कोरोना महामारी की अफरा-तफरी का एक सच ये भी!

  • शील शुक्ला, संपादक विजडम इंडिया (दैनिक समाचार पत्र)

एक महामारी ……. न कभी कहीं सुना था ना कभी किसी इतिहास में पढ़ा था, नाम है कोरोना ! एक वायरस जो फेफड़े में पहुँचता है….साँस रुकती है और ज़िंदगी ख़त्म. एक एक इंसान को इसी प्रकार मौत के मुँह में धकेल देने की जिद में है ये वायरस.

दिन-रात, सुबह –शाम चाहे अखबार हो, टी.वी. हो, सोशल मीडिया हो, या फिर हमारे पड़ोसी, रिश्तेदार दोस्त चारों तरफ कोरोना का कोहराम मचा हुआ है. हॉस्पिटल्स में बेड नहीं है… साँस लेने के लिए ऑक्सीजन नही है….. पहली बार ये मानव सभ्यता शमशान घाट और कब्रगाहों पर चीखते – बिलखते – टूटे हुए लोग जहाँ उनके साथ आज कोई अपना नहीं खड़ा है लाशों को जलाने या दफनाने की जगह तक नहीं पा रहें है.
कही यही तो क़यामत नहीं ? सच में इंसान पहली बार प्रलय देख रहा है.

रोज़ लाखों लोग कोरोना के चपेट में आते हैं जिनमे से हजारो की ज़िन्दगी मौत के आगे घुटने टेक देती है. पहले जिस सर्दी , जुकाम बुखार में हॉस्पिटल तो दूर लोग केमिस्ट शॉप से दवा तक लेना भूल जाते थे आज वही लोग एक छींक आने पर ऐसा लगता है जैसे मौत ने दस्तक दे दी हो. क्या ये मौत की दहशत अब हमारी ज़िंदगी का सच है ? हम डरे जरूर है, लेकिन मौत की ये दहशत हमारी ज़िंदगी का पूरा सच नहीं है

…….. कुछ बातें हमें जरूर सोचनी होगी ………

1- पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से ये नारा लग रहा है…दो गज दूरी मास्क है जरूरी, आप सोचें आपके शरीर में मात्र नाक और विशेष परिस्थिति में मुँह ही वो स्थान है जहाँ से ऑक्सीजन हमारे शरीर में जा सकता है. ये बताने की जरूरत नहीं कि ऑक्सीजन हमारे इम्युनिटी के साथ साथ हृदय, फेफड़े आदि अंग के लिए कितने जरूरी है, दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं यदि ऑक्सीजन नहीं तो जीवन नहीं. इस ऑक्सीजन को आपने मास्क लगाकर रोक दिया, यदि आपने प्रतिदिन औसत 4 या 5 घंटे भी मास्क लगाया है तो भी आपने अपने शरीर को मिलने वाली ऑक्सीजन को बुरी तरह से बाधित कर दिया है.

यदि मुझे विकल्प दिया जाये आप कोरोना के साथ जीना चाहते हो या फिर मास्क लगा कर ऑक्सीजन को बाधित कर, तो मेरा जवाब होगा, मास्क नहीं लगाऊँगा शरीर में ऑक्सीजन की पूर्ती करूंगा और किसी भी शारीरिक व्याधा से लड़ कर जीत जाऊँगा. यदि शरीर में ऑक्सीजन की ही कमी हो गयी तो कोरोना को छोडिये मच्छर के काटने से भी मौत हो जाएगी.

मेरी जानकारी में जितने भी लोगो की कोरोना की वजह से मृत्यु हुई तो मैंने पहला सवाल सबसे यही किया क्या वो रेगुलर मास्क यूज़ करते थे? अधिकांश का उत्तर यही था कि मृतक अधिक समय तक मास्क लगाए रखा करते थे.

एक वर्ष पूर्व ही मैंने कई मित्रों से बोला था कि मास्क लगाने से जो ऑक्सीजन की कमी का संकट शरीर में आयेगा वो बेहद खतरनाक रूप अख्तियार करेगा. अति भीड़ – भाड़ की जगह छोड़ कर मास्क लगाना खुद की इम्युनिटी को कम करना है. प्लीज प्रतिदिन किसी भी परिस्थिति में औसत एक घंटे से ज्यादा समय तक मास्क ना लगाए. आज जो कोरोना से मौत का तांडव मचा हुआ है उसके लिए ये मास्क भी कम ज़िम्मेदार नहीं है.

2- आज हॉस्पिटल में जगह नहीं है, आप ये बताइये इससे पहले सिर्फ सर्दी, जुकाम, छींक और बुखार आने पर कौन हॉस्पिटल पहुँच जाता था? लेकिन सबसे पहले कोरोना टेस्ट कराओ और अगर बुखार बढ़ा तो हॉस्पिटल में एडमिट हो जाओ. पहले जहाँ एक भी आदमी बुखार और जुकाम पर दवा तक नहीं लेता था लेकिन उसे ही आज हॉस्पिटल में बेड चाहिए, अगर इनमे से आधा प्रतिशत भी हॉस्पिटल पहुच गए तो बेड तो दूर पाँव तक रखने की जगह हॉस्पिटल में नहीं होगी.
क्या इसके पहले भी हम फ्लू और वायरल फीवर के मौसम ये नहीं सुना करते थे कि हॉस्पिटल में बेड ही नहीं बचे है, लोग गवर्नमेंट हॉस्पिटल के लापरवाह डॉक्टर्स और लापरवाह प्रशासन के आगे बेबस दिखते थे, वैसे भी मै जानकारी के लिए बता दूं कि हमारे देश के ज़र्ज़र गवर्नमेंट हॉस्पिटल्स तो आम दिनों में भी लगभग ऐसे ही थे बस कोरोना महामारी में संख्या बढ़ जाने पर कलई खुल गयी. ये बात भी जान लीजिये कि भारत में प्रति दस हज़ार व्यक्ति पर सिर्फ 8 डॉक्टर्स और 5 हॉस्पिटल बेड्स ही उपलब्ध है. तो स्वाभाविक है इस मेडिकल व्यवस्था पर आधारित राष्ट्र पर यदि थोड़ी सी भी गंभीर स्थिति बनती है तो प्राइवेट हॉस्पिटल लूटेंगे ही और ज़र्ज़र गवर्नमेंट हॉस्पिटल अपनी अव्यवस्था से लोगो को मारेंगे ही.

3- अब बात करता हूँ उन लाखों मरीजों की जो कोरोना के अतिरिक्त किसी और बीमारी से गंभीर रूप से ग्रस्त है, उनका कोई ध्यान देने वाला नहीं है, पेचीदगी ये है कि कोई भी ऐसा मरीज जो कोरोना के अलावा किसी अन्य बीमारी का इलाज चाहता है. वो पहले कोरोना टेस्ट की वो नेगेटिव रिपोर्ट लाये जो दो दिन से पहले नहीं मिल सकती, इस निगेटिव रिपोर्ट के बाद ही सम्बंधित विभाग का सीनियर डॉक्टर उस मरीज को देखेगा, और OPD जहाँ आम दिनों में लाखों मरीज एक साथ देखे जाते थे आज वो opd पूरी तरह से बंद करके एक हमेशा एन्गेज़ रहने वाला नंबर दे दिया गया है. सीनियर स्पेशलिस्ट डॉक्टर्स जहाँ पहले आम दिनों में 50 से 100 मरीज देख लिया करते थे आज वही डॉक्टर्स मुश्किल से 10 मरीज भी नहीं देख पा रहे हैं. ये तो कागज़ी नियमों की बात है सच ये है सब कुछ बंद है ना IPD ना OPD. अब इनके पास मौत के अलावा कोई और रास्ता नहीं है, इनके मरने के बाद इनको भी कोविड से हुई मृत्यु के खाते में डाल दिया जा रहा है, पैरामेडिकल स्टाफ , नर्स और जूनियर डॉक्टर्स फ्रंट पर है और सीनियर डॉक्टर या तो टीवी चैनल देख रहे है या फिर टीवी चैनल पर दिख रहे हैं.

4- अब मै बात करता हूँ ऑक्सीजन की जिसकी वज़ह से देश में मौत का तांडव मचा हुआ है. सच ये है कि ऑक्सीजन की कमी से ज्यादा ऑक्सीजन वितरण और ऑक्सीजन ट्रांसपोर्टेशन की अव्यवस्था के कारण हालात बिगड़े हुए है. एक राज्य दूसरे राज्य को सहज तरीके से ऑक्सीजन देने को तैयार नहीं है. यद्दपि इस बार हमारी सरकार ने गत पिछले वर्षों की तुलना में दोगुना ऑक्सीजन 9000 मीट्रिक टन ऑक्सीजन विदेशों को निर्यात कर दिया. वैसे भी हमारे देश में जो ऑक्सीजन वितरण की नीति है उसके अनुसार 85 प्रतिशत ऑक्सीजन उद्योग के लिए और 15 प्रतिशत ऑक्सीजन मेडिकल उपयोग के लिए है. यदि उद्योग के लिए निर्धारित ऑक्सीजन मेडिकली उपयोग में लाया जाय तो भी ऑक्सीजन के संकट से उबर सकते हैं.

समस्या ऑक्सीजन की उतनी नहीं है जितनी कई बार जरूरत की चीजो को मौका देखकर उसकी जमाखोरी और काला बाजारी यहाँ तक की तश्करी भी शुरू हो जाती है, जिससे की जरूरी सामानों का एक कृत्रिम संकट खड़ा हो जाता है. जो की इस समय ऑक्सीजन के साथ साथ ओक्सीमीटर, रेमेडेसिविर, विटामिन सी वाले फलों के साथ हो रहा है. कहने का आशय सिर्फ इतना कि ये अगर जरूरी सामानों की ज़माखोरी, कालाबाजारी और तश्करी रुक जाये तो भी एक हद तक इस परिस्थिति से उत्पन्न आतंक या घबराहट को जन मानस में कम किया जा सकता है.

5- सवालों के घेरे से तो RTPCR कोविड टेस्ट भी नहीं बचा है यदि आप अपना 10 जगह से RTPCR टेस्ट कराये तो मुमकिन है की आप 6 जगह की रिपोर्ट में पॉजिटिव और 4 रिपोर्ट में निगेटिव पाए जाएँ. कई बार तो जिसको कोरोना का कोई लक्षण ना हो उसकी भी रिपोर्ट पॉजिटिव आ जाती है, फिर कहा जाता है ये एसिम्टमिक है, क्या मज़ाक है ….. मेडिकल एक विज्ञान है बिना किसी भी लक्षण के किसी भी रोग को कैसे माना जा सकता है, विज्ञानं की एक बात जान लीजिये यदि आपको कोई बीमारी हुई है तो उसका कोई न कोई दृश्य या अदृश्य लक्ष्ण जरूर होगा और व्यक्ति पर उसका प्रभाव भी जरूर दिखेगा. कोरोना में एसिम्टमिक होना मानवीय सोच और चिकित्सा की वैज्ञानिक परिभाषा दोनों को दिग्भ्रमित करता है. और RTPCR कोविड टेस्ट पद्धति पर शत प्रतिशत भरोसा तो नहीं है.

6- अंततः मै पूरे देश की जनता को यही कहना चाहता हूँ कि आप कोरोना जो सिर्फ एक फ्लू या वायरल फीवर की तरह है आप इससे सावधान तो जरूर रहे लेकिन डरे नही, निर्भीक होकर अपना सामान्य जीवन जीयें.

वैसे कहने को तो इस वायरस को डबल म्युटेंट, और हवा में भी फ़ैलाने वाला भी कहा जा रहा है. ज्यादा से ज्यादा खतरनाक कोविड 21 बताया जा रहा है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है अगर ऐसा होता तो पिछले 7 महीने से जिस प्रकार देश की जनता कोरोना को भूल कर भीड़ भरी बाज़ार, होली , दीवाली , कुम्भ और राजनीतिक रैली का हिस्सा बन रहा है तो आज इस धरती पर कोई भी जीवित नहीं होता.

मै तो कहता हूँ कि अभी भी सब कोरोना का मीडिया प्रचार बंद कर दो, हॉस्पिटल्स और डॉक्टर्स हर बीमारी के लियी अपनी पूर्ण क्षमता के साथ मरीजों को बिना डरे अटेंड करने लगे, सब अपने काम पर लग जाये. दूरी बनाने की सावधानी का पालन करे मास्क अति भीड़ भाड़ वाली जगह पर ही लगाए जो कि कम से कम अवधी के लिए हो. निर्भीक होकर ज़िंदगी में आगे बढ़ें. स्वतः कोरोना के कृत्रिम और वास्तविक संकट से देश छुटकारा पायेगा.

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