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लोकतंत्र की चोरी को लेकर अखिलेश चुप रह जाते तो इतने एक्शन नहीं लिए जाते : रवीश

रवीश कुमार-

मतगणना शुरू होने से पहले बनारस, सोनभद्र, बरेली और संत कबीरनगर में अलग अलग मामलों में अधिकारियों को निलंबित किए जाने, हटाए जाने और मुकदमा दर्ज करने की ख़बर आई है। इन सभी घटनाओं ने दस मार्च की गिनती को लेकर लोगों के भरोसे को झकझोर दिया है। मेरा सवाल है कि जिन चीज़ों को सपा के कार्यकर्ताओं ने उजागर किया है, उसे मतगणना से जुड़े अधिकारियों ने क्यों नहीं पकड़ा। ये अधिकारी क्या कर रहे हैं। क्या प्रशासन रात भर नहीं जाग रहा, क्या वह नज़र नहीं रख रहा कि कहीं कोई चूक न हो जाए। तब फिर यह शक क्यों नहीं किया जाए कि अधिकारी कुछ गड़बड़ कर सकते हैं। चुनाव आयोग ने किसी को हटाया, किसी को निलंबित किया ठीक है लेकिन उसे इन सभी को बर्खास्त करना चाहिए। ऐसी हरकतों से आयोग की साख कमज़ोर होती है। इसलिए इसकी सज़ा निलंबन और तबादले जितनी नरम नहीं होनी चाहिए।

अखिलेश यादव के लिए प्रेस कांफ्रेंस कर सवाल उठाना आसान नहीं था। उन्हें पता होगा कि गोदी मीडिया का तंत्र हमला कर देगा। वही हुआ भी। अखिलेश ने ईवीएम पर सवाल नहीं उठाए थे बल्कि प्रशासन की लापरवाही और मिलीभगत का आरोप लगाया था।अखिलेश यादव का आरोप था कि मुख्यमंत्री के मुख्य सचिव ज़िलाधिकारियों को मौखिक निर्देश दे रहे हैं कि जहां बीजेपी का उम्मीदवार हार रहा हो या अंतर पांच हज़ार से कम हो, वहां धीमी गति से गिनती कराएं। अखिलेश ने कहा कि इसके पुख्ता सबूत हैं।

बिहार में धीमी मतगणना और बाद की कुछ सीटों पर परिणाम पलटने के आरोप आज तक लगाए जाते हैं। इस संदर्भ में आयोग को आगे आना चाहिए और पूरी सूची देनी चाहिए कि कहां कहां पर ईवीएम पहले से ज्यादा है औऱ कहां कहां पर कितना समय लगेगा, बल्कि आयोग को इसका विज्ञापन अखबारों में छपवाना चाहिए ताकि लोग संदेह न करें। अखिलेश यादव की प्रेस कांफ्रेंस के बाद गोदी मीडिया ऐंकर चिल्लाने लगे कि हार रहे हैं इसलिए ईवीएम का रोना रहे हैं जबकि अखिलेश ने आरोप कुछ और लगाए थे।आख़िर आयोग ने गड़बड़ी पाई तभी तो कार्रवाई हुई है। मतगणना से संबंधित किसी भी प्रक्रिया में चूक क्यों होनी चाहिए। खासकर ऐसे माहौल में जब चुनाव आयोग की भूमिका भी मुद्दे का रूप ले चुका है।

बड़ी चूक बनारस में हुई है।अखिलेश यादव ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि चुनाव आयोग का निर्देश है कि किसी कारणवश ईवीएम को दूसरी जगह पर ले जाया जाता है तो उसकी सूचना सभी दलों को देनी है। सभी सहमत होंगे तभी व्यापक सुरक्षा में ईवीएम को दूसरी जगह पर ले जाया जाएगा। इसकी सूचना नही दी गई। ज़िलाधिकारी ने भी माना कि ईवीएम को 9 तारीख की सुबह ट्रेनिंग के लिए निकालना थ।एडीएम ने जिलाधिकारी को बिना जानकारी दिए 8 तारीख की शाम को निकाल दिया जिसे समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता ने पकड़ा और बवाल हुआ। एक शाम पहले ट्रक में भर कर ईवीएम कैसे निकाली जा सकती है? क्यों नहीं संदेह करना चाहिए कि इरादा कुछ गलत करने का था? आज एडीएम आपूर्ति नलिनी कांत सिंह को चुनाव आयोग ने संस्पेंड कर दिया है।

सोनभद्र के एस डी एम को हटाया गया है। यहां सपा कार्यकर्ताओं ने दो ट्रक पकड़े जिसमें बैलेट पेपर थे। अधिकारी ने कहा कि सादी पर्चियां थीं। इनका इस्तमाल नहीं हुआ था। फिर खबर आई कि एस डी एम को हटा दिया गया। जिस तरह से बैलेट पेपर को लेकर अफ़वाह उड़ी है, उसे देखते हुए आयोग को आगे आकर भरोसा देना चाहिए कि गड़बड़ी नहीं होगी।चुनाव के दौरान भी बैलेट पेपर को लेकर कई ख़बरें आती रहीं जिसे लोगों ने ध्यान नहीं दिया लेकिन अब तो हर ऐसी आशंका से भगदड़ मचने लग जाएगी। इसलिए आयोग को बैलेट पेपर की गिनती को लेकर और अधिक पारदर्शिता बरतनी चाहिए, नई व्यवस्था बनानी चाहिए ताकि नतीजे के साथ साथ आशंकाएँ भी उसी समय ख़त्म हो जाएँ।

संत कबीरनगर में एक सरकारी कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा दायर हुआ है। उसे निलंबित भी किया गया है। ज़िलाधिकारी का दिव्या मित्तल ने ट्विट है कि खलीलाबाद के लेखपाल नागेंद्र सिंह के पास से ईवीएम मशीन में लगाई जाने वाली दो पर्ची मिली है। सपा के कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि बैलेट पेपर के साथ मुहर थी। सवाल है कि ये सब सपा के कार्यकर्ता क्यों पकड़ रहे हैं? क्या सपा चुनाव आयोग है तो चुनाव आयोग कहां है और क्या है?

बरेली में कूड़े की गाड़ी में तीन संदूक मिले। सपा वालों ने हंगामा किया कि बैलेट पेपर हैं लेकिन प्रशासन ने कहा कि बैलेट पेपर नहीं हैं बल्कि मतगणना में इस्तमाल किए गए कुछ दस्तावेज औऱ सामग्री थी। तो क्या कोई भी पेपर कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाएगा। सपा के कार्यकर्ता हंगामा न करते तो रिटर्निंग अफसर एसडीएम बहेड़ी पारुल तरार को नहीं हटाया जाता। उन्हें हटाया ही गया कि गड़बड़ी हुई है।

आयोग के द्वारा सख्त कदम उठाए जाने के बाद अब नहीं कहा जा सकता है कि सपा के कार्यकर्ताओ की मुस्तैदी हार के डर के कारण थी। किसे मालूम कि कहां कहां क्या हो रहा है। लोकतंत्र में भरोसा कमाने की ज़िम्मेदारी संस्थाओं की होती है। चुनाव के दौरान भी आयोग को लेकर सवाल उठते ही रहे। अच्छी बात है कि आयोग ने तुरंत एक्शन भी लिया लेकिन इन घटनाओं ने लोगों के विश्वास को हिला दिया है। नतीजे आने के बाद तक इसी को लेकर बहस चलती रहेगी कि दस मार्च को जो आया वो जनता का फैसला था या किसी और का।

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