अब तो ज़िंदा रह जाना ही उपलब्धि है, सवा माह में दो नौजवान ‘राजा’ चल बसे!

पंकज कुमार झा-

इस बार की दीपावली हम सबके लिए अति अत्यधिक विशिष्ट है। जानते हैं क्यों? यह इसलिए क्योंकि हम सभी जीवित हैं। वास्तव में इस दौर में ज़िंदा रह जाने से बड़ी उपलब्धि और कोई हो सकती है क्या?

इस साल भर में ऐसे लाखों या शायद करोड़ों लोग काल-कवलित हुए जिनके मरने का कोई कारण नहीं था। कोरोना अपनी जगह, बहाने भले वह बीमारी हो लेकिन इससे दिवंगत हुए अच्छे-तगड़े स्वस्थ लोगों के बारे में जान कर अज़ीब लगता रहा हम सबको लगातार। जबकि अनेक बीमार और उम्रदराज कमजोर लोग भी ईश्वर की कृपा से इस वायरस से जीत कर जीवित रहे। यानी कोई तर्क नहीं था किसी के ज़िंदा रहने या मर जाने के पीछे।

छत्तीसगढ़ से हूं मैं। यहां केवल इस माह, सवा माह के दौरान ही प्रदेश में दो ‘राजा’ चल बसे। एक खैरागढ़ रियासत के तो दूसरे महान जशपुर रियासत से। दोनों युवा। जूदेव जी तो तीस से कुछ ही अधिक थे। विधायक देवव्रत भी अच्छे खिलाड़ी और फ़िट। फिर भी…

सो…. सो हमारा-आपका क़ायम रह जाने से बड़ी उपलब्धि फ़िलहाल कोई हो ही नहीं सकती। संकट खैर अभी भी टला नहीं है, फिर भी थोड़ी राहत तो है ही। तो तैयारी हमेशा रहे। दुनिया भर को दौलत खड़ा करते रहने की हवस को थोड़ा विराम दें वे लोग ख़ास कर जिन्होंने सात-दस पुश्तों के लिए एकत्र कर लिया है। अब जीना शुरू कर दें। शौक़ पूरे करें। जीवन में वह सब कुछ पसंदीदा करें जो करना रह गया था वक़्त की आपाधापी में। समाज के लिए कुछ बेहतर करना शुरू करें।

हम सबको अपने इस ‘नए’ जीवन को ईश्वर की दी हुई अतिरिक्त कृपा मानते हुए, एक ट्रस्टी की तरह जीना शुरू करना चाहिए। यह बिल्कुल सही है कि कभी मौत आएगी या नहीं आ पायी इसे सोच कर हम अपना उत्साह खो दें, इसकी ज़रूरत नहीं है। उल्टे और अधिक उत्साह के साथ जीना शुरू करें। खूब आनंद लें जीने का। खुल कर जीएँ। जी भर मस्ती करें। बस अपना ‘हिसाब-किताब’ दुरुस्त रखें।

किसी भी क्षण बुलौआ आ सकता है इसे सोचते हुए मानसिक तैयारी रखें। घर परिवार, बाल बच्चों का काम निपटा कर, जिनके साथ कुछ ग़लत किया हो कभी, उनसे माफ़ी मांग कर, जिनसे कभी पीड़ित रहे हों, उन्हें माफ़ कर जीवन को एक अतिरिक्त पारी की तरह पूरे उत्साह और उमंग के साथ जीना शुरू करें। ईश्वर के प्रति अधिक से अधिक कृतज्ञ होकर एक दर्शक की तरह जीएँ, एक त्यागी की तरह भोगें, एक स्थितिप्रज्ञ की तरह झेलें और एक कर्मयोगी की तरह अपने कर्मों को योग समझ कर, पूजा समझ कर करते चले जायें।

आप ज़िंदा हैं आज भी, तो निश्चित ही यह आपके किसी जन्मों मेन कुछ संचित कर्म है जिसका भुगतान आपको लेना है या भुगतना है। खूब कृतज्ञ रहिए और आनंद कीजिए।

आयेगा जब रे बुलावा हरी का, छोड़ के सब कुछ जाना पड़ेगा….

शुभ कामना।

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