स्मृति शेष : महेश जी न रूके, न झुके

केके उपाध्याय-

दैनिक भास्कर । एक ऐसा नाम जिसने इतिहास रचा । पत्रकारिता का क,ख,ग तो मैंने ग्वालियर से प्रकाशित स्वदेश से सीखा । पत्रकारिता के आधुनिक तेवर दैनिक भास्कर से सीखे । परंपराओं को तोड़ना और नई इबारत लिखना इस अखबार की ख़ासियत रही है । नए इतिहास रचने वाले कुछ नींव के पत्थर होते हैं । उन्हीं में से एक थे श्री महेश अग्रवाल । झाँसी में रहते थे । झाँसी से प्रकाशित दैनिक भास्कर के सब कुछ थे वे । 2001 में श्री सुधीर अग्रवाल ( एमडी भास्कर ग्रुप) के आदेश पर मुझे झाँसी में श्री महेश जी के साथ काम करने का अवसर मिला ।

महेश जी जीवट थे । निर्णय लेने की ग़ज़ब क्षमता । दोस्तों के दोस्त और ठन जाए तो दुश्मनी भी पूरी सिद्दत से निभाते । हाँ पत्रकारिता के लिए समर्पित । पत्रकारिता की पूरी आज़ादी जैसी दैनिक भास्कर में है कहीं और नहीं । यही गुण महेश जी में भी था । एक बार एक रिपोर्टर के साथ झाँसी विश्वविद्यालय के वीसी ने मारपीट कर दी । बस फिर क्या था …। महेश जी ने कहा कि विज्ञापन बंद होता है तो हो जाए , वीसी को रिपोर्टर से माफ़ी माँगना होगी । अंत में यही हुआ । आज जब महेश जी के निधन का समाचार सुना तो यक़ीन नहीं हुआ । भास्कर के संस्थापकों की अंतिम पीढ़ी के व्यक्ति थे महेश जी ।

भास्कर यूँ देश का सिरमौर नहीं बना । इसके पीछे तपस्या है ऐसे ही लोगों की । आज दैनिक भास्कर का परचम कई राज्यों में लहरा रहा है । अपनी बुजुर्ग पीढ़ी के सपनों को पंख दिए श्री सुधीर अग्रवाल ने । उनका दिमाग़ कम्यूटर से भी तेज चलता है । वे आने वाले युग को भाँप लेते हैं । उनकी तैयारी उसी दिन से शुरू हो जाती है । बाक़ी लोग जब तक जागते हैं भास्कर छा जाता है । ख़ैर बात महेश जी की ….महेश जी जब तक जिए अपनी शर्तों पर जिए । जब गए भी तो शान से । वे न झुके , न रूके । उन्हें मेरी विनम्र श्रद्धांजलि ।

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