‘म’ से मंदी, ‘म’ से मार औ ‘म’ से मोदी सरकार

Parkash Fulara : ‘म’ से मंदी, ‘म’ से मार औ ‘म’ से मोदी सरकार… कहीं 23 हजार रुपए का चालान कट रहा है, तो कहीं 20 हजार रुपए का…ये भारी भरकम वसूली इन दिनों दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में की जा रही है…उस देश में जहां राज तो मोदी का है, लेकिन मार मंदी की पड़ रही है….दुनिया के ताकतवर प्रधानमंत्रियों की सूची में शामिल मोदी वो पीएम हैं, जो बचपन में चाय बेचा करते थे, और फिर सार्वजनिक मंचों से अपने चाय बेचने की कहानी को बड़े ही बेबाक से बयां करने वाले पीएम के देश में अगर लोगों से 10-10 हजार रुपए की वसूली हो रही हो, तो क्या कहेंगे, की अच्छे दिन आ गए…

दूसरे देशों की नकल करके भारी भरकम जुर्माना वाला प्रावधान देश में लागू करने से क्या सिस्टम चलेगा…सिस्टम बनने से पहले जुर्माना लगाकर आखिर सरकार की तरफ से क्या साबित करने की कोशिश हो रही है? नियम सख्त होने चाहिए, लेकिन जब सख्त नियम जनता का गला घोंटने लगे फिर कौन कहेगा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है?

दरअसल जिस देश के लोगों से 18 हजार रुपए वाली स्कूटी का ट्रैफिक चालान काटकर 23 हजार रुपए का जुर्माना, 15 हजार रुपए की बाइक का 20 हजार रुपए का चालान काटा जा रहा है, फिर जरा जरूरी हो जाता है उस देश की जनता के बारे में ये जानना, कि आखिर वो महीने भर में कमा कितने लेते हैं।

तो फिर सच ये है कि, केंद्र सरकार के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक 45 फीसदी भारतीयों को 10 हजार रुपये तक वेतन मिलता है…. बात ग्रामीण इलाकों की करें तो फिर यहां 55 फीसदी लोग 10 हजार रुपये से कम वेतन पाते हैं और 20 हजार रुपए की तनख्वाह पाने वालों तादाद देश में सिर्फ एक चौथाई है…बात यही नहीं बल्कि देश में 1 लाख रुपए से ज्यादा तनख्वाह पाने वाले 0.2 फीसद है, जिसमें देश के प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री और राज्यों के मंत्रियों समेत राज्यपाल शामिल हैं।

भारत देश में गरीबी का पैमाना नापने का भी एक अजीब सा ही तरीका है…वो ढंग जो कई सवाल आंकड़ों पर ही खड़ा कर देता है…शहरों में अगर कोई व्यक्ति 33 रुपये हर दिन और गांव में 27 रुपये हर दिन कमाता है तो वो गरीब नहीं है…अब जरा 33 रुपये हर दिन कमाने वाले के एक दिन के खर्च पर नजर डालते हैं।

मान लीजिये की राम शहर में रहता है, और उसकी प्रतिदिन की आय 33 रुपए है…फिर वो तीन टाइम खाना खायेगा…और ये खाना राम सरकार की उस रसोई से खायेगा जो गरीबों के लिए खोली गई है…वहां खाने का मूल्य होगा, 10 रुपए थाली, यानि की तीन टाईम के खाने में 30 रुपए उड़ जाएंगे, अब बचे 3 रुपए…इन तीन रुपए में क्या राम की पत्नी, उसके दो बच्चे खान खा सकेंगे…जवाब देश की उस सरकार को देना है, जिसके पीएम ने कभी वडनगर के प्लेटफार्म में कथित तौर पर डेढ़ रुपए गिलास चाय बेची थी।

2014 के चुनाव में नारा था, अच्छे दिन आएंगे…और पांच साल बाद बीजेपी ने नारा बदला, अच्छे दिनों को भूल नारा दिया सबका साथ, सबका विकास…हालात ये हैं कि अच्छे दिनों का नारा लगाते लगाते देश की जीडीपी ग्रोथ में 5 फीसदी की गिरवाट आ गई…रही बात सबका साथ सबका विकास की तो फिर भारी भरकम जुर्माना लगाने वाली सरकार ने जनता से न तो इस बाबत राय ली और न ही इसे लेकर पहले कोई सिस्टम तैयार किया गया।

लिहाजा इस जुर्माने को हम सरकार की तरफ से वसूली ही कह सकते हैं, वो इसलिए क्योंकि देश का हर वो नागरिक जो यहां रहता है वो टैक्स भरता है…भले ही वो 1 रुपए की टॉफी से लेकर लाखों का वाहन खरीदे…शोरुम से बाहर निकलने से पहले उसे सड़क पर अपनी उस चीज को उतारने के ऐवज में रोड टैक्स देना पड़ता है, वातावरण खराब न हो तो उसके लिए पॉल्यूशन करवाना पड़ता है, फिर अगर पेट्रोल भरवाना है तो उसमें भी टैक्स, शहर को पार करके दूसरे शहर में जाना है तो टोल टैक्स, सफाई के लिए मोदी सरकार का लगाया सेस और ना जाने कितने तरह के और टैक्स…मंदी की मार झेल रहे हिंदुस्तान के हर एक बाशिंदे पर बस वसूली का चाबूक चल रहा है, और गांधी भगत सिंह वाले देश में जनता सरकार की गुलाम बन रखी है।

टीवी पत्रकार प्रकाश फुलारा की एफबी वॉल से.

'शाश्वत' संगीत!

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Posted by Bhadas4media on Thursday, September 5, 2019
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One comment on “‘म’ से मंदी, ‘म’ से मार औ ‘म’ से मोदी सरकार”

  • Bhupendra joshi says:

    Bilkul Sahi kaha patrakar ji,

    Aaj Desh me road rasto ka thikana nahi, logo ki naukriya ja thi he, aamdani atthanni-kharcha rupaiya hue jaa rha he…aur ese me inko sirf jurmana Vasool karna he.

    Bina helmet pahne Niklo/ ya seat belt bandhe Bina Niklo to inko memo faadna he.. arey sir inhe koi batao ki aaj India ki koi bhi city me car/scooter 3rd gear me to mushkil se chalte he. Isme kaha seat belt aur helmet ki jarurat pdti he!!

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