ज़ी चैनल वाले मुसलामानों को ज़लील करने के लिए ही डिबेट कराते हैं!

और कितना बेइज़्ज़त होगे?

मंगलवार (17 जुलाई 2018) की शाम, ज़ी हिंदुस्तान न्यूज़ चैनल का स्क्रीन, एक मुफ्ती और एक मुस्लिम महिला वकील के बीच हाथापाई से सुर्ख़ियों में था। मुफ़्ती एजाज़ अरशद कासमी और फराह फ़ैज़ के बीच घूंसे और तमाचे चलते देखा और फिर मौलवी के हाथों औरत की पिटाई की फ़रियाद करती एंकर की शोला बयानी करते देखा तो बेबसी से दिल बुझ गया।

क्या हाल कर लिया है हमने अपना? और कितनी हमारी भद पिटेगी? वीडियो देखिये, तो साफ़ पता चलता है कि पहला चांटा फरहा फैज़ ने ही मारा था, हालाँकि मुफ़्ती ने इससे पहले उस महिला से खूब बहस की, लेकिन भारी शोरगुल की वजह से कुछ समझ में नहीं आया कि किसने किसको क्या कहा? हाँ, पहले चांटे के बाद मुफ़्ती साहब ने एक, दो, तीन लगातार चांटे जड़ दिए। अगर बीच बचाव नहीं होता तो हालात और भी खराब होते।

मेरा दिल इस घटना पर शर्म और ज़िल्लत से रो रहा है। हालात पर सौ आंसू बहा रहा है। ये आँसू हमारी कौम की आँखों से उतर चुके पानी पर भी ग़मगीन है। लेकिन इसके अलावा और कर भी क्या सकता है? कई बार मुझसे कहा जाता है कि मौलवियों पर ज़रा नरमी से लिखो। लेकिन ऐसे हालात में चाह कर भी मैं अपनी कलम को सख्त होने से रोक नहीं पाता हूँ। मेरे सामने मेरी कौम की इज़्ज़त का जनाज़ा पड़ा है और इस जनाज़े में आखिरी कील ठोकने वाले अपने ही लोग आगे-आगे हों तो ऐसी सूरत में मैं मातम न करूँ तो क्या करूँ?

आज दिल की हालत ऐसी है कि अगर कुछ विस्तार में लिखा तो जाने क्या क्या लिख बैठूंगा। इसलिए मौलवियों के सिलसिले में कुछ बातें ही करूँगा:-

1) जब तुम जानते हो कि ज़ी चैनल वाले मुसलामानों को ज़लील करने के लिए ही डिबेट कराते हैं। तुम्हारी ऑडियो लो रखते हैं, तुम्हें ज़्यादा बोलने नहीं देते हैं, एक-एक शब्द पर तुम्हे ज़लील करते हैं, तुम्हारी आड़ में मुसलामानों को नीचा दिखाने का कोई प्रयास छोड़ते नहीं हैं तो वहां खुद भी और पूरी कौम को ज़लील करवाने के लिए जाते क्यों हो? पैसों की लालच है या टीवी पर अपनी शक्ल दिखवाने की ललक?

2) टीवी चैनल एक प्रोपेगेंडा के तहत रोज़ हिन्दू मुस्लिम पर डिबेट कर रहे हैं ताकि जनता का ध्यान सरकार की नाकामियों से हटा रहे और बेरोज़गारी और गरीबी के सवाल न उठे। तुममे इतनी भी समझ नहीं कि इस प्रोपेगैंडा को समझ सको? अगर समझने के बावजूद जा रहे हो तो मुझे यह कहने में कोई गुरेज़ नहीं कि तुम भी इस प्रोपेगेंडा का हिस्सा हो।

3) जब टीवी पर मज़हब के नाम पर ज़हर घोला जा रहा है तो ऐसी परिस्थिति में तुम समाजी सतह पर गैर मुस्लिम भाइयों के साथ कौम के अच्छे रिश्ते बनाने के लिए क्या कदम उठा रहे हो? क्या तुम बोलने के अलावा कुछ कदम भी उठाने का प्रयास कर रहे हो? या फिर तुम नफरत के इस प्रीमियर लीग के महज़ चीयर लीडर बन कर तो नहीं रह गए हो?

4) क्या तुमने कसम खा ली है कि टीवी पर बैठ कर अपनी अज्ञानता और मूर्खतापूर्ण बातों से गैर मुस्लिम भाइयों के दिलों में इस्लाम के लिए नफरत पैदा करोगे और हिन्दू वोट के ध्रुवीकरण में उनकी मदद करोगे? ऐसा करके तुम किसकी मदद कर रहे हो, कभी सोंचा भी है?

5) बरेली के मुफ्ती तीन तलाक की याचिका गुज़ार लड़की का हुक्का-पानी बंद करने, बीमार हो तो दवा न देने और मर जाए तो दफनाने के लिए जगह न देने का फतवा देता है और शाम को टीवी पर अपनी रक्षा में कहता है कि मैंने जो कहा वह पैगंबर का आदेश है और मुस्लिम शरीफ में ऐसा ही लिखा गया है। ऐसे मुफ़्ती के लिए मेरे दिल में कोई जगह नहीं है जो इस्लाम की बातों और दुनिया भर की दबी कुचली और शोषित महिलाओं को अधिकार दिलाने वाले पैगम्बर की बातों को तोड़ मरोड़ कर पेश कर रहा हो। ज़रा गौर कीजिये उस जाहिल मुफ़्ती ने अपनी अज्ञानता को सही साबित करने के लिए किस तरह पैगम्बर इस्लाम की शिक्षाओं को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है और गैर मुस्लिमों के दिलों में इस्लाम की गलत तस्वीर प्रस्तुत की है।

मुझे पता है कि इस वक़्त टीवी चैनल वाले अघोषित रूप से गुंडागर्दी पर आमादा हैं। उनका मिशन ही है कि देश को धार्मिक ज़हर में डुबो देना। लेकिन मुझे इन चैनलों से कुछ नहीं कहना है जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो किसी और से क्या शिकायत? उम्मीद करता हूँ शायद मेरे शब्द इन मौलवियों के दिलों में उतर जाएँ और टीवी डिबेट में धर्म के नाम पर आग लगाने वाले चैनलों का बाइकाट करें ताकि फिर से देश में अमन कायम हो सके।

चिंतक अलामुल्ला इस्लाही की एफबी वॉल से.

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