जब मेरी बांसुरी को कोई नहीं सुनेगा तब मैं इसे कुत्तों के लिए बजाऊंगा!

विश्व दीपक –

मनजीत बावा की पेंटिंग

रचना की कोई स्वतंत्र इयत्ता नहीं होती. एक रचना के हज़ार पाठ हो सकते हैं. यह देखने, सुनने और पढ़ने वाले पर निर्भर करता है कि वह किसी रचना में क्या देखता है. सरलतम रूप में जैक देरिदा की डिकंस्ट्रक्शन (deconstruction) थियरी यही है.

नीदरलैंड्स में मैंने वॉन गॉग की सैकड़ों पेन्टिंग्स देखी है लेकिन वॉन गॉग की रचना में मैं जो देख रहा था वह इंटरप्रेटर की व्याख्या से एकदम अलग था. डच इंटरप्रेटर अंग्रेज़ी में जो बता रही थी वह मेरे अनुभव जगत और मेर संवेदना से जुदा था. वॉन गॉग की बनाई पेंटिंग्स में भारत से गया मेरा मन जो देख रहा था, वह डच आंखों से नहीं देखा जा सकता था.

यह प्राक्थन सिर्फ इसलिए क्योंकि मनजीत बावा की इस पेंटिग्स में किसी को मुमकिन है कृष्ण दिखाई पड़े हों लेकिन मुझे इसमें कृष्ण नहीं परंपरा और धर्म के प्रति एक विद्रोह दिखाई पड़ता है. कुत्तों को बांसुरी सुनाने वाला कृष्ण न रसखान के पास है, न सूरदास के पास और न ही मीरा के पास.

मनजीत बावा की यह पेंटिंग भारतीय कला जगत की सबसे क्रांतिकारी रचनाओं में से एक है. इसका धर्म से या कृष्ण से या कृष्ण के जन्मदिन से कोई संबंध नहीं. इस रचना में कृष्ण के बारे में हिंदू और मुस्लिम नज़रिए का तगड़ा प्रतिकार है.
मनजीत बावा ने तो यहां तक कहा था कि इस पेंटिंग का नायक कृष्ण नहीं बल्कि वारिस शाह की कविता का रांझा है. इस रचना के बारे में उनका कहना था – The dog is anti-Hindu and anti-Muslim both. Showing the dog is antireligion.

जब मेरी बांसुरी को कोई नहीं सुनेगा तब मैं इसे कुत्तों के लिए बजाऊंगा – वारिस शाह की कविता की एक पंक्ति है जिस पर मनजीत बावा की यह अधार्मिक और क्रांतिकारी पेन्टिंग आधारित है.

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