मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला दे, लड़ाई का असली मैदान होगा लेबर कोर्ट

Satya Prakash Chaudhary : मजीठिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर अवमानना के मुकदमों पर कल से अंतिम सुनवाई हो रही है। भारतीय अदालतों में इतना वक्त लगता है की मुद्दई हार-जीत की तंगनज़री से ऊपर उठकर परमहंस हो चुका होता है। कुछ ऐसी ही परमहंसी मुद्रा में मैं भी आ चुका हूँ। इसलिए मुक़दमे के नतीजे जो हों, मुझे इससे पहले ही काफी कुछ मिल चुका है और उससे मैं संतुष्ट हूँ।

बीते दो सालों में पत्रकारों और मजदूरों से जुड़े कई कानूनों को पढ़ा। मुक़दमा लड़ने के दावँ-पेच सीखे। श्रम विभाग के बिके हुए अफसरों का असली चेहरा देखा। दिन-रात नैतिकता का भाषण पिलानेवाले अखबारों को श्रम अधिकारियों की हर तरह से सेवा करते देखा। और इन सबसे बढ़कर रहा रांची से दिया गया निर्वासन। सिलीगुड़ी में बहुत कुछ सीखने को मिला। बांग्ला भाषा से लेकर बंगाली खानपान तक।

सुप्रीम कोर्ट कुछ फैसला दे, यह लड़ाई अभी ख़त्म नहीं होने वाली है। पूंजीपति चोरी से जा सकते हैं, पर हेराफेरी से नहीं। प्रबंधन के लोग मजीठिया वेज बोर्ड माँगनेवाले हर कर्मचारी पर अलग-अलग विवाद खड़ा करेंगे और इस लड़ाई का मैदान होगा लेबर कोर्ट। तो दोस्तो, तैयार हो जायें आगे की लड़ाई के लिए। ‪#‎Majithia‬

मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे पत्रकार सत्य प्रकाश चौधरी की एफबी वॉल से.

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Comments on “मजीठिया वेज बोर्ड पर सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला दे, लड़ाई का असली मैदान होगा लेबर कोर्ट

  • vijay ku gupta says:

    (यूनीवार्ता – यू एन आई कांड)

    गुप्ता जी अशोक टुटेजा यूएनआई प्रबंधक का कहना है। हम पुरी नहीं तो आधी सैलरी का प्रयास तो कर ही रहे है।

    और सुना है। पैसा है पर देना नहीं चाहते। और एकाऊंट में वासुदेव बदला हुआ नाम ने फर्म हाऊस खरीदा है। और उसके कई फ्लैट है। और बेटी या बेटे की शादी भी युएनआई के पैसे से की जाती है। और साल में किताब निकलती है1 उसका एक करोड़ रूपया आया था वह पतानहीं कहां गया ।भाजपा सरकार ने एजेंसी को उठाने के लिए नया तरीका अपनाया और 165 ग्राहक पत्र नये आये है। उनसे तीन तीन महीने का एडवांस लिया वह पैसा कहां गया और यूएनआई काम्पाऊंड के अंदर दो मोबाइल टावर लगाये गये है उनका पैसा कहा जा रहा है। सोसाइटी का इन्टरेस्ट वह भी आज तक नहीं मिला लगता हैं। यह सब पैसा ये सब जितने भी बड़े प्रबंधक के रुप में राज्यों के ब्यूरो प्रमुख सब मिलझुल कर बंदर बाट की तरह कर्मचारियों का खून चूसते हुए खा रहे हैं।
    और कहते हैं। जब रेडियों से चेक आयेगा तो सैलरी मिलेगी। यहां पर घपला बहुत हो रहा है। पर कोई बोलता नहीं है। यहां पर इन लोगों का बोलबाता है। और कर्मचारियो को तबादले के नाम से डरा रखा हैं। जिसने भी बोला उसका ट्रासफर का डर बैठा रखा हे। इसलिए कोई भी नहीं बोलता है।

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