स्वतंत्र पत्रकारों की राज्य स्तरीय अधिमान्यता की खींचतान में उन पत्रकारों का नुकसान हो रहा है जो 30 साल से अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे हैं। ऐसे वरिष्ठ पत्रकारों ने अधिमान्यता को लेकर मुख्यमंत्री स्तर पर शिकायत की है।



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Comments on “मध्य प्रदेश के स्वतंत्र पत्रकारों की अधिमान्यता की खुफिया जांच जारी

  • दरअसल हर राज्य में अधिमान्य पत्रकारों के नाम पर दुकानदारी चल रही है। राजस्थान और मध्यप्रदेश की सरकार ने पत्रकारों को जब लैपटाप बांटे तो 80 प्रतिशत छोटे अखबारों के मालिकों और उनके परिजनों. एवं कथित स्वतंत्र पत्रकारों ने हडप लिये। जो पत्रकार फील्ड में हैं लेकिन अधिमान्य नहीं है उनके हाथ कुछ नहीं लगा। सच्चाई यही है कि कथित स्वतंत्र अधिमान्य पत्रकार वर्षों पहलेे पत्रकारिता छोड चुके हैं। कभी कभार किसी अखबार के लिये कुछ लिखकर अपनी मौजूदगी का एहसास कराते रहते हैं अन्यथा आराम से घर बैठे हैं। ऐसा हर जिले में है। वास्तव में डैस्क और फील्ड में कार्यरत पत्रकारों को ही पत्रकार की श्रेणी में मानना चाहिए। सही कौन है और गलत और इसकी पुष्टि आसानी से जनसम्पर्क कार्यालय में की जा सकती है। साला. यहां सालों से खट रहे हैं। अधिमान्य बनना है तो जनसम्पर्क अधिकारी के चरणवंदना करो। यह गवारा नहीं है हमें। मेरे शहर में ही एक छोटा अखबार जिसकी 100 प्रतियां नहीं बिकती होंगी अधिमान्यता के नाम पर पति पत्नी दोनों ने लेपटाप उठा लिये। कुछ स्वतंत्र पत्रकार थे जिन्हें पत्रकारिता छोडे ही 15 साल हो गये। उसी दौरान ऐसे अधिमान्य पत्रकारों के नाम भी सामने आये जिनका नाम तक इतने सालों तक नहीं सुना न ही कभी प्रेस कांफेंस में उन्हें देखा। अगर मध्यप्रदेश सरकार जांच करवा रही है तो अच्छा ही कर रही है। राजस्थान में भी ऐसा ही होना चाहिए।

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  • PRAVEEN SHUKLA says:

    जो फर्जी अधिमान्यता बने हैं उन्हये ख़तम करके जो असली हक़दार है सरकार उन्हये अधिमान्य करें और जिसने कभी पत्रकार लाइन मैं काम ही नहीं किया उन लोगो को अधिमान्यता का सर्टिफिकेट सरकार ने दे कर गलत किया और जो बाकइ मैं अधिमान्यता के स्वतंत्र पत्रकार और फोटोग्राफर हैं जिनहे इसकी बहुत जरूरत है बे बेचारे परेशांन होते रहते हैं जबकि मध्य प्रदेश शासन को यह चाहिए की जिनको इसकी बहुत जरूरत है उनको अधिमान्यता किया जावे

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