हम हैं यूपी के पत्रकार, कानून हमारी जेब में!

लखनऊ। सरकार और आम जनता के बीच का आईना समझा जाने वाला मीडिया और उसमें कार्यरत पत्रकार चरित्रहीनता की पराकाष्ठा को लांघते जा रहे हैं। चाहें बड़ी कम्पनियों की प्रेस वार्ताओं में उपहार ‘‘डग्गा’’ को लेकर मारामारी हो या फिर सरकार से लाभ लेने की होड़। चाहें पीड़ितों से माल ऐंठकर उनके काम का आश्वासन का मामला हो या फिर अपराधियों को शरण देने के एवज में मोटी कमाई की लालसा। बलात्कार के मामलों से लेकर हत्या और लूट जैसे मामलों में पत्रकारों की संलिप्तता मीडिया के मिशन को गहरी चोट देती आयी है।

ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए दलालों की भूमिका ने भी मीडिया को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यहां तक कि मीडिया कर्मी सरकार से लाभ लेने के फेर में अपने स्वाभिमान से समझौता तक करने से गुरेज नहीं करते। यही वजह है कि राजनीतिक प्रेस वार्ताओं के दौरान मीडिया कर्मियों को अब पहले जैसी तवज्जो नहीं दी जाती। हालांकि इससे पहले भी चतुर्थ स्तम्भ का चीर-हरण होता रहा है लेकिन न तो यूपी की सरकारों ने भ्रष्टाचार की गर्त में समा रही मीडिया को दुरूस्त करने की पहल की और न ही मीडिया घरानों ने ही अपने दागदार पत्रकारों पर लगाम लगाकर उसके अस्तित्व को बचाने की पहल की। सरकारी लाभ लेने के फेर में राजधानी के पत्रकार किस हद तक अपने स्वाभिमान से समझौता करते हैं इसके जीते-जागते उदाहरण पुख्ता साक्ष्य के साथ राजधानी लखनउ में ही मौजूद हैं। स्वयं को बड़ा पत्रकार कहलाने वाले कुछ कथित पत्रकार सरकार से तमाम लाभ लेने के लिए न सिर्फ अपनी कलम को गिरवी रखने में संकोच करते हैं और न ही फर्जी दस्तावेज तैयार करने में।

कुछ पत्रकार फर्जी दस्‍तावेजों के सहारे ले रहे लाभ

राजधानी लखनउ से जुड़े कुछ कथित पत्रकारों ने रियायती दरों पर मकान की सुविधा लेने के साथ ही सरकारी मकानों पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे कब्जा जमा रखा है। इस बात की जानकारी सम्बन्धित विभाग को भी है लेकिन वह अनजान बना हुआ है। यहां तक कि इस सम्बन्ध में पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, मायावती और वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी समस्त दस्तावेजों सहित जानकारी मुहैया करायी जा चुकी है, इसके बावजूद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी भवनों पर कुण्डली मारकर बैठे कथित पत्रकारों के खिलाफ न तो विधिक सम्मत कार्रवाई की जा रही है और न ही सरकारी भवनों से कब्जा वापस लिया जा रहा है। गौरतलब है कि प्रमुख सचिव ‘‘मुख्यमंत्री’’ राकेश गर्ग ने जांच के बाद शिकायत कर्ताओं को कार्रवाई का आश्वासन दिया था लेकिन पत्रकारों के फर्जीवाडे़ से जुड़ा यह प्रकरण उनमें हिम्मत पैदा नहीं कर पा रहा है।

जानकार सूत्रों की मानें तो वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को सूबे की सत्ता संभालने के तीन माह बाद ही इस सम्बन्ध में जानकारी मुहैया करायी जा चुकी थी। इसके बावजूद उक्त  पत्रकारों के खिलाफ फर्जी दस्तावेज के सहारे मकान हथियाने के मामले में धोखाधड़ी से सम्बन्धित धारा 420 के तहत न तो मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की गयी और न ही सरकारी मकानों से उन्हें बेदखल ही किया गया। ज्ञात हो सरकारी मकानों में रिहायश के लिए आवंटन की शर्तों का पालन भी आवश्यक है। उत्तर-प्रदेश राज्य सम्पत्ति विभाग अनुभाग-2 ने अपने सरकारी आदेश संख्या- आर- 1408/32-2-85-211/77 टीसी में स्पष्ट उल्लेख किया है कि यदि कोई भी आवंटी शर्तों और प्रतिबंधों को भंग करता है तो राज्य सम्पत्ति विभाग उस आवंटी का आवंटन बिना कारण बताए निरस्त कर उसे सरकारी आवास से बेदखल कर सकता है। इसके बावजूद सैकड़ों की तादाद में सरकारी बंगलों में कुण्डली मारकर बैठे पत्रकार खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।

सम्बन्धित विभाग भी उनके खिलाफ कारवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। कई कथित पत्रकार ऐसे हैं जिनका कई महीनों से किराया बकाया होने के साथ ही भारी-भरकम बिजली का बिल भी बाकी है। चूंकि सत्ता के गलियारों से लेकर नौकरशाही तक ऐसे पत्रकारों का बोलबाला है लिहाजा सरकार चाहकर भी नियमों के तहत इनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है। बताया जाता है कि एक ऐसे ही कथित वरिष्ठ पत्रकार को लाभ पहुंचाने की गरज से पॉवर कार्पोरेशन के एमडी ने लगभग पांच लाख का बिल माफ करके उन्हें राहत पहुंचायी।

सरकार फर्जी तरीके से लाभ लेने वालों के खिलाफ कार्रवाई के मूड में नहीं

राज्य सम्पत्ति विभाग के एक अधिकारी की मानें तो सरकार पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने के मूड में नहीं है। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि ऐसे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई तभी हो सकती है जब कोई जनहित याचिका दायर करे। राज्य सम्पत्ति विभाग के अनुसार सरकारी बंगलों पर सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्रकार काबिज हैं जो विभाग की नियमावली में फिट नहीं बैठते। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे कथित पत्रकारों को बंगला आवंटन किया गया है जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर का नाता नहीं है। कुछ तो पत्रकारिता का पेशा भी त्याग चुके हैं फिर भी सरकारी मकानों में कब्जा जमाए हुए हैं और विभाग भी उनसे मकान खाली नहीं करवा पा रहा है। कुछ पत्रकारों की मृत्यु के उपरांत उनके परिवार वाले सरकारी मकानों में जमे बैठे हैं।

नियम तो यह है कि यदि किसी पत्रकार की मृत्यु हो जाती है और उसके परिवार का कोई सदस्य मान्यता प्राप्त पत्रकार है तो मकान पर उसका कब्जा बरकरार रहेगा लेकिन कई मामले ऐसे हैं जिनके परिजनों का पत्रकारिता से दूर-दूर का रिश्ता नहीं है फिर भी राज्य सरकार के मकानों का सुख भोग रहे हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग प्रदेश सरकार की ओर से निर्देश न मिलने के कारण मन-मसोस कर बैठा है। विभाग के एक अधिकारी की मानें तो सम्बन्धित विभाग के मंत्री ने इशारा भर कर दिया तो निश्चित तौर पर तकरीबन 300 से अधिक फर्जी पत्रकारों को सरकारी बंगलों से हाथ धोना पड़ सकता है। दूसरी तरफ विडम्बना यह है कि पत्रकारों को आवास आवंटन के मामलों में आजम खां, शिवपाल सिंह यादव सहित कई मंत्रियों के सिफारिशी पत्र और उनके मौखिक आदेश कार्रवाई न होने के लिए जिम्मेदार हैं। विभाग कार्रवाई करना भी चाहे तो इन दिग्गज नेताओं के सिफारिश आडे़ आ जाती है। परिणामस्वरूप उसी को आधार बनाकर अन्य पत्रकार भी आवास खाली करने की नोटिस मिलने के बाद उन्हीं पत्रकारों का हवाला देकर बच निकलते हैं।   

एनडी तिवारी के कार्यकाल में शुरू की गई थी सुविधा

गौरतलब है कि आज से लगभग तीन दशक पूर्व 21 मई 1985 को कांग्रेसी नेता व पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के शासनकाल में राजधानी लखनउ के पत्रकारों को सरकारी आवास की सुविधा देने की गरज से तत्कालीन प्रदेश सरकार ने एक नीति बनायी थी। इस नीति के तहत पत्रकारों को सरकारी बंगलों को लाभ देने की जिम्मेदारी राज्य सम्पत्ति विभाग के अनुभाग-2 को सौंपी गयी थी। बैठक में करीब दर्जन भर बिन्दुओं पर विचार-विमर्श के साथ नियमावली लागू की गयी थी। ज्ञात हो सरकार का यह कदम उस वक्त के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों के अनुरोध पर उठाया गया था। विडम्बना यह है कि लगभग तीन दशक पहले बनी इस नीति में आज तक कोई संशोधन नहीं किया जा सका है जबकि इस दौरान पत्रकारों के वेतन सहित उनकी आर्थिक हैसियत काफी सुदृढ़ हो चुकी है।

1985 की नियमावली के तहत जो पत्रकार ढाई हजार या फिर उससे अधिक वेतन पाते हैं उन्हें सरकारी आवास की सुविधा नहीं दी जा सकती जबकि हकीकत यह है कि वर्तमान में अखबार कार्यालय का एक चपरासी भी पांच से आठ हजार का वेतन पाता है। जहां तक पत्रकारों के वेतन की बात है तो वे भी कम से कम दस हजार रूपयों से लेकर चालीस-पचास हजार रूपए प्रतिमाह वेतन पा रहे हैं। इन परिस्थितियों में 1985 की नीति के आधार पर उन समस्त पत्रकारों से बंगले खाली करवा लिए जाने चाहिए थे जो किसी न किसी अखबार,पत्रिका में अपनी सेवाएं देकर वेतन के रूप में सरकारी आवास पाने के लिए निर्धारित वेतन से कहीं अधिक वेतन पा रहे हैं। नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि जिनका निजी मकान अथवा रेंट कंट्रोल एक्ट के अन्तर्गत मकान होगा उन्हें सरकारी आवास की सुविधा नहीं दी जा सकती।

नियमावलियों का उल्‍लंघन कर रहे हैं कई पत्रकार

राजधानी लखनउ के पत्रकार इन नियमावलियों का खुलेआम उल्लंघन कर रहे हैं। सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें तत्कालीनी मुलायम सरकार ने रियायती दरों पर प्लॉट और मकान उपलब्ध करवाए थे। इतना ही नहीं कई पत्रकारों के स्वयं के आवास लखनउ में हैं इसके बावजूद वे सरकारी बंगलों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। कुछ ने अपने निजी मकानों को किराए पर देकर सरकारी आवास की सुविधा ले रखी है तो कुछ सरकारी आवासों को ही किराए पर देकर दोहरा लाभ उठा रहे हैं। इस बात की जानकारी प्रत्येक विधायक निवास और सरकारी आवासों की देखरेख करने वाले कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों तक को लेकिन सत्ता से करीब का सम्बन्ध रखने का दावा करने वाले पत्रकारों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की हिम्मत विभागीय अधिकारी नहीं जुटा पा रहे हैं। इन अधिकारियों की बेबसी यह है कि वे जब भी किसी पत्रकार की एडवर्स इन्ट्री अपने विभागाध्यक्ष तक पहुंचाते हैं हर बार उन्हें फटकार का ही सामना करना पड़ता है। उन्हें पत्रकारों से उलझने के बजाए शांति से नौकरी करने की सलाह दी जाती है।

पत्रकारों को सरकारी भवन की सुविधा के लिए नियम तो यह हैं कि उनके प्रार्थना-पत्र को सम्बन्धित समाचार-पत्र अथवा समाचार एजेंसी के माध्यम से शासन के राज्य सम्पत्ति विभाग को भेजा जाता है। तत्पश्चात आवासों का आवंटन निर्धारित नियमों की जांच के बाद किए जाने का प्राविधान है। लेकिन शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब किसी पत्रकार को नियमों के अनुसार मकान आवंटित किया गया हो। जानकार सूत्रों की मानें तो सत्ता से करीब का रिश्ता रखने वाला पत्रकार मकान पाने के लिए स्वयं ही फर्जी लेटरहेड पर अपने सम्पादक का हस्ताक्षर कर मंत्री के सिफारिशी पत्र के सहारे सरकारी आवास की सुविधा ग्रहण कर लेता है।

नियमावली के विपरीत हुए हैं कई मकानों के आवंटन

नियमावली के तहत सरकारी आवासों का आवंटन एक निर्धारित अवधि के लिए ही किए जाने का प्राविधान है। तत्पश्चात उक्त अवधि को तभी बढ़ाया जा सकता है जब समिति अनुमोदन करे। विडम्बना यह है कि उक्त नियमों का कहीं भी पालन नहीं किया जा रहा है। कई-कई पत्रकार तो दशकों से सरकारी आवासों पर कब्जा जमाकर बैठे हैं। कई ऐसे हैं जो अखबार से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी और उनके परिवार वाले सरकारी आवास का लाभ उठा रहे हैं। गौरतलब है कि नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि पत्रकारों के आवास तभी तक उनके पास होंगे जब तक वे लखनउ में किसी मान्यता प्राप्त अखबार में कार्यरत रहेंगे। सेवानिवृत्त हो जाने के बाद अथवा तबादलदा हो जाने की स्थिति में उनका आवंटन स्वतः निरस्त कर दिया जायेगा। जानकार सूत्रों की मानें तो कुछ कथित पत्रकार ऐसे हैं जिनका दूर-दूर तक पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं है इसके बावजूद वे सरकारी आवासों का लाभ पत्रकार कोटे से उठा रहे हैं।

तत्कालीन प्रदेश सरकार के निर्देश पर शासन की ओर से जारी नियमावली में मान्यता प्राप्त संपादकों, उप संपादकों और ऐसे पत्रकारों को सरकारी आवास आवंटन किए जाने की सुविधा दी गयी थी जो पूर्ण कालिक रूप से समाचार-पत्र कार्यालय में सेवारत हों। साथ ही उनके समाचार पत्रों का पंजीकृत कार्यालय राजधानी लखनउ में हो। सरकारी मकान आवंटन में कोई त्रुटि न होने पाए इसके लिए सचिव मुख्यमंत्री की देख-रेख में एक समिति का भी गठन किया गया था। इस समिति में सचिव मुख्यमंत्री के साथ ही सचिव राज्य सम्पत्ति विभाग, सूचना निदेशक सहित राज्य सम्पत्ति विभाग के कई अधिकारी भी शामिल थे। इस समिति के पदाधिकारियों की जिम्मेदारी पत्रकारों की ओर से दिए गए प्रार्थना-पत्रों की गहनता से छानबीन के साथ मकान आवंटन की संस्तुति करने की है।

नियमों में साफ कहा गया है कि पत्रकारों को मकान आवंटन से पूर्व प्रत्येक पत्रकार के आवेदन को गुण-अवगुण के आधार समिति द्वारा निष्पक्ष जांच की जायेगी। तत्पश्चात संस्तुति प्राप्त होने के बाद मकानों का आवंटन किया जायेगा। यदि सही मायनों में देखा जाए तो तत्कालीन एनडी तिवारी सरकार ने सरकारी मकानों को अवैध कब्जों की गिरफ्त में आने से बचाने के लिए फूल प्रूफ योजना बनायी थी। नियम इतने सख्त हैं कि यदि सही तरीके से बिना सिफारिश व दबाव के इनका अनुपालन किया जाता तो सरकारी मकानों में फर्जी पत्रकार घुस तक नहीं पाते।

दबाव के चलते सम्‍पत्ति विभाग नहीं कर पा रहा कार्रवाई

जानकार सूत्रों के दावों की मानें तो राज्य सम्पत्ति विभाग अपने दायित्वों का सही तरीके से निर्वाहन नहीं कर पा रहा है। जहां तक राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारियों का आरोप है तो वे अपने जिम्मेदारी का निर्वाहन उपरी दबाव के कारण नहीं कर पा रहे हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक अधिकारी का कहना है कि पत्रकारों के मकान आवंटन से जुडे़ अधिकतर मामलों में सरकार के किसी न किसी मंत्री अथवा उच्चाधिकारी का सिफारिशी पत्र लगा होता है। ज्यादातर मामलों में तो फाईल पहुंचने से पहले ही अधिकारी अथवा मंत्री-नेता का सिफारिशी फोन आ जाता है। इन परिस्थितियों में नियमों के तहत जानकारी जुटाने का अर्थ ही नहीं रह जाता। इन अधिकारी की मानें तो पत्रकारों की फाइलों पर अक्सर सही सूचना देने पर डांट तक खानी पड़ती है। अब तो हालात यह है कि पत्रकारों के प्रार्थना-पत्रों में सच्चाई नहीं बल्कि सिफारिशी पत्रों को तलाशा जाता है। जिसके प्रार्थना-पत्र में किसी अधिकारी अथवा नेता का सिफारिशी पत्र अथवा फोन से निर्देश मिलते हैं उसी को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी मकानों पर कब्जा दिला दिया जाता है।

नियमानुसार सरकारी आवास उन्हें ही दिए जाने का प्राविधान है जिनका निजी मकान लखनउ में न हो। साथ ही ऐसे पत्रकारों का मान्यता प्राप्त होने के साथ ही अखबार में पूर्ण कालिक सेवा का होना जरूरी है। इतना ही नहीं नियमों में साफ कहा गया है कि उन्हीं पत्रकारों को सरकारी मकान की सुविधा दी जायेगी जिनके समाचार पत्र का पंजीकृत कार्यालय लखनउ में होगा। राज्य सम्पत्ति विभाग के इन नियमों की भी खुलेआम धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्रकारों को मकानों का आवंटन कर दिया गया जिनका पंजीकृत कार्यालय लखनउ में नहीं है।

जहां तक प्रतीक्षारत पत्रकारों के सम्बन्ध में आवंटन के प्रस्ताव की बात है तो इसकी जिम्मेदारी भी समिति द्वारा निर्धारित सिद्धान्त पर आधारित है। लेकिन शायद ही कभी-कभार इन सिद्धान्तों का पालन किया जाता हो क्योंकि सरकारी आवास की सुविधा लेने वाले ज्यादातर पत्रकार पहले से ही मंत्रियों के सिफारिशी पत्रों का सहारा लेकर विभागीय अधिकारियों पर रौब गांठने पहुंच जाते हैं। 1985 में बनी नियमावली के मुताबिक 550 से लेकर 2500 रूपए प्रतिमाह वेतन पाने वालों को श्रेणीबद्ध तरीके से मकानों के आवंटन की व्यवस्था की गयी है। इस नियम के तहत जिस प्रकार के आवासों के लिए राजकीय अधिकारी अर्ह हैं उसी प्रकार से पत्रकारों के लिए भी वेतन के अनुसार नियमावली में श्रेणीबद्ध किया गया है।

2500 से कम वेतन वाले के लिए हैं सरकारी आवास

पत्रकारों के लिए सरकारी आवासों का किराया भी 1985 की नियमावली के आधार पर वसूला जा रहा है जबकि वर्तमान कोई पत्रकार ऐसा नहीं जिसका वेतन दस से हजार से कम हो। ऐसी परिस्थितियों में या तो सरकार को 2500 से अधिक वेतन पाने वालों से सरकारी आवास खाली करवा लेना चाहिए या फिर नयी नियमावली बनाकर किराए में भी वृद्धि की जानी चाहिए। साफ जाहिर है इतनी कम वसूली के कारण राज्य सम्पत्ति विभाग के अधीन इन सरकारी आवासों की देख-रेख स्तरीय नहीं हो पा रही है। 1985 की व्यवस्था के मुताबिक राजधानी की अति विशिष्ट कालोनी गुलिस्तां कालोनी और राजभवन कालोनी का किराया आज भी 40 पैसा प्रति वर्ग फीट के हिसाब से वसूला जा रहा है। पार्क रोड, कैसरबाग, डालीबाग, दिलकुशा और तालकटोरा के आवासों का किराया 30 पैसा प्रति वर्ग फीट के हिसाब से वसूला जा रहा है। अलीगंज, तालकटोरा और इन्दिरा नगर के आवासों का किराया 20 पैसे प्रति वर्ग फीट के हिसाब से वसूला जा रहा है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार दिसम्बर 2012 में राज्य संपत्ति विभाग की तरफ से करीब 53 पत्रकारों को मकान खाली करने का नोटिस जारी किया गया था।  राज्य सम्पत्ति विभाग का कहना है कि उक्त प्रकरण में ज्यादातर पत्रकारों ने जवाब देकर बता दिया था कि वे अवैध रूप से नहीं बल्कि सही तरीके से मकान पर काबिज हैं। विभाग ने भी बिना जांच किए उनके हलफनामे को सही मानकर उनके कब्जे को बरकरार रखा। जिन्होंने हलफनामा नहीं दिया था उन्हें कई बार नोटिसें जारी की गयीं लेकिन किसी ने भी मकान पर से कब्जा नहीं छोड़ा।

नियमानुसार ऐसे अवैध कब्जेदारों से वर्तमान सर्किल दर पर किराया वसूले जाने का प्राविधान है लेकिन विभाग किसी भी पत्रकार से नियमानुसार किराया नहीं वसूल कर पा रहा है। ये सभी गैर-कानूनी तरीके से मकान पर काबिज हैं। इनमें से कई ऐसे लोग हैं जो अब पत्रकार नहीं रह गए हैं, किसी अखबार या मैग्जीन या टीवी में भी कार्यरत नहीं हैं। यहां तक कि वे अब लखनऊ में भी नहीं रहते हैं, फिर भी उनका कब्जा बरकरार है। ऐसे लोगों से विभाग मकान खाली कराने के मूड में तो है लेकिन मंत्रियों के सिफारिशी पत्र आडे़ आ जाते हैं। कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें पिछली मुलायम सरकार के कार्यकाल में नगर विकास मंत्री आजम खां की सिफारिश पर एक-दो वर्ष के लिए मकान आवंटन किए गए थे। इन पत्रकारों की समयावधि काफी पहले समाप्त हो चुकी है उसके बावजूद वे बिना नवीनीकरण के राज्य सम्पत्ति के मकानों में जमे हुए हैं।

मान्‍यता रद्द होने के बाद भी काबिज हैं पत्रकार

कुछ पत्रकारों की मान्यता समाप्त हो चुकी है इसके बावजूद मकान उन्हीं के कब्जे में हैं। ओसीआर विधायक निवास पर तैनात राज्य सम्पत्ति विभाग के एक कर्मचारी का दावा है कि इन आवासों में ज्यादातर मूल आवंटी नहीं रहता। ज्यादातर मकान किराए पर उठे हुए हैं। कुछ मकान तो महज शराबखोरी और ऐयाशी के लिए ही आवंटित कराए गए हैं। इस कर्मचारी का कहना है कि इस बात की जानकारी सम्बन्धित विभाग के शीर्ष अधिकारी को भी दी जा चुकी है लेकिन आज तक किसी भी पत्रकार के मकान की न तो औचक जांच की गयी और न ही गैर-कानूनी ढंग से रह रहे पत्रकारों से मकान ही खाली करवाया जा रहा है।

नेता, मंत्री और नौकरशाही के भ्रष्टाचार को उजागर करते-करते लखनउ के पत्रकार भी अब भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगा रहे हैं। अनेकों बार राजनीति घरानों से लेकर नौकरशाहों तक ने मीडिया के भ्रष्टाचार पर उंगली उठायी है। एक प्रशासनिक अधिकारी ने तो इस संवाददाता से यहां तक कहा कि पत्रकार अपने मकानों के आवंटन के घिघियाता है। निश्चित तौर पर मीडिया के लिए यह शर्मनाक स्थिति है। इन अधिकारी का कहना है कि समाज और सरकार के बीच सेतु का काम करने वाले कुछ पत्रकारों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए प्रतिष्ठित पेशे को बदनाम कर रखा है। चौंकाने वाली बात यह है कि शासन भी ऐसे पत्रकारों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने के मूड में नहीं है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार नेता,मंत्री और अधिकारियों से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से उनके कार्यकाल में काफी संख्या में नामचीन पत्रकारों ने सरकार से अनुदानित दरों पर प्लॉट और आवास प्राप्त किए हैं इसके बावजूद वे सरकारी आवासों का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। सरकारी आवास हासिल करने के लिए ज्यादातर पत्रकारों ने राज्य सम्पत्ति विभाग को झूठे हलफनामे दिए कि उनके पास कोई भी निजी आवास नहीं है। जानकारी के मुताबिक कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने मुलायम सरकार के कार्यकाल में मिले अनुदानित मकानों को उचे दरों पर पर किराए पर दे रखा है और स्वयं सस्ते सरकारी आवासों का लाभ उठा रहे हैं।

जानकार सूत्रों का कहना है कि कई पत्रकार तो ऐसे हैं जिन्होंने अपने अनुदानिद मकानों और प्लॉटों को महंगे दामों में बेच भी दिया है। इतना ही नहीं कई पत्रकार ऐसे हैं जो करोड़पति हैं। लखनऊ में उनके कई विशालकाय निजी आवास हैं, इसके बावजूद वे सरकारी मकानों पर कुण्डली जमाकर बैठे हैं। इनमें से कई पत्रकारों ने सत्ता और शासन में अपनी मजबूत पकड़ के बलबूते अपने रिश्तेदारों के नाम पर लखनऊ विकास प्राधिकरण और आवास विकास की कई योजनाओं में कई-कई प्लाट और आवास आवंटित करवा लिए हैं।

अनुदानित दर पर जमीन लेने के बाद भी सरकारी आवासों पर कब्‍जा

बीबीसी में संवाददाता रहे रामदत्त त्रिपाठी को तत्कालीन मुलायम सरकार ने अनुदानित दरों पर पत्रकारपुरम में प्लॉट संख्या 2/91 आवंटित किया था। इसके बावजूद पत्रकारों के मध्य वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी ने गुलिस्तां कॉलोनी में भवन संख्या 55 नम्बर के सरकारी आवास पर अपना कब्जा जमा रखा है। चूंकि सरकारी भवन का किराया अल्प होने के साथ ही अन्य सरकारी सुविधाएं भी इन्हें प्राप्त होती रहती हैं लिहाजा वे सरकारी आवास का सुख त्याग नहीं कर पा रहे हैं। सरकार की ओर से उन्हें अनुदानित दरों पर जो प्लॉट दिया गया था, उस पर इन्होंने तिमंजला निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्य के लिए किराए पर दे रखा है। जानकार सूत्रों का दावा है कि उक्त भवन को आवासीय से व्यवसायिक में भी परिवर्तित नहीं कराया गया है। जाहिर है नगर निगम को व्यवसायिक दरों पर टैक्स भी नहीं मिल रहा है। बताया जाता है कि उन्हीं के कुछ निकट साथियों ने गुपचुप तरीके से नगर निगम को वस्तुस्थिति से अवगत कराया था लेकिन विभाग वरिष्ठ पत्रकार के सत्ताधारियों से करीबी रिश्तों के कारण कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा सका। 

किसी समय में जनसत्ता एक्सप्रेस में सम्पादक रहे पंकज वर्मा को भी सरकारी अनुदान पर गोमती नगर, विनय खण्ड में प्लॉट संख्या 4/49 आवंटित किया गया था लेकिन वे राजधानी लखनऊ के अति विशिष्ट इलाके में मौजूद राजभवन कॉलोनी में भवन संख्या 1 पर अवैध रूप से काबिज हैं। इनके कब्जे को राज्य सम्पत्ति विभाग ने भी अवैध मानते हुए एक अन्य पत्रकार को आवंटित कर दिया था लेकिन सूबे की सत्ताधारी सरकारों से मधुर सम्बन्धों के चलते राज्य सम्पत्ति विभाग सरकारी आवास से कब्जा नहीं हटवा सका। बताया जाता है कि एक पत्रकार ने श्री वर्मा के अवैध कब्जे को न्यायालय में भी चुनौती दी थी।

टाईम्स ऑफ इण्डिया के समाचार सम्पादक रहे रतनमणि लाल का रिश्ता काफी समय पहले अखबार की दुनिया से छूट चुका है। इस वक्त वे एक एनजीओ के तहत निजी काम कर रहे हैं इसके बावजूद डालीबाग कालोनी के 7/13 के सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। सरकार खर्च पर रंगाई-पुताई और अन्य कार्य भी ये अक्सर करवाते रहते हैं। हिन्दुस्तान के पत्रकार शोभित मिश्रा का कई साल पहले लखनऊ से तबादला हो चुका है इसके बावजूद वे सरकारी आवास संख्या एमआईजी 23 पर कब्जा जमाए हुए हैं। किसी समय राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाला कुबेर टाईम्स को बन्द हुए कई वर्ष हो चुके हैं इसके बावजूद रमेश सिंह का उसी अखबार के नाम पर कब्जा बना हुआ है।

एएनआई की संवाददाता कामिनी हजेला को अनुदानित दरों पर तत्कालीन सपा सरकार में विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 3/214 आवंटित किया गया था इसके बावजूद कामिनी हजेला ने सरकारी आवास संख्या ए-1006 से अपना मोह नहीं त्यागा है। द पायनियर के संवाददाता विश्वदीप बनर्जी इन्दिरा नगर की सचिवालय कॉलोनी बी-26 पर वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं जबकि इन्हें भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 2/216 आवंटित किया गया था। दैनिक ग्रामीण सहारा के संवाददाता शरत पाण्डेय भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर प्लॉट हासिल करने के साथ ही सरकारी आवास विधायक निवास-2 पर कब्जा जमाए बैठे हैं।     

गौरतलब है कि इन्हें विराज खण्ड में प्लॉट संख्या सी 2/50 तत्कालीन मुलायम सरकार के कार्यकाल में आवंटित किया गया था। इलेक्ट्ॉनिक चैनल के संवाददाता कमाल खान ने तो तत्कालीन मुलायम सरकार से दो प्लॉट विराज खण्ड 1/97 और सी 1/315 विकल्प खण्ड अनुदानित दरों पर हथियाये थे। इसके बावजूद वे सरकारी आवास का मोह नहंी त्याग रहे हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक राज्य सम्पत्ति विभाग ने इन्हें भी कारण बताओ नोटिस भेजा था लेकिन मीडिया के प्रभाव और सत्ताधारियों से नजदीकी का रिश्ता रखने वाले कमान खान से सरकारी आवास खाली नहीं करवाया गया।

कमोबेश इसी तरह से अनुदानित दरों पर प्लॉट हथियाने के बावजूद सरकारी मकानों का सुख भोग रहे पत्रकारों में अतुल चंद्रा ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/119’, गोलेश स्वामी ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/120’ अजय जायसवाल ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/45’, कमल दुबे ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/130’ मनोज श्रीवास्तव ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/121’, आशुतोष शुक्ल ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/122’, संदीप रस्तोगी ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी- 2/123’, स्वदेश कुमार ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/63 सी’, विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/187’, नदीम ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-2/136ए’, रूमा सिन्हा ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी-1/156ए’, विनोद कुमार कपूर ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 2/124’, संजय मोहन जौहरी ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 1/47’, संजय भटनागर ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या 1/29’, प्रज्ञान भट्टाचार्य ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या सी 3/7’, सुधीर मिश्रा ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी 2/118’, सुरेश यादव ‘विराज खण्ड में प्लॉट संख्या डी 1/85’, अनिल के. अंकुर ‘सी 3/10 विराट खण्ड’, ज्ञानेन्द्र शर्मा ‘3/78 पत्रकार पुरम’, कामिनी प्रधान ‘सी 3/132 विराज खण्ड’, एम.पी. सिंह ‘1/353 विनम्र खण्ड’, अश्विनी श्रीवास्तव ‘2/64 विराट खण्ड’, प्रदीप विश्वकर्मा ‘सी 1/311 विकल्प खण्ड’, मोहम्मद तारिक खान ‘सी 1/312 विकल्प खण्ड’, बालकृष्ण ‘सी 1/313 विकल्प खण्ड’, प्रदुम्न तिवारी ‘1/157 विराज खण्ड’ और दिलीप कुमार अवस्थी पत्रकार पुरम 2/77 सहित सैकड़ों की संख्या में पत्रकार सरकारी की ओर से अनुदानित दरों पर प्लॉट पाने के बावजूद दूसरे के हक पर डाका डाल रहे हैं।

पत्रकारों के डर से सरकार भी साधे है चुप्‍पी

चूंकि सरकार मीडिया से कोई बैर नहीं लेना चाहती लिहाजा वह भी चुप्पी साधे बैठी है। राज्य सम्पत्ति विभाग की मजबूरी यह है कि जब तक उच्च स्तर से आदेश नहीं आते तब तक वह गैरकानूनी ढंग से सरकारी मकानों पर कुण्डली मारकर बैठे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही। राज्य सम्पत्ति विभाग के एक अधिकारी तो यहां तक कहते हैं कि बस किसी तरह से एक बार प्रमुख सचिव स्तर अथवा मुख्यमंत्री की तरफ से आदेश आ भर जाएं, फिर देखिए कैसे मकान खाली होते हैं।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एक वरिष्ठ पत्रकार ने वर्तमान सरकार से लिखित रूप में मांग की है कि गैरकानूनी ढंग से सरकारी आवासों का सुख भोग रहे पत्रकारों से सरकारी आवास खाली करवाकर पात्र पत्रकारों को आवंटित करवाया जाए। गौरतलब है कि इससे पूर्व भी सरकार से अनुदानित दरों पर प्लाट और आवास हासिल करने वाले पत्रकारों से सरकारी आवास खाली कराए जाने की मांग की जा चुकी है। शिकायतकर्ता वरिष्ठ पत्रकार ने सरकार से मांग की है कि पत्रकारों को सरकारी आवास देने के लिए पीआईबी की तरह नीति बननी चाहिए। ताकि योग्य पत्रकारों को ही सरकारी सुविधा का लाभ मिल सके। झूठा हलफनामा लगाकर सरकारी आवास प्राप्त करने वाले पत्रकारों के खिलाफ भी धोखाधड़ी से सम्बन्धित मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई की मांग अनेकों बार की जा चुकी है।

तत्कालीन प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग कहते हैं कि सरकार इस मुद्दे पर काफी संवेदनशील है। मान्यता प्राप्त और जरूरतमंद पत्रकारों को सरकारी आवास उपलब्ध कराने के लिए प्रयासरत है। श्री गर्ग कहते हैं कि यदि किसी पत्रकार ने गलत तरीके से आवास हासिल किए है, तो आवास खाली कराने के साथ ही जांच भी कराई जाएगी। दोषी लोगों को सरकार किसी भी दशा में बख्शेगी नहीं। श्री गर्ग ने प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री रहते हुए यह आश्वासन दिया था। परिणामस्वरूप सत्ता से करीबी का रिश्ता रखने वाले पत्रकारों का तो वे कुछ नहीं बिगाड़ पाए अलबत्ता उन्हें ही यूपी छोड़कर दिल्ली जाना पड़ गया।

लखनऊ से बाहर रहने वाले भी जमाए हुए हैं कब्‍जा

प्राप्त जानकारी के मुताबिक इनमें से कई ऐसे पत्रकार हैं जो अब पत्रकार नहीं रह गए हैं, किसी अखबार, मैग्जीन या टीवी में कार्यरत नहीं हैं, लखनऊ में भी नहीं रहते हैं। ऐसे लोगों से सरकार मकान खाली कराने के मूड में तो है लेकिन मीडिया से बैर लेने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रही है। कई तो ऐसे हैं जिन्हें एक या दो साल के लिए मकान आवंटित किया गया था लेकिन अवधि पूरी होने के बाद भी वे बिना रिनुवल के मकान में जमे हुए हैं। कुछ लोगों को मान्यता खत्म हो चुकी है पर मकान उन्हीं के कब्जे में है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पार्टी के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाले नगर विकास मंत्री आजम खां ने अपने पिछले कार्यकाल में अल्पसंख्यक समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले दर्जन भी पत्रकारों को बिना जांच के ही निर्धारित समय के लिए मकानों के आवंटन का आदेश दिया था। ऐसे पत्रकारों का आवंटन तो तत्काल हो गया था लेकिन समयावधि पूरी होने के बाद भी वे तथाकथित पत्रकार सरकारी आवासों में डेरा जमाए हुए हैं। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं राज्य सम्पत्ति विभाग के पास अब कोई मकान ही खाली नहीं रह गया है जिसे जरूरतमंद को आवंटित किया जा सके। प्राप्त जानकारी के अनुसार हजारों की संख्या में जरूरतमंद पत्रकार और राज्य कर्मचारी प्रतीक्षा सूची में हैं।

9 नवम्बर 2012 को पत्रकारों के आवास आवंटन और नवीनकरण के लिए प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री राकेश गर्ग और सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह की अध्यक्षता में हुई राज्य सम्पत्ति विभाग की बैठक में तमाम निर्णय लिए गए थे। बैठक में तथाकथित 44 फर्जी ढंग से निवासित पत्रकारों के आवास आवंटन पर चर्चा हुई। बैठक में सम्बन्धित अधिकारी को आदेश दिया गया था कि जिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आवास आबंटन का नवीनीकरण नहीं हुआ है उनसे तत्काल दोबारा प्रार्थना पत्र मांगा जाए, साथ ही गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को नोटिस देकर उनके आवास खाली कराए जाएं। मुख्यालय से बाहर स्थानांतरित पत्रकारों के आवासों का निरस्तीकरण किया जाए। जिन पत्रकारों का निधन हो गया है, उनके आश्रितों में यदि कोई मान्यता प्राप्त पत्रकार है, तो उनको छोड़कर सभी के आवास निरस्त करने के साथ ही सख्ती से मकानों से कब्जे हटवाए जाएं। लगभग दो वर्ष के बाद भी हाल वही है।

अधिकारियों का आदेश मंत्रियों का सिफारिशी पत्र भारी

उच्चाधिकारियों के आदेश पर मंत्रियों के सिफारिशी पत्र भारी पड़ गए। अधिकारी भी अब इस मामले में पड़कर अपनी फजीहत करवाना नहीं चाहते। महत्वपूर्ण यह है कि राज्य सम्पत्ति विभाग से लेकर शासन स्तर पर बैठे उच्चाधिकारी भी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने सरकारी आवास पाने के लिए झूठे हलफनामें दिए हैं कि उनके पास निजी आवास नहीं हैं। इसके बावजूद ऐसे निजी आवास रखने वाले पत्रकार जरूरतमंद लोगों के अधिकारों पर कब्जा जमाए बैठे हैं। ऐसे पत्रकारों की एक लम्बी फेहरिस्त है।

गौरतलब है कि फर्जी हलफनामा देने वाले के खिलाफ भारतीय दण्ड संहिता में कठोस सजा का प्राविधान है इसके बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग सब कुछ जानते हुए भी फर्जी हलफनामा देने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। सरकार ने सूचना विभाग को भी यह जिम्मेवारी सौंपी थी कि वह पता करके बताए कि जिन पत्रकारों से जिस संस्थान का हवाला देकर मकानों का आवंटन कराया था, वे सही हैं अथवा नहीं। बताया जाता है कि विभाग ने समस्त जानकारी जुटा कर सम्बन्धित अधिकारियों तक भेज दी थी लेकिन आज तक कार्रवाई नहीं हो सकी।

लखनऊ के यूपी प्रेस क्लब में पिछले वर्ष 9 मार्च को आयोजित कार्यक्रम में भी पत्रकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मसले पर खुद ही लकीर खींचते दिखाई दिए। मौका था वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव की चौथी पुस्तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निर्बाध या नियंत्रित के विमोचन का। यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव समारोह के मुख्य अतिथि थे, जबकि कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कर रहे थे। दिल्ली से आए वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवीं सभी पत्रकारों को नसीहत दे रहे थे कि पत्रकार सरकारी लाभ, सरकारी आवास और कई रियायतों से दूर रहें, क्यों कि इससे पत्रकारिता की दिशा भटक जाती है। उनके वक्तव्य पर तालियां तो खूब बजीं लेकिन पत्रकारों के चरित्र में कोई सुधार नहीं आया। कार्यक्रम समाप्त होते ही कुछ पत्रकार ओम थानवी को भी अपशब्दों से नवाजते नजर आए। साफ जाहिर था कि लखनउ का पत्रकार किसी कीमत पर सरकारी लाभ से वंचित नहीं रहना चाहता। भले ही उसके लिए उसे कोई भी रास्ता क्यों न अपनाना पडे़।

राज्य सम्पत्ति विभाग के सूत्रों का कहना है कि काफी संख्या में पत्रकार पत्रकारिता से रिटायर हो गए हैं। इसके बावजूद सरकारी आवासों पर काबिज हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि अधिकतर पत्रकारों के पास सरकार द्वारा सब्सिडी पर दिए प्लाट और आवास होने के बावजूद सरकारी आवासों में रह रहे हैं। अपने निजी आवास किराए पर देकर कमाई कर रहे हैं। इस फर्जीवाड़े में नामचीन पत्रकारों की संख्या काफी है।

कुछ पत्रकारों ने नियम विरुद्ध उठाया लाभ

नियम विरूद्ध तरीके से सरकारी सुविधाओं का उपभोग करने वाले कुछ कथित वरिष्ठ पत्रकारों ने जमकर लाभ उठाया। इनकी शिकायत राज्य सम्पति विभाग से लेकर सूचना विभाग के उच्च पदस्थ अधिकारियों तक भी पहुंचायी गयी। जानकार सूत्रों की मानें तो यह मामला सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से लेकर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के संज्ञान में भी है लेकिन कोई भी इन कथित भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई करने के मूड में नहीं है। सत्ताधारी दल से जुडे़ कुछ पदाधिकारी तो अब यहां तक कहने लगे हैं कि सपा प्रमुख मुलायम ने इन्हें अपने अहसान तले दबा रखा है। हालांकि नियम विरूद्ध तरीके से दोतरफा सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने वाले पत्रकारों की संख्या काफी है लेकिन यहां पर चन्द उन बड़े पत्रकारों के नामों का खुलासा किया जा रहा है जो अपने जूनियर पत्रकारों को उनके पेशे की गरिमा और नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहते हैं।

गोमती नगर योजना में पत्रकारों के लिए अनुदानित मकान            राज्य सम्पत्ति विभाग के आवासों में अध्यासित

01. रवीन्द्र सिंह 3/33, पत्रकार पुरम                             17, राजभवन कालोनी

02. रामदत्त त्रिपाठी 3/81, पत्रकारपुरम                        55, गुलिस्तां कालोनी

03. दीपक गिडवानी 1/12 विराज खण्ड                         65, गुलिस्तां कालोनी

04. पंकज वर्मा 4/49, विनय खण्ड                              1,  राजभवन कालोनी

05. विश्वदीप बनर्जी बी-26, इन्दिरा नगर                       2/216, विराज खण्ड

06. रचना सरन 1/28, विराज खण्ड                            बी-78, इन्दिरा नगर

07. संगीता बकाया 1/33 विराज खण्ड                        सी-16 बटलर पैलेस

08. हेमंत तिवारी 1/19, विराज खण्ड                            बी-7, बटलर पैलेस

09. वीर विक्रम बहादुर मिश्र 3/82 पत्रकार पुरम                3/8, कैसरबाग

10. सुरेन्द्र दुबे 1/15, विराज खण्ड                               1/2, डालीबाग

11. राजेन्द्र कुमार 1/27, विराज खण्ड                          9/1, डालीबाग

12. राजेन्द्र द्विवेदी 1/115, विराज खण्ड                      51, अलीगंज

13. शोभित मिश्रा 1/155, विराज खण्ड                         23, अलीगंज

14. ज्ञानेन्द्र शर्मा, 3/78, पत्रकारपुरम                         23, गुलिस्ता कालोनी

15. कमाल खान 1/97 विराज खण्ड, 1/315 विकल्प खण्ड        बटलर पैलेस

16. वाशिन्द मिश्रा 1/12, विराज खण्ड                       20, गुलिस्तां कालोनी, लखनऊ
 
17. नदीम 1/136-ए, विराज खण्ड                               5/16, डालीबाग

18. अनूप श्रीवास्तव सीपी-5, सेक्टर सी अलीगंज              10, गुलिस्ता कालोनी

19. के. विक्रम राव, सेक्टर सी, अलीगंज                         गुलिस्तां कालोनी

20. मुकेश अलख 1/73, विराज खण्ड                        53, गुलिस्ता कालोनी

21. के.डी बनर्जी 1/151, विराज खण्ड                       7/8, डालीबाग

22. जोखू प्रसाद तिवारी 1/204 विराज खण्ड                  3/43, टिकैतराय कालोनी

जमकर उड़ीं नियमों की धज्जियां

गोमती नगर की विभिन्न योजनाओं में पत्रकारों के लिए राज्य सरकार की ओर अनुदानित भू-खण्डों के लिए कुछ नियम व शर्ते तय की गयी थीं। शर्तों में कहा गया है कि भू-खण्ड उन्हीं श्रमजीवी पत्रकारों को आवंटित किए जायेंगे जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के तहत शर्तों को पूरा करते हों। यदि किसी पत्रकार ने पूर्व में ही पुराने सब्सिडी योजना में भवन अथवा भू-खण्ड ले रखा है या प्राप्त कर बेच चुका है, वह इस योजना का लाभ लेने का पात्र नहीं होगा। इसके बावजूद ज्यादातर पत्रकारों ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए अनुदानित दरों पर भू-खण्ड तत्कालीन मुलायम सरकार से झटक लिए।

नियम पुस्तिका में स्पष्ट लिखा गया है कि सरकार की ओर से दिए गए अनुदानित दरों वाले भू-खण्डों को कम से कम कम 30 वर्षों तक बेचा नहीं जा सकेगा और न ही किसी अन्य को हस्तान्तरित किया जा सकेगा। निर्धारित अवधि पूरी होने से पहले ही ज्यादातर भू-खण्ड या तो बेचे जा चुके हैं या फिर उन भू-खण्डों पर निर्माण करवाकर उन्हें किराए पर उठाया जा चुका है।

महत्वपूर्ण शर्तों में भू-खण्ड पर मकान के निर्माण के बाबत सख्त निर्देश दिए गए हैं। निर्देशानुसार भू-खण्ड के निबन्धन की तिथि से पांच वर्ष के अन्दर आवंटी को मानचित्र स्वीकृत कराकर निर्माण कार्य पूरा करा लेना होगा। यदि कोई आवंटी उपरोक्त निर्धारित अवधि में निर्माण कार्य नहीं कराता है तो पांच वर्ष की अवधि के उपरांत उसे पांच वर्ष का अतिरिक्त समय प्रति वर्ष क्रय मूल्य को दो प्रतिशत सरचार्ज लेकर दिया जायेगा और यदि वह 10 वर्ष के अन्दर भी निर्माण नहीं करवा पाता है तो दस वर्ष बाद उसकी लीज समाप्त कर दी जायेगी। सख्त आदेशों के बावजूद दर्जनों की संख्या में भू-खण्ड डेढ़ दशक से भी ज्यादा समय से खाली पडे़ हैं लेकिन किसी भी पत्रकार के भू-खण्ड की लीज को निरस्त नहीं किया गया।

अनुदानित मकानों, भू-खण्डों में व्यापार

किसी में खुली है जूते की दुकान तो किसी में चल रहा है पीसीओ। कहीं खुला है लाईम स्टोर तो किसी मकान में खुल गयी है लॉण्ड्री। किसी ने बैंक को महंगी दरों पर दे रखा है तो किसी में चल रहा है स्कूल। यह हाल है कि सरकार द्वारा अनुदानित दरों पर प्रदत्त किए गए उन मकानों, भू-खण्डों का जिसे पत्रकारों को सब्सिडी के तौर पर रहने के लिए आवंटित किया गया था।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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Comments on “हम हैं यूपी के पत्रकार, कानून हमारी जेब में!

  • शमीम इकबाल says:

    अनंत कथाये पत्रकारिता के चाल चरित और चेहरे को बताती है यह भी उसी सच का आइना पर क्या होता है

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