मैं महज़ 33 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े मीडिया समूह में सम्पादक बन गया

सवाल – पत्रकारिता के क्षेत्र में आपका आगमन कैसे हुआ? सम्वाददाता से सम्पादक तक का आपका सफ़र कैसा रहा?

एलएन शीतल – मैंने कक्षा 10 में ही तय कर लिया था कि मुझे पत्रकार ही बनना है। करिअर के रूप में पत्रकारिता ही मेरा पहला और अन्तिम विकल्प रही। सन् 1974 में, जब हम दसवीं कक्षा के सभी विद्यार्थी स्कूल से विदा हो रहे थे, हमारे क्लास टीचर ने सबसे पूछा कि वे क्या बनना चाहते हैं? लगभग प्रत्येक छात्र-छात्रा ने डॉक्टर, इंजिनीअर, या प्रशासनिक अधिकारी बनना चाहा। लेकिन मेरा जवाब था – ‘पत्रकार।’ कारण पूछा गया तो मैंने अपनी तबकी समझ के मुताबिक़ जवाब दिया – ‘इस पेशे में बेवज़ह ‘सर’  नहीं कहना पड़ता, और समाज के लिए कुछ करने के अवसर अपेक्षाकृत ज़्यादा होते हैं।’

जब मैं 1980 में पत्रकारिता में आया, तब सभी नव आगन्तुक नौजवान सम्वाददाता बनने को आतुर नहीं रहते थे। चूँकि मेरा लक्ष्य एक बड़े अखबार का सम्पादक बनना था, और उस दौर में उप सम्पादक ही अन्ततः सम्पादक बना करते थे, इसलिए मैंने सम्वाददाता बनने की बजाय उप सम्पादक बनना पसन्द किया। ईश्वर की कृपा से मैं महज़ 33 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े मीडिया समूह में सम्पादक बन गया। मैंने अपना करिअर उस समय के सबसे बड़े हिन्दी अखबार ‘पंजाब केसरी’ में उप सम्पादक के रूप में शुरू किया था, और महज़ तीन साल में मुझे दो संस्करणों का प्रभारी बना दिया गया था। केवल अनवरत आत्म-विकास, ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास, और अथक मेहनत के बूते ही मैं सम्पादक बन सका।

सवाल – एक पत्रकार के रूप में आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
एलएन शीतल – सन् 2003 में छत्तीसगढ़ में, और सन् 2007 में उत्तराखण्ड में सत्ता परिवर्तन के जरिये जनता को बेहतर राजनीतिक विकल्प देने में निर्णायक मदद की। जनहित में कोई भी सही ख़बर छापने से कभी नहीं चूका। भले ही वे ख़बरें किसी जज के खिलाफ ही क्यों न रही हों। इसी के चलते मध्य प्रदेश हाइकोर्ट और दिल्ली हाइकोर्ट में अदालत की अवमानना के मुकदमे झेले, और अन्ततः दोनों मामलों में विजयी हुआ।

सवाल – हिन्दी पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में आपकी क्या राय है?
एलएन शीतल – पहले का पत्रकारिता-जगत साहित्यकारनुमा लोगों से भरा पड़ा था। तथ्य कम होते थे, भावनाएँ ज़्यादा होती थीं। देश और समाज के प्रति ज़िम्मेदारी का जज्बा भी ज़्यादा था। तब महज़ ‘धन्धा’ नहीं थी पत्रकारिता। साज सज्जा में बहुत पीछे थे अखबार। आज की पत्रकारिता केवल ‘धन्धा’ है। अन्य अनेक धन्धों की तरह इसमें भी काले धन का वर्चस्व है। कालेधन को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाने की अन्धी होड़ में लगे लोगों का कब्ज़ा मीडिया के एक बड़े हिस्से पर हो चुका है। ज़्यादातर हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में सम्पादक बिज़नेस और सेल्स मैनेजर के रूप में ढल चुके हैं। विज्ञापन देने वाली ‘मोटी पार्टियों’ के कालिख पुते चेहरों को चमकाने, उनके टारगेट पर आयी ‘शत्रु पार्टियों’,  और विज्ञापन नहीं देने वाली ‘पार्टियों’ के चेहरों पर कालिख पोतने का दौर है यह। ऐसे दौर में सूचनाओं की बाढ़ आ जाती है। झूठी, सच्ची, भ्रामक; यानि कैसी भी। आज मीडिया में आने का इच्छुक हर नौजवान इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ही जाना चाहता है। अगर वह मज़बूरी के चलते प्रिंट मीडिया में आता भी है तो उसे किसी भी कीमत पर सम्वाददाता ही बनना होता है। उसकी यह दीवागनी भरी चाहत ही हिन्दी पत्रकारिता का असली अभिशाप है। इसके चलते अखबारों के डेस्क कमज़ोर हुए हैं, हिन्दी का कबाड़ा हुआ है। यदि हिन्दी पत्रकारिता में यही सिलसिला जारी रहा तो इसका चेहरा और स्याह होगा। यदि इसकी दिशा-दशा को ठीक रखना है तो पूंजी-निवेश, श्रमशक्ति-नियोजन, समाचार-संयोजन आदि सभी पहलुओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।

सवाल – अपने जीवन में आप किस व्यक्ति से सबसे ज़्यादा प्रभावित हैं?
एलएन शीतल – महात्मा कबीर।

सवाल – आप अपने परिवार के बारे में पाठकों को क्या बताना चाहते हैं? आपके करिअर में आपके परिजनों की क्या भूमिका है?
जवाब – मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक गाँव में एक बेहद ग़रीब परिवार में पला-बढ़ा। मेरे प्रति मेरी पूज्य माँ के बेमिसाल समर्पण और अथक संघर्ष का बेहद अहम योगदान है मेरे जीवन में। मेरी बेटी बैंक मैनेजर है, और मेरा बेटा एक सरकारी कम्पनी में अधिकारी है। दोनों शादीशुदा हैं, और भोपाल में रहते हैं। मेरी पत्नी की सादगी और समर्पण हमेशा ही मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। सचमुच बेइन्तिहा प्यारा परिवार है मेरा, जो पत्रकारिता के मेरे चुनौती और संकट भरे जीवन में मुझे हमेशा सम्भाले रहा, सहेजे रहा।
 
सवाल – एक पत्रकार के रूप में आपकी शक्ति क्या है, कमज़ोरी क्या है?
एलएन शीतल – पत्रकारिता की विधा और हिन्दी भाषा पर मज़बूत पकड़, बेहतरीन प्रशासनिक क्षमता, अत्याधुनिक संचार माध्यमों की गहरी समझ, और जनपक्षधरता मेरी शक्ति हैं। कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा स्वाभिमानी बन जाना, और चापलूसी के इस युग में, चापलूसी के हुनर में बेहद कमज़ोर होना ही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी हैं। मैं बहुत प्रयास करने के बावजूद चापलूसी के हर इम्तिहान में बुरी तरह से नाकाम रहा हूँ, जिसका मुझे भारी खामियाज़ा उठाना पड़ा।
 
सवाल – “वाणिज्यिक कारणों से पत्रकार दबे हुए हैं”, इस कथन में कितनी सच्चाई है? क्या पत्रकार दवाब में हैं?
एलएन शीतल – जी हाँ, पत्रकार वाणिज्यिक कारणों से दबे हुए हैं – ‘निजी’ वाणिज्यिक कारणों से ज़्यादा, और संस्थागत वाणिज्यिक कारणों से थोड़ा कम। पत्रकारिता का ध्येय वाक्य है – ‘सच की इबादत ख़बर के जरिये’। लेकिन आज पत्रकारिता महज़ एक धन्धा है। ख़बर के जरिये दौलत के टापू बनाने और अपना प्रभुत्व स्थापित करने का। जब पत्र-पत्रिकाओं के मालिक ही नोट कमाने में सही-गलत का फ़र्क भुला दें, तो जो पत्रकार उनकी धन-सत्ता की लिप्सा को पूरा करने के औजार बने हैं, वे अपने खुद के लिए कमाने में क्यों पीछे रहेंगे? वे बड़े धन्धेबाज हैं, तो ये छोटे। करीब 15 साल के करिअर वाला एक टीवी पत्रकार एक ‘ईमानदार’ सियासी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है, और उसने अपनी सम्पत्ति चार करोड़ से ज़्यादा की घोषित की है। पत्रकारिता के नाम पर वह क्या करता रहा होगा, इसे सहज ही समझा जा सकता है।
 
सवाल – टीवी और ऑनलाइन पत्रकारिता के इस युग में प्रिंट मीडिया की क्या अहमियत है?
एलएन शीतल – जैसे, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथी, और एलोपैथी का अपना-अपना महत्व है, और अपनी-अपनी सीमाएं; ठीक वैसे ही प्रिंट मीडिया की स्थिति है। आज भी तथ्य और कथ्य के प्रति अपनी संजीदगी और ज़िम्मेदारी के मामले में प्रिंट मीडिया की साख टीवी और ऑनलाइन पत्रिकारिता से कहीं ज़्यादा है। टी वी और ऑन लाइन वाले फास्ट या जंक फूड की तरह हैं, जो अन्ततः सेहत के लिए नुकसानदेह होता है; जबकि प्रिंट मीडिया तसल्ली से बने सुस्वादु और स्वास्थ्य वर्द्धक भोजन जैसा। टीवी के पास समय ही समय होता है, और ऑनलाइन वालों के पास स्पेस ही स्पेस होता है, इस लिए वे कुछ भी ‘आंय बांय सांय’ बोलते और प्रसारित करते हैं, जबकि प्रिंट मीडिया ज्यादा संजीदगी से चीज़ों को लेता है। उसके पास ‘डिलीट’ का विकल्प नहीं होता।
 
सवाल – पत्रकारिता में भाषा का क्या महत्व है? क्या पाठकों को लुभाने के लिए भाषा को अनदेखा किया जा सकता है?
एलएन शीतल – किसी भी अखबार के बारे में भाषा के आधार पर ही कहा जाता है कि फलां अखबार हिन्दी का है, कि कन्नड़ का है, कि अँगरेज़ी का है। इसी से समझ लीजिए कि पत्रकारिता में भाषा का महत्व कितना ज़्यादा है। एक बात समझ में नहीं आती कि जब देश के सभी हिस्सों में अँगरेज़ी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान हैं, आईपीसी-सीआरपीसी एक समान हैं, और ट्रैफिक सिग्नल एक समान हैं, तो फिर हिन्दी शब्दों की वर्तनियाँ एक समान क्यों नहीं हैं। हिन्दी के बूते दौलत के टापू बनाने वाले, हिन्दी के जरिये अपना पेट पालकर शान बघारने वाले और अन्य अनेक तरीकों से हिन्दी के नाम पर धन्धेबाजी कर रहे लोग भूल जाते हैं कि जो क़ौमें अपनी भाषा नहीं बचा पातीं, वे एक दिन दफ़्न हो जाया करती हैं। पाठकों को लुभाने के लिए हिन्दी को पंडिताऊ जकड़न से मुक्त करके उसे आमफ़हम तो बनाया जाना चाहिए, तर्कसंगत तरीके से उसका शब्द-आधार भी बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन उसकी शुद्धता की अनदेखी हरगिज़ नहीं की जानी चाहिए।

(भारतीय रिज़र्व बैंक की गृह पत्रिका में वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल का प्रकाशित इण्टरव्यू)

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Comments on “मैं महज़ 33 साल की उम्र में देश के सबसे बड़े मीडिया समूह में सम्पादक बन गया

  • rajkumar gwalani says:

    शीतल जी के साथ हरिभूमि रायपुर में कुछ समय काम करने का मौका मिला था। इनके विचार जानकर अच्छा लगा। हमने अपने 25 साल के पत्रकारिता जीवन में ऐसे विचारों वाले काफी कम पत्रकार और संपादक देखें हैं। शीतल जी को उनके ऐसे विचारों के लिए साधुवाद।

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  • maheshwari mishra says:

    स्वभाव के बारे में पूछना तो भूल गए। शीतल जी जल्द ही अपनी शीतलता खो बैठते है। फिर चाहे वह चपरासी हो, कर्मचारी हो, उपसंपादक हो, पत्रकार हो या मालिक जल्द ही हर बात को अपने इगो से जोड़ लेते है। शीतल जी शाम को यदि रात कहे और कोई शाम कहे तो फिर चेहरे और आवाज की शीतलता देखने लायक होती है। हां इतना जरूर है कि दूसरे दिन या कुछ घंटों के बाद ये शीतलता वापस आ जाती है। किसी को शीतल जी दोस्ती करना हो तो वश उनसे चर्चा करो और उनकी दलील का खंडन करों फिर झपड और दूसरे दिन दोस्ती पक्की।

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  • atul saxena says:

    मैंने पत्रकारिता के अपने 24 साल के जीवन में जो भी कुछ सीखा आदरणीय शीतल जी से ही सीखा … और आज भी उसे ही अपनाकर आगे बढ़ रहा हूं …

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  • kirti pant says:

    Padhkar bahut accha laga. Lekin patrakar bhi kahin na kahin bebas ho jata hai. Jab uski pratibha ko upar baithye log jantye hue bhi nakartye hai. Aisye me ek adna patrakar karey to kya karye

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  • indrajeet singh gaur says:

    sheetal ji muje kewal eak sal hi patrkarita KARTE hua he aaj thoda sa samjh me aaya ki kya he patrkarita…….bahut hi achha laga sheetal ji ke bare me jankar

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  • archana chaturvedi says:

    इसी प्रेरणा को लिए मैं भी इस लाइन में आई … पर नौकरी की तलाश में दर-दर भटकना पड़ रहा है… क्योकि किसी से जान-पहचान नहीं है.. खैर आपकी कहनी पढ़कर फिर से कुछ कर गुजरने का शौक जागा है।

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